सोमवार, 29 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन -तीन

चलो सिटी चलते हैं
“अच्छा चलो आज अपने को नदी के उस पार वाले टीले पर एक्सप्लोरेशन के लिये चलना है । ” डॉ. वाकणकर ने घोषणा की । दरअसल आज सुबह सात बजे ही उन्होने हम लोगों को जगाकर आज का प्रोग्राम बता दिया था । नदी के उस किनारे वाला वह टीला यहाँ से कुछ दूरी पर ही स्थित है । हम लोग इसी तरह गपियाते हुए घूम कर नदी के उस किनारे पर पहुंचे । वहाँ ज़्यादा कुछ नहीं था । बड़ी मुश्किल से कहीं कोई अवशेष दिखाई देता था । एक जगह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता के कुछ चित्रित मृद्भांड प्राप्त हुए, ऐतिहासिक काल के दो सिक्के और दो बीड मिले बस । मुझे मेरा बचपन याद आ गया जब इसी तरह भंडारा में वैनगंगा नदी के किनारे मैं रेत में शंख और सीपियाँ ढूंढा करता था । दोपहर के भोजन से पूर्व हम लोग वहाँ से लौट आये ।
भोजन के पश्चात हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक दो पर अपना कार्य प्रारम्भ किया । हमने 1.90 मीटर के बाद 20 सेंटीमीटर खुदाई की । हमें लग रहा था कि हमने खुदाई शुरू की है तो अवशेषों के ढेर मिलना शुरू हो जायेंगे . हम लोग बार बार आंखें फाड़कर ट्रेंच के भीतर झाँकते और कोशिश करते कोई दीवार नज़र आ जाये, या कोई मटका या कोई और महत्वपूर्ण वस्तु मिल जाये लेकिन कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई । हाँ, ट्रेंच की दक्षिण दिशा (south extension) की ओर विस्तृत ट्रेंच में एक टूटा हुआ टेराकोटा ऑब्जेक्ट यानि बैल प्राप्त हुआ ।(गूगल छवि में देखें terracotta bull) हमने उसका नाम शर्मा जी के नाम पर ‘राममिलनवा’ रख दिया ।
हमारा कार्य अभी प्रारम्भ ही हुआ था कि हमे ऐसा लगा जैसे प्रकृति को हमारा आगमन उचित नहीं लगा है । आकाश में बादल छाने लगे और ठंडी हवाएँ तेज़ हो गईं । मौसम भले ही सर्दियों का था लेकिन धूप में काम करते हुए हम लोगों का पसीना निकल गया था । अब वह धूप की वज़ह से था या काम की वज़ह से यह अलग बात है । लेकिन ऐसे में वे ठंडी हवाएँ बहुत भली लगीं । मैने आसमान की ओर देखा और गुनगुनाना शुरू कर दिया “ठन्डी हवाएँ ..लहरा के आयें ,रुत है जवाँ, उनको यहाँ कैसे बुलायें..” रवीन्द्र ने घूर कर मेरी ओर देखा ..”लो छोरा शुरू हो गया ..अबे, उनको यहाँ बुलाकर करेगा भी क्या ,और वो यहाँ आकर करेगी भी क्या .हमने ही यहाँ पत्थरों से अपना माथा फोड़ना है ।“ वाकणकर सर कहीं और चले गये थे और हम लोगों को ऐसा लग रहा था जैसे कॉलेज का आज पहला दिन है ,कब क्लास की छुट्टी हो और कब घर जायें । इतने में आर्य सर आये और कहा ‘भाई सर का आदेश हुआ है मौसम को देखते हुए ट्रेंच को ढाँकना ज़रूरी है इसलिये आज काम यहीं पर समाप्त किया जाये । “ अजय ने बच्चों की तरह खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा “ होहोहो मज़ा आ गया.. चलो सिटी चलते हैं ।“ “सिटी ?” मुझे आश्चर्य हुआ “अरे भैया अभी उज्जैन कहाँ जा सकते हैं ? “ “उज्जेन जाने की कोन केहवे हे “ अजय ने कहा “ में तो दंगवाड़ा गाँव जाने की के रहा था यहाँ से डेढ़ किलोमीटर दूर “ रवीन्द्र ने कहा “ ठीक तो कह रहा है । हम यहाँ जंगल में पड़े हैं हमारे लिये तो दंगवाड़ा ही सिटी है ।‘ “चलो चाय पी लें फिर चलते है “ मैने कहा और हम लोग तम्बुओं की ओर चल पड़े ।
आपका- शरद कोकास

बुधवार, 24 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-दो


बुझा हुआ चूल्हा
हम लोग उत्खनन के बीच में दंगवाड़ा पहुंचे थे इसलिये पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था . लेकिन हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे अत: प्रश्न करने की हमें छूट थी. “अच्छा सर, यह बताइये,पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ?” रवीन्द्र ने प्रश्न किया । “तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमे यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । “ जी “ रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई । “चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं “ डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी “ दरअसल पुरातत्ववेत्ता प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन काकर्य कहाँ प्रारम्भ करना है । इस सूचना के प्रारम्भिक वाहक होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग ,किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले,जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर कोई मूर्ती पाई गई है या कोई सिक्का या बर्तन ,पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए कुछ मिल जाता है , कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़ हारे या शिकारी ऐसी सूचना देते हैं । धीरे धीरे बात फैलती है, हाँलाकि हमारे यहाँ छुपाने की पृवृत्ति ज्यादा है लेकिन बात पहुंच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी है ,कहाँ ट्रेंच बनानी है, किस लेयर से शुरू करना है वगैरह ..।
“लेकिन सर यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती हैं जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना ?” मैने सवाल किया । तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिये ऐसा कह रहे हो “ सर ने कहा “इसके एक नहीं अनेक कारण हैं । नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती है । भूकम्प ,ज्वालामुखी, तूफान ,अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण ,भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं । किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं ।“
सर जैसे ही खामोश हुए मेरे भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया “ कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, बच्चे खेल रहे है, किसान हल चला रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाये और सुबह सब खलास ।“
“ हाँ” डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होने प्रतिक्रिया प्रकट की ..” लेकिन जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है उसका अतीते जानना ।“ अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।

गुरुवार, 18 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-एक

नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा
अगला दिन हम लोगों के लिये काम की शुरुआत का पहला दिन था । डॉ.वाकणकर अपना चोगा नुमा लम्बा सा कोट पहने ट्रेंच पर उपस्थित थे । उनके दोनों हाथ उस कोट की लम्बी जेबों के भीतर थे । मैं उन हाथों को देखना चाहता था जो हाथ इतिहास में गहराई तक उतरने का हौसला रखते थे । सर के कोट को हम लोग बहुत ध्यान से देख रहे थे कि अचानक रवीन्द्र ने मेरे कान में बताना शुरू किया “सर जब भीम बैठका की गुफाओं में शैलचित्रों की खोज करने गये थे ना तब इसी कोट की जेब में कच्चे आलू लेकर गये थे। वे महीने भर उस जंगल में रहे किसी साधु की कुटिया मे उन्होनें डेरा जमा लिया था । वे दिन दिन भर जंगल में भटककर रॉक पेंटिंग्स खोजते थे और भूख लगने पर आलू भूनकर खा लिया करते थे । बढ़ी दाढ़ी ,अजीब सा हुलिया, यहाँ तक कि लोग उन्हे ‘आलू वाले बाबा ‘ कहकर पुकारने लगे थे । ऐसी होती है काम की लगन । “ “क्या खुसुर-पुसुर चल रही है रे दुष्टों..? “डॉ.वाकणकर ने हम लोगों को वार्तालाप में मग्न देख कर पूछा । उनके दो प्रिय सम्बोधन थे,सज्जनों और दुष्टों जिनका अभिप्राय हम उनके बुलाने के तरीके से समझ जाते थे । हमारे दिमाग में कोई शरारत कुलबुला रही है यह सोचकर उन्होने हमें दुष्टों सम्बोधित किया था । “कुछ नहीं सर” रवीन्द्र ने कहा “ हम लोग आपका कोट देख रहे थे ।” “ऐसा क्या है इस कोट में “उन्होनें ध्यान से अपना कोट देखा और कहा “ चलो आज तुम लोगों का परिचय उत्खनन में काम आनेवाले औज़ारों से करवाते हैं । किताबों मे चित्र तो तुम लोग देख ही चुके हो ।देखो यह कुदाल है , खुदाई की शुरुआत इसीसे होती है और यह खुरपी , प्रारम्भिक खुदाई के पश्चात इसका प्रयोग समय समय पर किया जाता है ताकि कुदाल के आघात से कोई वस्तु टूट ना जाये । फावड़ों से मिट्टी हटाई जाती है घमेलों में भरकर और यह ब्रश है उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं को इससे साफ किया जाता है । किसी परत में किसी अवशेष का ऊपरी हिस्सा दिखाई देने पर उसे बाहर निकालने के लिये भी ब्रश का उपयोग किया जाता है । यह ब्लोअर है गाड़ी के भोंपू जैसा ,इसे दबाने से हवा निकलती है ,जहाँ ब्रश से भी नुकसान की सम्भावना हो वहाँ इसका उपयोग करते हैं । और भी बहुत से टूल्स हैं नापने के लिये टेप ,कपड़े की थैलियाँ ,मार्क करने के लिये पेन ,चित्र के लिये कैमरा ।“ हम लोग सोच रहे थे इतने साधारण से औज़ार ? पुरातत्ववेत्ता क्या इन्ही से ज़मीन के नीचे दबा इतिहास खोज कर निकालते हैं? “बाकी सब टूल्स का उपयोग तो तुम लोग देख देख कर समझ जाओगे ।“ सर ने हम लोगों के विचार जैसे पढ़ लिये थे । फिर जालियों की ओर इशारा करते हुए कहा “जैसे वो देखो अलग अलग मोटी –पतली जालियों वाली छन्नियाँ । निखात से निकली मिट्टी फेंकने से पहले इनमें छानना ज़रूरी होता है ।“ “और सर अगर बगैर छाने फैंक दे तो ?” राममिलन ने अपनी सहजता में सवाल किया । “ अरे दुष्ट! और कहीं उसके साथ नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा भी फिका गया तो ? डॉ. वाकणकर ने कहा । राममिलन ने कहा “ तब तो साहब ऊ शाहजहाँ की आत्मा हमें माफ नहीं करेगी ।“ ” अरे पंडित जी.. शाहजहाँ की नहीं जहाँगीर की “ किशोर त्रिवेदी ने राममिलन के स्टेटमेंट को सुधारते हुए कहा कहा । किशोर उसी दिन सुबह सुबह दंगवाड़ा पहुंचा था । राममिलन किशोर का इशारा समझ गया और ज़ोर का अट्टहास करते हुए कहा “ऐसन है भैया,ऊ जमाने में नहीं चलता होगा ई जमाने में तो सबै चलता है किसीकी लुगाई का नाम किसी के भी साथ जोड़ दो ।“ हम लोगों ने देखा सर मज़दूरों के साथ बातचीत में मशगूल थे और हमारी बकवास पर उनका ध्यान नहीं था ।
आपका शरद कोकास

शुक्रवार, 12 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन -सात


डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो
“इतिहास भी यार बड़ी मज़ेदार चीज़ है “ अशोक त्रिवेदी ने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए कहा । “बचपन में ,स्कूल में गुरूजी कहा करते थे ,’हिस्ट्री जाग्रफी बड़ी बेवफा,रात को रटो और दिन को सफा ‘” “हाँ, इसलिये तो लोग मज़बूरी में पढ़ते हैं इसे ,हम लोग भी प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति और पुरातत्व में एम.ए. इसलिये नहीं कर रहे हैं कि इस डिग्री के बाद कहीं ठीक ठाक नौकरी मिल जाये? ‘ अजय ने प्रतिक्रिया व्यक्त की । “और नहीं तो क्या,”रवीन्द्र कहने लगा “कितना मुश्किल है यार लम्बी लम्बी वंशावलियाँ रटना ,वही राजा-महाराजाओं के किस्से,युद्धों की कहानियाँ,राजनैतिक षयंत्र ,नाच-गाने की महफिलें, हरम की ऐयाशियाँ,भूत-प्रेतों की तिलिस्मी कथायें..” “नहीं नहीं ऐसा नहीं है “ मैने उसे बीच में टोका “इतिहास तो हमारा अपना ही अतीत है । जैसे हम रोज़मर्रा के जीवन में अपनी पिछली सफलताओं और असफलताओं से सबक लेते हैं इतिहास से सबक लेने का अर्थ भी यही है । अपनी गलती से सबक लेना जैसे व्यक्तिगत हित में है वैसे ही मनुष्य जाति के इतिहास से सबक लेना सम्पूर्ण मनुष्यता के हित में है । “ ठीक है “ अजय ने कहा “ लेकिन इतिहास सही है या गलत यह कौन बतायेगा ? हम तो वही इतिहास जानेंगे ना जो हमे पढ़ाया जायेगा ? कुछ इतिहास हमे अंग्रेजों ने पढ़ाया कुछ उनके वंशज पढ़ा रहे हैं बचपन से अपनी किताबों में यही सब ऊल-जलूल चीजें तो पढ़ रहे हैं हम लोग इतिहास के नाम पर “ “ नहीं पूरी तरह ऐसा नहीं है “ मैने दलील दी “ गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने यहाँ का इतिहास लिखा जाहिर है उसमें उन्होने अपनी प्रशंसा की होगी उनके विरोध में हमारे यहाँ के लोगों द्वारा जो इतिहास लिखा गया उसमें अपनी संस्कृती का गौरव गान कुछ अतिशयोक्ती लिये अवश्य था क्योंकि उस समय अंग्रेजों से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना ही यहाँ के आम जन का उद्देश्य था और आज़ादी और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये यह अनुचित भी नहीं था ज़ाहिर है उस समय के इतिहासकार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लेखन कर रहे थे और केवल इतिहास में ही नहीं साहित्य में भी इसी तरह का लेखन हो रहा था स्वतंत्रता की चेतना के लिये आव्हान गीत लिखे जा रहे थे, अपने सुमन जी का ही गीत ले लो..”युगों की सड़ी रूढ़ियों को कुचलती /ज़हर की लहर सी लहरती मचलती /अन्धेरी निशा में मशालों सी जलती /चली जा रही है बढ़ी लाल सेना..’ अब इसे सुनकर तो ऐसा ही लगेगा जैसे आज़ादी की लड़ाई सिर्फ साम्यवादियों ने लड़ी हो जबकी उसमें और भी लोग शामिल थे “
“लेकिन पूर्वग्रह के साथ लिखे गये इतिहास में झूठ तो शामिल हो गया इस तरह “। अजय ने कहा “हाँ यह सच है “ मैने कहा “लेकिन फिर भी इसे पूरी तरह नकारा तो नहीं जा सकता और फिर इसके अलावा फिलहाल कुछ है भी तो नहीं हमारे पास ठीक है ,तुम ही लिखना नया इतिहास, डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो.. अपुन को तो कहीं मास्टर-वास्टर की नौकरी मिल जाये अपने लिये बहुत है “ अजय उबासी लेते हुए बोला “और बच्चों को वही इतिहास पढ़ाएंगे जो हमारे बाप –दादा पढ़ाते रहे “अशोक ने चुटकी ली “ठीक है,ठीक है हेरोडोटस,थूसीदीदस,इब्त खल्दून,मैकियावेली,ट्वायनबी,इवेल्यान,और मार्क्स के वंशजों रात बहुत हो गई है अब सो जाओ “ रवीन्द्र ने अपना अंतिम फरमान ज़ारी करते हुए कहा
आपका शरद कोकास

सोमवार, 8 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -दूसरा दिन-छः


प्रलय की कथा
कुछ विराम के पश्चात मैने फिर बात शुरू की “ लेकिन तीसरी शताब्दी ईसापूर्व तक इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली ।दलदल सुखाने और सिंचाई के लिये यहाँ नहरें खोदी गईं,खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । बाढ की वज़ह से गाद युक्त मिट्टी बहुत उपजाऊ हो गई थी । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैय्यार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें थीं । नगरों मे शिल्पी थे और ऊन खजूर अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “
“मतलब यह कि मेसोपोटमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गये?”रवीन्द्र ने कहा । “हाँ” मैने बताया ,लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गये,और शेष वैसे ही विपन्न रहे।“ इस बीच अजय ने सवाल किया “ कहते हैं प्रलय की मूल कथा भी यहीं की है? “ हाँ” मैने बताया “ उस समय यहाँ बाढ़ बहुत आती थी शायद उसीके चलते यहाँ इस कथा ने जन्म लिया । कहते हैं कि शुरुआत में यह पृथ्वी जल से ढंकी हुई थी । देवताओं का प्रयास था कि इसे जल से अलग किया जाये लेकिन एक दैत्य ऐसा होने से रोक रहा था । तब देवाधिपति ने उसे मार दिया और उसके शरीर के एक भाग से आकाश व तारों का निर्माण किया और दूसरे भाग से ज़मीन का । फिर ज़मीन पर पेड़ पौधे उगाये और इंसान बसाये। “
“लेकिन बृह्मांड ,तारे ,पृथ्वी इस तरह तो नहीं बने थे यह तो कोरी कल्पना है ।“अजय ने कहा ।“तो मैने पहले ही कहा कि यह कहानी है, हमारे यहाँ भी इस तरह की कितनी ही कहानियाँ हैं ।“ मैने कहा “ अरे उस समय मनुष्य के पास जितना ज्ञान था उस आधार पर उसने यह कथायें रचीं कुछ कल्पनायें आगे जाकर सत्य हो गईं और कुछ कल्पनाएँ ही रह गईं ।“ “ जैसे कि आज से चार सौ साल पहले तक यही सत्य था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है । अगर गेलेलियो और ब्रूनो जैसे वैज्ञानिक नही होते तो यही सत्य माना जाता “ रवीन्द्र ने कहा । “ हाँ ये लोग नहीं होते तो कोई और होता लेकिन सच तो एक न एक दिन सामने आता ही है ।खैर आगे की कहानी सुनो ..तो हुआ यह कि एक बार देवता मनुष्य से नाराज़ हो गये,उन्होनें तय किया कि पृथ्वी को पानी में डुबो दिया जाये । लेकिन जल देवता ने यह खबर लीक कर दी उसने यह बात सरकंडो को बता दी ,और सरकंडो ने झोपडी के मालिक को क्योंकि झोपडी सरकंडों से बनी थी। फिर क्या था इससे पहले कि प्रलय हो उसने एक बड़ी नाव बनाई उसमे अपने परिवार को,कुछ शिल्पकारों को व पशु पक्षियों को बिठा लिया। फिर तयशुदा दिन बरसात हुई ,नाव में बैठे लोगों के अलावा सारे डूब गये । बारिश थमने पर सबसे पहले कौवा उड़ा उसने ज़मीन का पता लगाया और फिर दुनिया आगे बढ़ी । “ ‘यार यह कहानी तो हर धर्म में है “ अजय ने कहा । ‘ बिलकुल “ मैने जवाब दिया ।“ मेसोपोटामिया से यह कथा पूरी दुनिया में पहुंची ,देवी-देवताओं का भय दिखाकर पुरोहितों ने लोगों को डराया धमकाया ,यदि वे देवताओं की बात नहीं मानेंगे तो फिर एक दिन प्रलय होगा ।“
“लेकिन मै फिर कह रहा हूँ यह इतिहास नहीं है ।“ अजय तर्क के मूड में था ।“ हाँ ठीक है तुम्हारा कहना” मैने कहा “ यह इतिहास नहीं है , लेकिन अफसोस यही है कि पढ़े-लिखे लोग भी पुराणकथाओं को इतिहास मान लेते हैं । इसिलिये इतिहासकारों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे आम लोगों को इतिहास की वास्तविकता बतायें और बतायें कि इतिहास और कहानी में क्या फर्क है.वरना लोग झूठ को ही हमेशा सच समझते रहेंगे । गोयबल्स की मशहूर उक्ति है झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है ।”
आपका शरद कोकास

बुधवार, 3 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-पाँच

बेबीलोन यानि बेबी को लोन ?

ठंड के दिन हैं और अन्धेरा जल्दी घिरने लगा है । कितना अच्छा लगता है पेट भर कर भोजन करने के बाद रज़ाई में घुसकर गप्पें मारना आज की रात हम लोगों को मेसोपोटेमिया या प्राचीन सुमेरिया की सैर के लिये जाना था हम लोग रज़ाई ओढकर बैठ गये प्राचीन विश्व का एक नक्शा मैने अपने सामने फैला लिया नक्शे के साथ इतिहास पढ़ते हुए एक एक घटना और स्थान मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। रवीन्द्र से कहा मैने “देखो रवीन्द्र, यह है पश्चिम एशिया का क्षेत्र वर्तमान में जहाँ इराक और कुवैत है यहीं था मेसोपोटेमिया। यहीं दज़ला और फरात नदियाँ बहती हैं । इन नदियों का उद्गम तो काकेशिया के दक्षिण में स्थित पहाड़ों से हुआ है और अंत फारस की खाड़ी में होता है लेकिन इनके मध्य व निचले भागों में स्थित प्रदेश को प्राचीन निवासियों ने “मेसोपोटेमिया “ अर्थात नदियों के बीच का प्रदेश या दोआब कहा । यहीं फरात नदी के किनारे बेबीलोन नामक एक प्रसिद्ध शहर था जिसे बाबुल भी कहते हैं ।
भैया राममिलन काफी देर से चुप बैठे मेरी बातें सुन रहे थे अचानक मैने उनकी ओर देखा तो वे बोल उठे “ का हो , ई बेबीलोन में बैंक ने कौनो बेबी- वेबी को लोन दिया था का ? मैने हथेली से अपना माथा पीटते हुए कहा “भैया इस बेबीलोन का अंग्रेजी के बेबी और लोन से कोई सम्बन्ध नहीं है ।“ भैया राममिलनवा पर लेकिन कोई असर नहीं पड़ा वे अपनी रौ में बोले..”वैसे भी बैंक को का ज़रुरत पड़ी थी बेबी को लोन देने की अरे ई बड़े लोग बेबी क्या अपन कुत्ता बिल्ली के नाम से भी लोन ले लेते हैं ।“
मैने राममिलन को उंगली से चुप रहने का इशारा किया और आगे बात बढाई..”बेबीलोन के हैंगिंग गार्डन प्रसिद्ध हैं । यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन हुआ जिससे अनेक प्राचीन सभ्यताओं का पता चला । सातवीं-छठवीं सहस्त्राब्दी ईसापूर्व में यहाँ कुदाल से खेती का प्रारम्भ हो चुका था और यहाँ के निवासी भेड़ बकरियाँ व गाय पालने लग गये थे ।वे दलदल में उगने वाले सरकंडों से और मिट्टी से अपने घर बनाते थे।“ “ और खाना खाकर आराम से सो जाते थे “अजय जोशी ने एक लम्बी उबासी लते हुए कहा और गर्दन तक रज़ाई खींचकर लम्बा हो गया ।
“ नहीं भाई इतना सुख कहाँ था “ मैने कहा यहाँ की नदियों में हर साल भीषण बाढ़ आती थी और उनकी सारी मिहनत पर पानी फिर जाता था झोपड़ियाँ बह जाती थीं, आदमी और मवेशी नष्ट हो जाते थे,दलदली बुखार,बिच्छू कीड़े-मकोड़ों से लोग त्रस्त रहते थे,जंगली शेर और सुअर हमला कर देते थे ..” “एक मिनट भाईसाहब शेर तो जंगली ही होते हैं ना ?” राममिलन भैया ने बहुत देर बाद मुँह खोला था । “हाँ भाई उस समय तो जंगली ही होते थे “ मैने कहा और शेर तो आज भी जंगली ही हैं , सुअरों की बात मै नहीं कर रहा” राममिलन भैया ने एक्सपर्ट कमेंट किया “ सुअर तो सब शहर में बस गये हैं और अब चुनाव भी लड़ने लगे हैं ।“उसके बाद फिर सुअरों की ही बातें चलती रहीं मनुष्यों की बातें कुछ देर के लिये स्थगित कर दी गईं ।
आपका शरद कोकास

मंगलवार, 2 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-चार


एक पैसे में कितनी सिगरेट आती थीं?
दिन की रोशनी में हम टीले को पहली बार देख रहे थे। रात में जो टीला डरावना और रहस्यमय लग रहा था दिन में वह शांत और सुन्दर प्रतीत हो रहा था।मैं सोचने लगा अन्धेरे और डर के सम्बन्ध के बारे में। बचपन से ही हमारे अवचेतन में यह सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता है और फिर हम जीवन भर अन्धेरे से डरते रहते हैं। सुबह की धूप टीले को अपना दुलार दे चुकी थी। हमने सोचा आज कुदाल हाथ में लेकर मज़दूर की भूमिका निभाई जाये अखिर शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ेगी लेकिन आर्य सर ने ज्ञान दिया कि निखात में कुदाल कितनी सावधानी से चलाना है वह हमें सीखना होगा। “मतलब हम मज़दूर बनने के लायक भी नहीं हैं? अजय ने सवाल किया। “नहीं भाई, ऐसा नहीं है लेकिन इसके लिये भी कुशलता की आवश्यकता होती है ज़रा सी असावधानी से कोई महत्वपूर्ण वस्तु टूट सकती है,गड्ढा खोदने और निखात में कुदाल चलाने में अंतर है ।“
वैसे भी उत्खनन का यह पहला दिन हम लोगों की डायरी मे ऑब्ज़रवेशन के लिये तय था। इस दिन हमे सिर्फ यह देखना था कि ट्रेंच के लिये जगह कैसे तय की जाती है,किस तरह ट्रेंच का आकार तय किया जाता है,कैसे नाप लिया जाता है मार्किंग कैसे की जाती है और टूल्स कैसे तैय्यार किये जाते है वगैरह ।डॉ.आर्य के सान्निध्य में आज का यह दिन अच्छा बीता। हाँ मज़दूरों से भी हमने दोस्ती कर ली क्योंकि वे निरक्षर ही सही कुदाल चलाना तो हमसे बेहतर जानते थे।हाँ अक्षर उनके लिये उसी तरह अनचीन्हे थे जिस तरह इतिहासकारों के लिये सिन्धु घाटी की लिपि जिसे तमाम कोशिशों के बावज़ूद अब तक ठीक ठाक पढा नही जा सका है।
इस तरह सारा दिन विषय के साथ परिचय में ही बीत गया । इस बीच हम लोगों ने टीले के आसपास के क्षेत्र में घूम घूम कर ताम्बे के पंचमार्क या आहत सिक्के भी एकत्रित किये। ये सिक्के ठीक उसी तरह थे जैसे कभी ताम्बे का एक पैसे का सिक्का चला करता था। ये सिक्के पुराने होने के कारण तथा उस पर आक्साइड की परत चढ जाने के कारण हरे से हो गये थे और उन पर मार्क की हुई सील भी पढी नहीं जा रही थी.। सिक्कों को इकठ्ठा करते हुए मै सोचने लगा क्या इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिये गुड़िया खरीद कर लाया था,या कोई किसान अपने खेत के लिये बैल? अशोक ने पुछा “यार उस ज़माने में इस एक सिक्के में कितनी सिगरेट आती होंगी?” “चुप “ मैने कहा”उस ज़माने के लोग सिगरेट नहीं पीते थे “ “तो फिर सुबह उनका मामला कैसे पिघलता था?” अशोक बोला। अबकी बार मैने उसे जो घूरकर देखा तो वह चुप हो गया।
आपका शरद कोकास