रविवार, 27 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – एक

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – एक

“ हाँ तो भाईजान आज क्या इरादा है , औरंगजेब की सल्तनत में चलें ? ” रात के भोजन के बाद रवीन्द्र ने मुझसे सवाल किया । “ बिलकुल । “ मैंने कहा “ आज सुनाते हैं आगे की यात्रा की डायरी । “ तम्बू में पहुँचकर हम लोगों की बैठक जम गई ।
मैंने डायरी निकाली और पाठ शुरू कर दिया… “ अजंता से हम लोगों ने शाम लगभग चार बजे प्रस्थान किया । लेकिन अब वापसी  जलगाँव की ओर नहीं थी बल्कि हमारा गन्तव्य औरंगाबाद था । शाम ढलने से पूर्व ही हमारी बस औरंगाबाद पहुँच गई । बस की खिड़की से धूप भीतर आ रही थी , मैं बाहर देखते हुए औरंगाबाद शहर को पहचानने की कोशिश कर रहा था । वातावरण में मग़रिब की अज़ान गूँज रही थी । दिन अब कुछ लम्बे होने लगे थे । न सूरज को वापस जाने की जल्दी थी न पंछियों को घरौंदों में वापस लौटने की चिंता थी । जल्दी तो हमें भी नहीं थी । हम सभी छात्र वैसे भी बेघर थे । अपना अपना घर छोड़कर कुछ बनने की इच्छा लेकर निकले थे , क्या बनेंगे , कहाँ रहेंगे किसी को नहीं पता था सो घर क्या और बाहर क्या इस भाव के साथ इस यायावरी का आनंद ले रहे थे ।



दिन ढलने में अभी समय था इसलिए  विचार हुआ कि धर्मशाला पहुँचने से पहले बीबी का मक़बरा  तो देख ही लिया जाए । हमारे बस ड्राइवर जमनालाल जी ने रास्ता पूछ पूछ कर आखिर बीबी का मक़बरा ढूँढ ही लिया । प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सामने थी मुगल काल की एक बेहतरीन इमारत  जिसे देखते ही बरबस मुँह से निकल गया …” अरे ! ताजमहल ! “ ठीक ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में उपस्थित थी वहाँ मुगल शासक औरंगज़ेब की बेग़म रबिया दौरानी की समाधि । लेकिन कहाँ ताजमहल और कहाँ बीबी का मक़बरा ! ताजमहल बेहतरीन सफेद संगमरमर का बना है और बीबी के मक़बरे  में यह संगमरमर सिर्फ़ सामने वाले भाग में है और वह भी लगभग पाँच साढ़े पाँच फ़ीट बस । शेष इमारत बलुआ पत्थर की है और मीनारें ईटों की बनी हुई हैं । इन पर चूने का मसाला लगा है जिसमें सीपियों की भस्म मिली हुई है ।  
ताजमहल से इस इमारत की तुलना करते हुए एक प्रश्न मन में आया , दोनों ही इमारतें सम्पन्न मुगल शासकों द्वारा बनाई गई हैं फिर इनमें इतना अंतर क्यों है । जैन साहब ने हमारी शंका का समाधान किया …” प्रारंभिक मुग़ल शासकों के समय  राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी , इसलिए  इमारतें उच्च कोटि की सामग्री से बनाई जाती थीं ,लेकिन बाद में साधनों के अभाव और धन की कमी के कारण उन्हें  सादा इमारतें बनानी पड़ीं , हालाँकि औरंगज़ेब ने भी सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने शासनकाल के प्रारंभ में दिल्ली की मोती मस्जिद जैसी इमारत बनाई परन्तु बाद में आर्थिक अभाव के कारण उसे बीबी के मक़बरे जैसी साधारण इमारत बनाने के लिए विवश होना पड़ा । बहर हाल , बात हम लोगों की समझ में आ गई थी , हम लोगों ने जी भरकर ईरान , मध्य एशिया, दिल्ली और आगरा से आई वास्तुकला की मुगल शैली के इस स्थापत्य का आनंद लिया और आगे बढ़ गए ।“  

राम मिलन भैया जो हम लोगों से रूठकर पिछले दिनों अलग तम्बू में चले गए थे उनका गुस्सा शांत हो चुका है और एक सज्जन व्यक्ति की तरह वे हम दुर्जनों के बीच आकर बैठने लगे हैं । कल वे भी सब लोगों के साथ मेरा डायरी पाठ सुन रहे थे  । सुनत हुए अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सबके सामने प्रस्तुत की... “ का हो , ई शाहजहाँ ने तो अपन लुगाई की फ़रमाइस पर ताजमहल बनवा दिया , औरंगज़ेबवा की लुगाई की भी कौनो फ़रमाइस रही थी क्या ? “
राममिलन भैया की बात सुनकर पहले तो हम लोग बहुत हंसे फिर अजय ने जवाब दिया “ अब क्या पता पंडित, बहू ने सोचा हो जब हमारी दादी सास के लिए  इतना बड़ा मक़बरा  बना है तो हमारे लिए  भी बन जाए । आखिर बड़े घर की सास है तो बहू भी कम बड़े घर की नहीं है । “
मुगलकालीन इतिहास के इस विखंडन पर मैं क्या कहता मैंने अपना सिर पीट लिया और कहा “ बस बहुत हो गया,  बाकी का यात्रा विवरण कल ।
- आपका  शरद कोकास 


