रविवार, 27 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – एक



“ हाँ तो भाईजान आज क्या इरादा है , औरंगजेब की सल्तनत में चलें ? ” रात के भोजन के बाद रवीन्द्र ने मुझसे सवाल किया । “ बिलकुल । “ मैंने कहा “ आज सुनाते हैं आगे की यात्रा की डायरी । “ तम्बू में पहुँचकर हम लोगों की बैठक जम गई ।
मैंने डायरी निकाली और पाठ शुरू कर दिया… “ अजंता से हम लोगों ने शाम लगभग चार बजे प्रस्थान किया । लेकिन अब वापसी  जलगाँव की ओर नहीं थी बल्कि हमारा गन्तव्य औरंगाबाद था । शाम ढलने से पूर्व ही हमारी बस औरंगाबाद पहुँच गई । बस की खिड़की से धूप भीतर आ रही थी , मैं बाहर देखते हुए औरंगाबाद शहर को पहचानने की कोशिश कर रहा था । वातावरण में मग़रिब की अज़ान गूँज रही थी । दिन अब कुछ लम्बे होने लगे थे । न सूरज को वापस जाने की जल्दी थी न पंछियों को घरौंदों में वापस लौटने की चिंता थी । जल्दी तो हमें भी नहीं थी । हम सभी छात्र वैसे भी बेघर थे । अपना अपना घर छोड़कर कुछ बनने की इच्छा लेकर निकले थे , क्या बनेंगे , कहाँ रहेंगे किसी को नहीं पता था सो घर क्या और बाहर क्या इस भाव के साथ इस यायावरी का आनंद ले रहे थे ।



दिन ढलने में अभी समय था इसलिए  विचार हुआ कि धर्मशाला पहुँचने से पहले बीबी का मक़बरा  तो देख ही लिया जाए । हमारे बस ड्राइवर जमनालाल जी ने रास्ता पूछ पूछ कर आखिर बीबी का मक़बरा ढूँढ ही लिया । प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सामने थी मुगल काल की एक बेहतरीन इमारत  जिसे देखते ही बरबस मुँह से निकल गया …” अरे ! ताजमहल ! “ ठीक ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में उपस्थित थी वहाँ मुगल शासक औरंगज़ेब की बेग़म रबिया दौरानी की समाधि । लेकिन कहाँ ताजमहल और कहाँ बीबी का मक़बरा ! ताजमहल बेहतरीन सफेद संगमरमर का बना है और बीबी के मक़बरे  में यह संगमरमर सिर्फ़ सामने वाले भाग में है और वह भी लगभग पाँच साढ़े पाँच फ़ीट बस । शेष इमारत बलुआ पत्थर की है और मीनारें ईटों की बनी हुई हैं । इन पर चूने का मसाला लगा है जिसमें सीपियों की भस्म मिली हुई है ।  
ताजमहल से इस इमारत की तुलना करते हुए एक प्रश्न मन में आया , दोनों ही इमारतें सम्पन्न मुगल शासकों द्वारा बनाई गई हैं फिर इनमें इतना अंतर क्यों है । जैन साहब ने हमारी शंका का समाधान किया …” प्रारंभिक मुग़ल शासकों के समय  राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी , इसलिए  इमारतें उच्च कोटि की सामग्री से बनाई जाती थीं ,लेकिन बाद में साधनों के अभाव और धन की कमी के कारण उन्हें  सादा इमारतें बनानी पड़ीं , हालाँकि औरंगज़ेब ने भी सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने शासनकाल के प्रारंभ में दिल्ली की मोती मस्जिद जैसी इमारत बनाई परन्तु बाद में आर्थिक अभाव के कारण उसे बीबी के मक़बरे जैसी साधारण इमारत बनाने के लिए विवश होना पड़ा । बहर हाल , बात हम लोगों की समझ में आ गई थी , हम लोगों ने जी भरकर ईरान , मध्य एशिया, दिल्ली और आगरा से आई वास्तुकला की मुगल शैली के इस स्थापत्य का आनंद लिया और आगे बढ़ गए ।“  

राम मिलन भैया जो हम लोगों से रूठकर पिछले दिनों अलग तम्बू में चले गए थे उनका गुस्सा शांत हो चुका है और एक सज्जन व्यक्ति की तरह वे हम दुर्जनों के बीच आकर बैठने लगे हैं । कल वे भी सब लोगों के साथ मेरा डायरी पाठ सुन रहे थे  । सुनत हुए अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सबके सामने प्रस्तुत की... “ का हो , ई शाहजहाँ ने तो अपन लुगाई की फ़रमाइस पर ताजमहल बनवा दिया , औरंगज़ेबवा की लुगाई की भी कौनो फ़रमाइस रही थी क्या ? “
राममिलन भैया की बात सुनकर पहले तो हम लोग बहुत हंसे फिर अजय ने जवाब दिया “ अब क्या पता पंडित, बहू ने सोचा हो जब हमारी दादी सास के लिए  इतना बड़ा मक़बरा  बना है तो हमारे लिए  भी बन जाए । आखिर बड़े घर की सास है तो बहू भी कम बड़े घर की नहीं है । “
मुगलकालीन इतिहास के इस विखंडन पर मैं क्या कहता मैंने अपना सिर पीट लिया और कहा “ बस बहुत हो गया,  बाकी का यात्रा विवरण कल ।
- आपका  शरद कोकास 


रविवार, 20 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवाँ दिन – एक

मित्रों , यह डायरी काफी दिनों से स्थगित थी , इसे फिर से आगे बढ़ा रहा हूँ . यह डायरी उन दिनों की है जब मैं प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व का स्नातकोत्तर का छात्र था , और हम लोग उज्जैन के निकट दंगवाडा नामक स्थान पर उत्खनन के लिए गए थे . इस भाग में मैं अपने मित्रों को अजंता एलोरा यात्रा का वर्णन सुना रहा हूँ . ग्यारह दिनों की डायरी पढ़ने के बाद अब पढ़िए बारहवें दिन की डायरी .

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवाँ दिन – एक

सुबह सुबह रवीन्द्र ने मुझसे कहा “ यार तेरी डायरी में मज़ा आ रहा है । अभी एलोरा और औरंगाबाद की यात्रा भी बाक़ी है ना ? “ “ बिलकुल । “ मैंने कहा ...” आज रात चलते हैं ना आगे की सैर के लिए । आज का दिन उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले दिन बीते थे । कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन आने में देर हो गई  और थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए समय बहुत कम बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है  । हमें  पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे यह विचार कर हम लोग वहाँ से जाने का मन बना रहे हैं  ।  फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी ही है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा ।
शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी अक्सर एक सी हो जाती है । शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का लग चुका है सो यह भ्रमण भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । इसलिए  कि हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं  की  तरह हो जाते थे । हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए  हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमाएं पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनसे सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं ।
कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थितियाँ देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “ दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो / उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।
कल् रात भी ऐसा ही कुछ हुआ । खाना खाकर हम लोग तंबू में बैठे ही थे कि रवीन्द्र ने फरमाइश की “ यार कितने दिन हो गए तेरी आवाज़ में दुष्यंत की गज़लें नहीं सुनी “ बस फिर क्या था वह रात दुष्यंत की गज़लों के नाम से रही … “ मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वो गज़ल आपको सुनाता हूं ॥“ से लेकर तमाम गज़लें ।

रात पता ही नहीं चला हम कितने बजे सोए ।