शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -आठवाँ दिन -एक


 एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -आठवाँ दिन -एक 
 सिनेमा का गाना गाने से भी साँप का ज़हर उतर जाता है ?
            आज हम लोगों ने खुदाई शुरु ही कि थी जाने कहाँ से एक सांप घूमता हुआ आ गया । और हमारी ट्रेच में घुस गया .. मजदूर लोग डर कर दूर खड़े हो गए । उन दिनों युनिवर्सिटी से एक शोधकर्ता भी वहाँ आया हुआ था , उसने आव देखा न ताव तुरंत एक लाठी उठाई और सांप को मारने के लिये तत्पर हुआ ही था कि डां वाकणकर ने उसे डाँट लगाई क्या करते हो यह सांप जहरीला थोड़े ही .. और होता भी तो साँप को मारते हैं क्या ? ‘’
            खैर हमने गढढे में फंसे उस बेचारे सांप को टांग टूंग कर बाहर निकाला,बाहर निकालते ही वह झाड़ियों की ओर भागा .. और गुम हो गया .. । अशोक ने कहा .. बेचारा .. सोच रहा होगा कहाँ इन जहरीले आदमियों के बीच फंस गया ।
            हमने सर से पूछा .. ‘’ सर आप कैसे पहचान जाते हैं सांप पायजनस है या नान पायजनस ? ‘’ सर ने कहा .. भई मुझे तो अब देखदेख कर आदत हो गई है .. लेकिन यदि सांप काट भी ले तो उसके दंश से जाना जा सकता है कि वह पायजनस है या नान पायजनस । पायजनस साँप के दाँतों के निशान साफ दिखाई देते हैं  ।
            ‘’ लेकिन सर ये बैगा , ओझा , गुनिया लोग जो सांप का जहर उतारने का दावा करते है .... ‘’ ‘’ अरे वो सब बेवकूफ बनाते हैं ‘’ सर ने कहा .. अव्वल तो वे दंश देखते है .. यदि जहरीले सांप का दंश रहा तो मना कर देते है , आज नहीं उतारुँगा , आज पूर्णिमा है , आज एकादशी है , गुरुवार है आदि कह कर .. और नानपायजनस रहा तो फिर बात ही क्या .. दो चार बार जहर उतारने का नाटक करते है और भोलेभाले ग्रामीणों से पैसा वसूलते हैं ।
            ‘’ सर लेकिन कहते हैं मंत्र से जहर उतर जाता है । ‘’ अजय ने पूछा । सर हँसने लगे ,” अरे पगले .. जहर होगा तभी ना .. नानपायजनस सांप काटे तो मंत्र पढो या सिनेमा का गीत गाओ एक ही बात है । और पायजनस रहा तो उनके बाप से भी नही उतरनेवाला .. उसके लिए तो विषरोधी इंजेक्शन ही लगाना ही पड़ेगा । ‘’
            ‘’ अच्छा ‘’ अजय ने कहा ‘’ इसका मतलब जब ये बैगा लोग देख लेते है कि विषधारी साँप ने काटा  है तब ये बहाने बनाने लगते है .. या कहते है कि अस्पताल ले जाओ । ‘’ .. या फिर कोई जिद्दी बैगा नाम कमाने में चक्कर में अपना जोर अजमाता है और तब तक देर हो जाती है और मरीज मर जाता है ‘’ रवीन्द्र बोला
            सर ने कहा ‘’ क्या करोगे भाई .. अपने देश से अंधविश्वास कब दूर होगा .. पता नहीं ।

(हमारे देश में अन्धविश्वास का यह आलम है कि हम गुस्से में कुछ भी कर सकते हैं । साँप तो क्या ,दंगों में लोग बिना यह सोचे कि इंसान ज़हरीला है या नहीं इंसान को मार देते हैं लेकिन इंसान ज़हरीला हो तो क्या उसे मार देंगे ? और आपके पास इसका मापदंड क्या है ?  हमारे एक मित्र एड्वोकेट गणेश हलकारे बताते थे कि एक बार  पत्नी की हत्या के एक आरोपी से जेल मे सवाल पूछा गया तो उसने बताया कि वह साँप देखते ही उसे मार देता था ,बस उसी तरह उसने पत्नी को मार डाला । साँप के बारे में और जानने के लिये सुश्री लवली कुमारी का ब्लॉग "भारतीय भुजंग " देखिये - शरद कोकास )
( चित्र गूगल से साभार ) 


गुरुवार, 10 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –तीन

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –तीन
मतलब बैल और आदमी की कीमत एक बराबर ?
“हुआ यह कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पुरातत्ववेत्ताओं को काले पत्थर का ढाई मीटर ऊँचा एक स्तम्भ मिला जिस पर हम्मूराबी की यह कानून संहिता खुदी हुई थी । “ मैने बताया । “ अच्छा क्या लिखा था उस पर “ अजय ने पूछा । “ ऐसा है “ मैने कहा “ अब उसका पूरा पाठ तो मुझे याद नहीं है ,अपन लौटेंगे तो लायब्रेरी में देख लेंगे फिर भी उसकी मुख्य बातें जो मैने पढी हैं कुछ इस प्रकार हैं । जैसे,, मै हम्मूराबी ,देवताओं द्वारा नियुक्त शासक ,सभी राजाओं में प्रथम और फरात के तटीय क्षेत्रों का विजेता हूँ । मैने सम्पूर्ण राष्ट्र को सत्य एवं न्याय की शिक्षा प्रदान की है तथा लोगों को समृद्धता प्रदान की है ।“
मतलब हम्मूराबी की हिन्दी बहुत बढ़िया थी “ अजय ने तपाक से रियेक्ट किया । रवीन्द्र ने तत्काल अपने माथे पर हाथ पटका और कहा “ रहे ना तुम कोल्हू के बैल , अरे हम्मूराबी की विधि संहिता का यह हिन्दी अनुवाद है । हाँ शरद सुनाओ आगे क्या लिखा था । “ मैं तुरंत बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया और हम्मूराबी की मुद्रा बनाकर साभिनय कहना शुरू किया “ सुनो प्रजाजन .. आज से जो भी राजा की या मन्दिर की सम्पत्ति चुरायेगा उसे मृत्युदंड मिलेगा और जो चोरी का माल रखेगा उसे भी । मैने देखा सब को मज़ा आ रहा था । मैने आगे कहना शुरू किया “ जो दास या दासी चुरायेगा ,जो भागे हुए दास को शरण देगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा । जो दास के शरीर पर लगा निशान मिटायेगा उसकी उंगलियाँ काट दी जायेंगी ।“
“ यह निशान वाला क्या चक्कर है यार “ अजय ने फिर बीच में टोक दिया । रवीन्द्र ने उसे जवाब दिया “ उस ज़माने में हर दास दासी के शरीर पर जलाकर या दागकर ऐसा निशान बना दिया जाता था जिससे उसके मालिक का पता चल जाता था । “ बाप रे.. बहुत यातनादायक होता होगा यह तो “ अजय ने कहा । “ हाँ “ मैने आगे बताना शुरू किया “ यही नहीं उस विधि संहिता में इससे भी कठोर दंडों का प्रावधान था ,जैसे जो पराये दास की हत्या करेगा उसे बदले में दास देना होगा और इसी तरह बैल के बदले में बैल । “मतलब बैल और आदमी की कीमत एक बराबर ? “ अजय ने सवाल किया । “अरे वा ! ” रवीन्द्र ने खुश होकर कहा “ यह किया तुमने आदमियों जैसा सवाल । “ हाँ “ मैने कहा “लेकिन सिर्फ दास ही थे जिन्हे मनुष्य नहीं माना जाता था । यह वर्गभेद इतन अधिक था कि जो अपने से उच्च वर्ग के या सभ्रांत वर्ग के या पुरोहित वर्ग के किसी व्यक्ति को गलती से भी थप्पड़ मार दे तो उसे बैल के चमड़े से बने हंटर से साठ कोड़े लगाये जाते थे । इसी वज़ह से लोग अपने पत्नी बच्चों सहित सभ्रांत वर्ग की गुलामी किया करते थे ।
“ बड़ी भयानक बात बताई यार तुमने” रवीन्द्र ने कहा । “ मुझे तो आज नीन्द नहीं आनेवाली । “ “ चुपचाप सो जाओ “ मैने कहा “ हमारे देश में इस से भी भयानक बातें घटित होती हैं नींद उड़ाने वाली ।


( हमारे देश में आज भी श्रम कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं । आपको होटलों , पंचर की दुकानों, मिस्त्रियों आदि की दुकानों से लेकर बड़े बड़े संस्थानों ,कारखानों में लगे नोटिस के बावज़ूद 14 साल से कम उम्र के बच्चे काम करते मिल जायेंगे , यह शोषण कहाँ कहाँ है आप खुद जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी इसके खिलाफ आवाज़ उठाने के बारे में सोचा है ?- शरद कोकास )

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –दो


  एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –दो
मिस्त्र की हसीना का कोई किस्सा सुनाओ यार
            आज रात बिस्तर में घुसते ही रवीन्द्र ने सवाल किया “ यार तैने बहुत दिनो से कोई किस्सा कहानी नहीं सुनाया है क्या बात है ? “ मैने कहा “ नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है ,हम लोग तो खुद ही नये किस्से गढ़ने में लगे थे सो छूट गया होगा ,खैर सुनाता हूँ ,बताओ अपने देश का किस्सा सुनोगे या फॉरेन का । अजय मिस्त्र मेसोपोटामिया यूनान आदि को फॉरेन कहता था ,तुरंत बोला “ मिस्त्र की हसीना का कोई किस्सा विस्सा सुनाओ यार ।“ मैने कहा ..” बेटा भाभी को पता चलेगा कि तू अभी भी हसीनाओं के किस्सों में दिलचस्पी लेता है तो तेरा किस्सा बना देगी ।“ अजय बोला “ तो क्या हुआ सिर्फ किस्से ही तो सुनता हूँ ।“
खैर चलो आज मैं तुम लोगों को हम्मूराबी की कहानी सुनाता हूँ ।“ इससे पहले कि अजय नाक भौं सिकोडे मैने बखान शुरू कर दिया “ यह तो तुम लोग जानते ही होगे कि चौथी शताब्दी ईसापूर्व के अंत तक मेसोपोटामिया में राज्यों की स्थापना हो चुकी थी और फरात व दज़ला नदियाँ जहाँ करीब आ जाती हैं वहाँ बेबीलोन नगर बस चुका था । यह एक बड़ा व्यापारिक नगर था जहाँ बड़ी बड़ी मंडियाँ और गोदाम थे । इस बेबीलोन नगर में 1792 ईसापूर्व में हम्मूराबी नामका एक शासक हुआ जिसने 1750 ईसापूर्व तक शासन किया ।
बेबीलोन में अपार सम्पदा थी और हम्मूराबी के पास विशाल सेना । हम्मूराबी एक एक कर आसपास के राज्य हस्तगत करता गया । अपने आप को वह देवता समझता था और इस बात का उसे बहत गर्व था । उसने अपनी प्रजा के लिये एक कानून सन्हिता बनाई थी जो इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है । “ अच्छा ऐसा क्या था इस संहिता में ? “  रवीन्द्र ने पूछा । मैने बताया “  इस संहिता में सरकारी अधिकारियों के पास असीमित अधिकारों की व्याख्या थी । वे इसी संहिता के अनुसार राज्य के नागरिकों के आपसी झगड़ों का निपटारा करते थे और राजाज्ञा का उलंघन करने वालों को कठोर दंड दिया करते थे ।
“ मतलब हमारे यहाँ के सरकारी अधिकारियों जैसे थे । “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । “ नहीं भाई हमारे सरकारी अधिकारी उनके आगे कहाँ लगते हैं ।“ मैने कहा “ हमारे यहाँ तो जनतंत्र है और उस समय राजतंत्र था । राजतंत्र में राजा की ताना शाही आम बात है । “ “ लेकिन हमारे यहाँ भी तो सत्ताप्रमुख एक तरह से राजा ही होता है ना । “ अशोक ने कहा । रवीन्द्र ने बहस के बीच प्रवेश किया “ यह तो छोड़ो , ज़िले में कलेक्टर और गाँव में पटवारी तक राजा होता है । “ “ हाँ होता तो है “ मैने कहा लेकिन सबके ऊपर न्यायपालिक होती है और संविधान से ऊपर कुछ नहीं हो सकता । “ अजय बार बार हम लोगों का मुँह देख रहा था ऊब कर बोला “ अरे यार तुम लोग भी कहाँ की असंवैधानिक बहस में उलझ  गये , शरद तुम हम्मूराबी का किस्सा सुना रहे थे ना ? “
            “ हाँ भई “ मैने कहा “ लो आगे सुनो ।“ 
( सॉरी मिस्त्र की हसीना का किस्सा तो रह ही गया ,फिर कभी सुनाउंगा । फिलहाल यह मैप देखें, नये और हम्मूराबी के वक़्त के दो गूगल से  साभार और दो मेरे पास से , मेरा मानना है इतिहास पढ़ने के लिये यदि सामने नक्शा हो तो इतिहास जल्दी समझ में आता है -शरद कोकास )

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –एक

विगत दिनो मेरे अनेक नये मित्रों ने मेरे इस ब्लॉग पुरातत्ववेत्तापर दस्तक दी है । आप सभी को मैं अत्यंत विनम्रता पूर्वक यह जानकारी देना चाहता हूं कि मैने इस ब्लॉग की रचना वैज्ञानिक दृष्टि के विकास और इतिहास बोध निर्माण के लिये की है । इसमें मै सबसे पहले अपने उन दिनो की डायरी लिख रहा हूँ जब मै विक्रम विश्वविध्यालय उज्जैन में प्राचीन भारती इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व में स्नातकोत्तर का छात्र था । उन दिनो भारत के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. वि.श्री. वाकणकर ( जिन्हे भीमबैठका गुफाओं में शैल चित्रों की खोज का श्रेय प्राप्त है ) के निर्देशन मे इन्दोर के पास चम्बल के किनारे दंगवाड़ा नामक स्थान पर हम लोगों ने इस उत्खनन शिविर में प्रशिक्षण प्राप्त किया था । उस शिविर की रोचक जानकारी मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । इसमें डॉ.वाकणकर द्वारा प्रदत्त इतिहास और पुरातत्व की ज्ञानवर्धक जानकारी तो है ही साथ साथ छात्र जीवन की मस्तियाँ भी शामिल हैं । एक अर्थ में पहलद्वारा प्रकाशित मेरी लम्बी कवितापुरातत्ववेत्ता की यह भूमिका भी है । यह दैनन्दिनी आपको अवश्य पसन्द आयेगी । निवेदन यह भी है कि यदि पिछली कड़ियाँ भी पढ़ेंगे ( जिसकी सुविधा साईड बार में 25 पूर्व पोस्ट वाले गैजेट में है) तो आपका यह आनन्द द्विगुणित हो जायेगा । आपका –शरद कोकास

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिनएक

ज़मीन के नीचे एक शहर मिल रहा है

कल की घटना से राममिलन अत्यंत दुखी थे और घोषणा कर चुके थे कि अब वे एक पल भी इसकैम्प में नहीं रहना चाहते ।
डॉ. आर्य ने बहुत गम्भीरता से हम लोगों से कहा कि “देखो भाई ,पंडितबहुत डर गया है, अब उसे ज़्यादा परेशान मत करो वरना वह कैम्प छोड़कर चल देगा और बात सर तक पहँचजायेगी तो बहु त मुश्किल हो जायेगी ।“ डॉ.वाकणकर कल शाम ही किसी काम से उज्जैन चले गये थे । हमनेसोचा जब तक वे आयें तब तक तो मज़ा लिया ही जा सकता है सो हमने डॉ. आर्य को भी अपनी पार्टी में शामिल करलिया और फिर दिन भर राममिलन जी को छेड़कर मज़ा लेते रहे ।
बहरहाल डॉ.वाकणकर की अनुपस्थिति में आज हम लोगों ने ट्रेंच पर स्वतंत्र रूप से काम किया और पुन: पेगक्रमांक 2 से प्रारम्भ कर दक्षिण की ओर दो मीटर के वर्गाकार टुकड़े में खुदाई की । दोपहर तक हम लोग 1.35 मीटर तक पहुंच चुके थे । इस बीच दूसरे स्तर पर हमे 10 सेंटीमीटर की रेत की एक परत मिली तथा इसके पश्चाततीसरे स्तर पर ईट का बना एक फ्लोर प्राप्त हुआ । इस फ्लोर को स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिये हमने बाईं ओरइसका विस्तार किया ।
शाम को डॉ.वाकणकर जैसे ही पहुंचे सबसे पहले उन्होने तीसरे स्तर पर प्राप्त इस फ्लोर का अवलोकन किया औरबताया कि यह किसी
ताम्राश्मयुगीन मकान का हिस्सा लगता है जो किसी आक्रमण अथवा अग्निकांड केफलस्वरूप नष्ट हुआ है । सर द्वारा प्रदत्त इस जानकारी ने हमें उत्साह से भर दिया । हमे याद आयाकि हड़प्पा और मोहंजोदाड़ो में भी खुदाई के दौरान इसी तरह पूरा का पूरा शहर निकला था ।वहाँ उन अवशेषों के बीच खड़े पुरातत्ववेत्ताओं के छाया चित्र हम लोगों ने देखे थे । हम लोग कल्पना करने लगे कि बस दो-तीन दिनों में हम भी पूरा शहर ढूँढ निकालेंगे और फिर इन अवशेषों के बीचखड़े रहकर फोटो खिचवायेंगे ।
यह बात तो हमे बहुत बाद में समझ आई कि किसी भी अवशेष की प्रारम्भिक अवस्था को देखकर उसके भविष्य केबारे में अटकलें नहीं लगाना चाहिये क्योंकि अनुमान गलत भी हो सकते हैं और
पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा हमेशा के लिये गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है जो भी हो आज लौटतेसमय हम लोग बहुत उत्साह में थे ऐसा लग रहा था जैसे हमारा आना सार्थक हो गया हो । इस खुशी में आज हमलोग फिर एक बार सिटी का चक्कर लगा आये । हाँ ..आज राम मिलन हमारे साथ नहीं गये । (चित्र गूगल से साभार )
पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा हमेशा के लिये गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है ।क्या कहते हैं आप ?-आपका -शरद कोकास