रविवार, 20 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवाँ दिन – एक

मित्रों , यह डायरी काफी दिनों से स्थगित थी , इसे फिर से आगे बढ़ा रहा हूँ . यह डायरी उन दिनों की है जब मैं प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व का स्नातकोत्तर का छात्र था , और हम लोग उज्जैन के निकट दंगवाडा नामक स्थान पर उत्खनन के लिए गए थे . इस भाग में मैं अपने मित्रों को अजंता एलोरा यात्रा का वर्णन सुना रहा हूँ . ग्यारह दिनों की डायरी पढ़ने के बाद अब पढ़िए बारहवें दिन की डायरी .

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवाँ दिन – एक

सुबह सुबह रवीन्द्र ने मुझसे कहा “ यार तेरी डायरी में मज़ा आ रहा है । अभी एलोरा और औरंगाबाद की यात्रा भी बाक़ी है ना ? “ “ बिलकुल । “ मैंने कहा ...” आज रात चलते हैं ना आगे की सैर के लिए । आज का दिन उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले दिन बीते थे । कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन आने में देर हो गई  और थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए समय बहुत कम बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है  । हमें  पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे यह विचार कर हम लोग वहाँ से जाने का मन बना रहे हैं  ।  फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी ही है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा ।
शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी अक्सर एक सी हो जाती है । शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का लग चुका है सो यह भ्रमण भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । इसलिए  कि हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं  की  तरह हो जाते थे । हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए  हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमाएं पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनसे सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं ।
कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थितियाँ देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “ दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो / उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।
कल् रात भी ऐसा ही कुछ हुआ । खाना खाकर हम लोग तंबू में बैठे ही थे कि रवीन्द्र ने फरमाइश की “ यार कितने दिन हो गए तेरी आवाज़ में दुष्यंत की गज़लें नहीं सुनी “ बस फिर क्या था वह रात दुष्यंत की गज़लों के नाम से रही … “ मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वो गज़ल आपको सुनाता हूं ॥“ से लेकर तमाम गज़लें ।

रात पता ही नहीं चला हम कितने बजे सोए ।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – ग्यारहवाँ दिन – तीन

भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए
अजय ने अचानक बीच में सवाल किया  “  लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “ हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “ आगे यही लिखा है मैंने । और मैंने आगे पढ़ना शुरू कर दिया ।
“ बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस में अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया ।उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।
इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय , रवीन्द्र , अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हे पहली बार बता रहा हूँ । “ फिर क्या हुआ ? “ अशोक ने सवाल किया ।
“ बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं , बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ , मुद्राओं में दुख की परिभाषा , चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …ग्रहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा , भिक्षुओं के विभिन्न क्रियाकलाप , दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या , इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम किस कला व संस्कृति की बात करते हैं , असली संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।
बस इस तरह गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज गए । यह समय बहुत कम था इतना कुछ देखने के लिए लेकिन वापस लौटना भी था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिये यहाँ आयेंगे हम लोगों ने उस अल्प समय के अवलोकन पर संतोष कर लिया और  बाहर आ गए । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे और यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “ अरे भाई , भूख - वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को । खैर भूख तो एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था । “ चलो महेश । “ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – ग्यारहवाँ दिन – दो - अजंता यात्रा


किस्सा यह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा में विक्रम विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व के स्नातकोत्तर के छात्र उत्खनन शिविर में आए हुए हैं और कार्य समाप्ति के पश्चात तम्बू में बैठकर गपशप कर रहे हैं । शरद कोकास सुना रहे हैं अपने मित्रों को अपनी अजंता यात्रा का वर्णन । छात्रों से भरी बस अजंता की गुफाओं के द्वार तक पहुँच चुकी है । अब पढ़िये इससे आगे ... 

          मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकीं जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया ।
            मैं मन ही मन हँसा । कितना मूर्ख हूँ मैं ,जो सोच रहा था कि यह गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमे उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।
            सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें सबसे पहली गुफा जो मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो , तीन ,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जो गुफा बनी थी वह क्रमांक दस है । इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं ।
            अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हे देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि वह मनुष्य कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था , लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हे अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।
( सभी चित्र गूगल से साभार ) 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – ग्यारहवाँ दिन – एक

अरे सब गुफायें कहाँ हैं ?
          सुबह आर्य साहब ने कहा “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर , कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है , लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजंता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । यह लेखक है ना , जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । “
            फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रही थीं और हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो बहुत लम्बी यात्रा करके आई हों । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है ।
            शाम देर तक काम करते रहे हम लोग । डॉ. वाकणकर ने आज हमें सिखाया कि किस तरह अवशेषों को साफ करके कपड़े की थैलियों में बन्द किया जाये और उन्हे टैग किया जाये । भोजन के पश्चात तम्बू में घुसे ही थे कि अजय ने फरमाइश की “ तो अब अजंता के लिए प्रस्थान किया जाए ? “ मैंने अपनी डायरी निकाल ली और जनता के बीच उसका वाचन प्रारम्भ कर दिया ।
            “ इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । जलगाँव से अजंता की दूरी 61 किलोमीटर है और इसमें लगभग एक घन्टा लगता है । मैं खिड़की के पास बैठा था और मील के पत्थरों को पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी , अजंता केव्ह्स 3 कि मी , अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे ,जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।
             मैं सोचने लगा समय के उस हिस्से के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा , यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे , यह बस, गाड़ियाँ और इस तरह के वाहन भी नहीं रहे होंगे । बस यहाँ रही होगी  यह निर्जन पहाड़ी , नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार , आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी । वातावरण  में गूंजते होंगे  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर …।
            अचानक बस ने आखरी मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में भटकता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों ,टूरिस्ट बसों , छोटी छोटी दुकानों और होटलों की भीड़ के बीच जा गिरा । मुझे लगा मैं जैसे किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौनसी जगह है । मैंने आश्चर्य व्यक्त किया …अरे सब गुफायें कहाँ हैं ? किसीने कुछ नहीं कहा । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।
(चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 24 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – छह

            उज्जैन के पास दंगवाडा में उत्खनन शिविर चल रहा है । ठंड के दिन हैं । हम सभी मित्र तम्बू में रज़ाई ओढ़े बैठे है और मैं अपनी डायरी से पढ़ रहा हूँ अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ... 

 एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – छह
चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा
इस तरह उदर की मांग पूर्ण होते ही मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । उस दिन हमे समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग क्यों आगे की सीटों की मांग करते हैं ।
             सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसीमें हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ् देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले की अन्य लोगों किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती कर चुके थे ।
            सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी बस हम दोनो वहाँ कचरे के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । नींद से बोझिल पलकें , सूखे होंठ , बिखरे बाल लिये मैंले कपड़ों में हम लोग , अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच पिछली सदी के कोई पात्र लग रहे थे ।
            पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमे क्यों नहीं जगाया तो एक मित्र ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है । “ बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।
            “ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जायेंगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  
(चित्र गूगल से साभार ) 

शनिवार, 15 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – पाँच


         " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " दसवें दिन के इस पाँचवें खंड में दृश्य कुछ इस तरह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा नामक गाँव में चम्बल नदी के किनारे टीले पर हम लोगों का कैम्प लगा है । दिन भर का काम समाप्त हो चुका है और शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की सैर करने और भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बुओं में घुस गये हैं और रज़ाई ओढ़े गपिया रहे हैं और मैं सुना रहा हूँ अपने मित्रों को अपनी अजंता एलोरा यात्रा की डायरी .. चलिये आप भी चलिये हमारे साथ
           

            उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर बस इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी । अशोक समझ गया मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । बहुत देर तक खामोश बैठा रहा मैं । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. सुनो भैया सरद.. अंत: मेरा मूड ठीक हो गया , उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा ।
इन्दौर का प्रसिद्ध राजवाडा 
            हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिये रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग इंदौर पहुँचते ही हम लोगों ने महसूस किया कि तीव्र भूख के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी सुबह से कुछ खाया नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ उठाई और पेट दिखाकर कहा .. लो ,देखो कान लगाकर .. खाना दो खाना दो की आवाज़ आ रही है कि नहीं । “ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था ..। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है , इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिये उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है । “
हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से पैकेट निकाल लिये थे । यह सभी हॉस्टल के छात्र थे जो मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आये थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी कीं लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया वैसे भी इन्दौर शहर में आयें और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हे आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।
            मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” आमाशय ही लिखा है , गर्भाशय नहीं लिखा जो तुम इतनी अश्लील हँसी हँस रहे हो ।“ अजय हँसते हँसते बोला … “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे , इसलिये बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे  हमे सब पता चल गया था । “ ठीक है , ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “ लो आगे भी तो सुनो । और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी ।