शुक्रवार, 19 जून 2020

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-दो-चम्बल के पानी में चाँद


इस जंगल में हमारे लिए  यह पहला मुफ़्त का मनोरंजन कार्यक्रम था । बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर । पास ही चम्बल नदी बहती थी । हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने । हमने अब तक चम्बल के बीहड़ और उनमे रहने वाले डाकुओं के बारे में ही सुना था लेकिन यहाँ न बीहड़ थे न डाकू  । फिर भी हम हाथ मुंह धोते हुए अगल बगल देखते रहे ..कहीं किसी डाकू का घोड़ा न बंधा हो । लौटकर आए  तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई । चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुँच गए  । यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही ।

अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में । बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव जैसे पहली क्लास के किसी बच्चे ने अपनी ड्राइंग कॉपी में चित्र बनाये हों । शांत वेग से बह रही थी चम्बल जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सुलाने के बाद आधी नींद में सो रही हो । हवा चलती तो चांद का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता । वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे ।

डॉ.वाकणकर ने दो दिन पूर्व जिस आयताकार ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश में थी , उसे जगाना हमने उचित नहीं समझा और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे । उसके भीतर गहन अन्धकार था , सदियों से भीतर अवस्थित  अन्धकार । मैं उसे देखता रहा ..कविता कहीं भीतर से बाहर आने को आतुर थी ..मैंने कहा ..” ऐसा लगता है जैसे इस अतल गहराई में कोई रंगमंच है, जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है । जाने कितनी सभ्यताओं के पात्र आवागमन कर रहे हैं । कहीं युद्ध चल रहा है तो कहीं कोई चरवाहा किसी पेड़ के नीचे बैठकर बंसी बजा रहा है । कहीं कोई बच्चा पेड़ से लटके झूले पर बैठा झूला झूल रहा है ,कहीं कोई हरकारा दूर से अपने घोड़े पर बैठा आता हुआ दिखाई दे रहा है । “ “ सुनो सुनो  ...” अजय ने अचानक कहा “ मुझे तो घोडों की टापों की आवाज़ भी आ रही है...” “ बस कर यार ।” रवीन्द्र बोला ” जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं , यह बलगम की आवाज़ होगी ।“ हम लोग रूमानियत से वास्तविकता के धरातल पर आ चुके थे ।

कल दिन में निखात के उस अंधेरे से साक्षात्कार करेंगे  यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गए  । मैंने कमर सीधी करनी चाही । पूरा आसमान मेरी आँखों के सामने था और उसमें चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद । चाँद की रौशनी की वज़ह से सितारे थोड़े मद्धम हो गए थे । मैंने उनमें  ध्रुव तारा ढूँढना चाहा ताकि मैं उत्तर दिशा का पता लगा सकूँ । चाँद को देखते हुए मुझे अचानक ऋतुओं का ख़याल आया और फिर ऋतुओं और चाँद सूरज के सम्बन्ध के बारे में । रवीन्द्र ने डॉ.वाकणकर के सान्निध्य में अपने खगोलीय ज्ञान का काफी विस्तार कर लिया था । मैंने रवीन्द्र से सवाल किया " यार यह बसंत का अयनांत तो नहीं है ? " रवींद्र ने जवाब दिया " भाई अभी अयनांत कहाँ, पिछला अयनांत 21 दिसंबर को हो चुका है और अगला इक्कीस जून को आएगा ।  मैंने फिर रवींद्र से सवाल किया ..यार लेकिन यह अयनांत और विषुव निर्धारित तिथि पर कैसे आते हैं ?"

रवींद्र ने कहा " चलो मैं तुम्हें एक सिरे से समझाता हूँ कि अयनांत यानी सोलिस्टीस और विषुव यानी इक्विनॉक्स क्या होता है । सबसे पहले विषुव यानि इक्विनॉक्स के बारे में बताता हूँ जब रात और दिन बराबर होते हैं । यह हमारे देश में 21 मार्च और 23 सितम्बर को होता है जब रात और दिन बराबर होते हैं । पहले कुछ बेसिक बातें समझ लो । तुमने ग्लोब में यह देखा होगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर साढ़े तेईस डिग्री झुकी हुई है और वह स्वयं इसी तरह घूमते हुए सूर्य के चक्कर भी लगाती है । उसका यह पथ गोलाकार अथवा लम्बवत नहीं होता बल्कि दीर्घ वृत्ताकार यानि इलेप्टिकल होता है । पृथ्वी के ठीक मध्य से अर्थात उसके पेट से एक काल्पनिक रेखा जाती है जिसे भूमध्य रेखा कहते हैं । पृथ्वी का उपरी हिस्सा जो नासपाती जैसा चपटा है उत्तर ध्रुव तथा दक्षिणी हिस्सा दक्षिण ध्रुव कहलाता है । इस तरह दो गोलार्ध बनते हैं उत्तरी व दक्षिणी ।

अब होता यह है कि सूर्य के चारों ओर घूमते  हुए पृथ्वी की  साल में एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य की ओर अधिक झुकी होती है और एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य के विपरीत झुकी रहती है । पहली स्थिति में दिन बड़ा होता है और दूसरी स्थिति में रात । लेकिन दो बार ऐसी स्थिति आती है जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है न उसके विपरीत बल्कि वह मध्य में होती है । इन दोनों  स्थितियों में रात और दिन बराबर होते हैं और इन्हें विषुव अथवा इक्विनॉक्स  कहते हैं । अगर इक्विनोक्स के समय हम भूमध्य रेखा पर खड़े हों तो सूर्य ठीक हमारे सर के ऊपर होता है । वैसे दिन और रात बराबर होने कि स्थिति सैद्धांतिक है वास्तव में ऐसा होता नहीं है, फिर अलग अलग देशों में तिथियों में भी फर्क होता है ।

मैंने कहा " इसका अर्थ यह हुआ कि  पृथ्वी का एक गोलार्ध छह माह तक सूर्य की  ओर झुका रहता है और दूसरा गोलार्ध अगले छह माह तक । इसी वज़ह से उत्तर व दक्षिण ध्रुव पर छह माह का दिन और छह माह की रात होते हैं । और जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मी होती है तो दक्षिणी गोलार्ध में ठण्ड पड़ती है उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले लोगों के लिए इक्विनॉक्स  के अगले छह माह दिन वाले होते हैं जबकि दक्षिण ध्रुव पर रहने वालों के लिए अगले छह माह रात के । मतलब इस विशेष दिन दोनों ध्रुव के लोगों को सूर्य का प्रकाश एक जैसा देखने को मिलता है ।

" बिलकुल ठीक " रवींद्र ने कहा " अब अयनांत या सोलिस्टीस  के बारे में बताता हूँ यह भी साल में दो बार आता है 21 जून को जब दिन सबसे बड़ा होता है और 21 दिसंबर को जब दिन सबसे छोटा होता है । ग्रेगोरियन वर्ष आरम्भ होने के समय अर्थात जनवरी में सूरज दक्षिणी गोलार्ध में होता है फिर वह उत्तरी गोलार्ध में जाना शुरू करता है मकर संक्रांत से । लेकिन दिसंबर आते आते फिर दक्षिणी गोलार्ध में पहुँच जाता है । इस तरह आते जाते सूर्य वर्ष में दो बार भूमध्य रेखा पर होता है । असल में सूर्य कहीं नहीं जाता वस्तुतः यह भी पृथ्वी के घूमने के कारण ही होता है । अयनांत को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जून में यदि उत्तर ध्रुव से देखा जाए तो सूर्य  सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है इसे ग्रीष्म अयनांत  कहते है उसी तरह दिसंबर में यह सूर्य  दक्षिण ध्रुव से देखा जाए तो यह वहाँ से सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है ऐसा दिसम्बर में होता है इसलिए उसे शीत अयनांत कहते हैं । जो एक ध्रुव के लिए ग्रीष्म अयनांत होता है वह दुसरे ध्रुव के लिए शीत अयनांत होता है

" मतलब यह कि अभी फरवरी का महिना है और दिन बड़े होते जा रहे हैं " मैंने निष्कर्ष दिया । इस वक़्त चाँद हमारे सामने था और हमारी यह गुस्ताख़ी थी कि हम चाँद की बात न करके सूरज की बात कर रहे थे । चाँद हमसे नाराज़ न हो जाए इसलिए मैंने अपने भीतर के वैज्ञानिक ,खगोलज्ञ और पुरातत्ववेत्ता से कहा .." तुम अभी चुप रहो " और कवि से कहा .. " कोई कविता सुनाओ " मैंने गुनगुनाना शुरू किया ..और बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद…संघर्षों का ये दिया चांद… .चंदा ने कभी रातें पी थीं… रातों ने कभी पी लिया चांद । “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल में अध्ययन के दौरान कवि रमेश यादव से यह गीत सुना था।


“ बस कर यार । ” इतनी ठण्ड में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है ? रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । मेरा रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था ..मैं भौंचक होकर उसकी ओर देखता रहा कि अचानक मुझे चुप कर वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई , पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चांदनी कैसी..चांदनी चांदनी चांदनी....। उसके बाद हम लोग बसंत और शीत ऋतु के कालखंड और अयनांत पर बहस करते हुए अपने तम्बू में वापस आ गये । 

🔲 शरद कोकास 🔲

बुधवार, 10 जून 2020

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-एक : चम्बल के पानी में चाँद


आज से पैंतीस साल पहले पांच हज़ार साल पुरानी उस ताम्राश्म युगीन सभ्यता में जाने का अवसर एक बार मुझे भी प्राप्त हुआ था । उन दिनों मैं विक्रम विश्वविद्यालय में ‘प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व’ में स्नातकोत्तर का छात्र था । इस संकाय के अंतर्गत हम लोग मुद्राशास्त्र, कला एवं स्थापत्य, प्रतिमाविज्ञान, अभिलेख शास्त्र आदि विषयों का अध्ययन कर रहे थे । इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों पर शोध, म्यूजियम्स का अध्ययन और शैक्षणिक यात्राएं भी हमारे पाठ्यक्रम के अंतर्गत थीं । अन्य सैद्धांतिक विषयों की भांति ‘पुरातत्व’ विषय केवल सैद्धांतिक नहीं था अपितु उसमें  प्रायोगिक परीक्षा भी होती थी और उसके लिए किसी उत्खनन में शामिल होना अनिवार्य था ।

उन दिनों विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में उज्जैन के निकट ‘दंगवाड़ा’ नामक स्थान पर हमारे पुरातत्व विषय के गुरु डॉ. वि. श्री. वाकणकर के मार्गदर्शन में एक उत्खनन शिविर लगा हुआ था । ‘दंगवाड़ा’  की इस साईट की खोज सन 1966 -67 में डॉ. वाकणकर ने उज्जैन के श्री विष्णु नाइक की सहायता से की थी तत्पश्चात पासलोद के श्री मांगीलाल पंड्या की सहायता से यहाँ पर्याप्त मुद्राएँ खोजी गईं । उसके पश्चात आठ दस बार यहाँ सर्वेक्षण किया गया और वर्ष 1978 में मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा ताम्राश्म युगीन अवशेषों की व्यापक खोज के उद्देश्य से यहाँ उत्खनन प्रारंभ किया गया ।  वहीं एक माह रहकर एक पुरातत्ववेत्ता की तरह हमें अपना प्रायोगिक कार्य संपन्न करना था । यह कालखंड मेरे जीवन का अविस्मरणीय कालखंड रहा और इस दौरान मैं पुरातत्व के व्यावहारिक ज्ञान से समृद्ध हुआ    उन दिनों कुछ दिनों के लिए ही सही हम लोग छात्र से पुरातत्ववेत्ता बन गए थे ।

इस डायरी में उन्हीं  दिनों की घटनाएँ दर्ज हैं, इसमें पुरातत्व की तकनीकी बातें है,इतिहास के अनछुए पन्नों का अध्ययन है, छात्र जीवन की शरारतें  हैं, यात्राओं के विवरण हैं, ज्ञान और विज्ञान की बातें हैं, साहित्य पर बहस है, मजदूरों के दुःख और शोषण की कहानियां हैं । उम्मीद है कि बतकही के अंदाज़ में लिखी यह डायरी आपको अवश्य पसंद आयेगी ।

फरवरी माह की बस शुरुआत ही हुई थी । सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं इसलिए बसंती हवाओं के लिए उन्होंने अपने दरवाज़े पर सख्त़ मुमानियत की तख्ती लगा दी थी । फिर भी सूर्य अपनी समय सारिणी के अनुसार ही चल रहा था । हमारे दंगवाड़ा पहुँचते पहुँचते दरख्तों के लम्बे सायों के पीछे से अँधेरा झांकने लगा था । दंगवाड़ा ग्राम की मुख्य सड़क पर एक चाय की टपरी वाले से पूछने पर पता चला कि वह टीला जिस पर विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में खुदाई हो रही है , गाँव से दो किलोमीटर भीतर जंगल में है । हम लोग जिस वाहन में थे, वह युनिवर्सिटी की एक पुरानी जीप थी । हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जाएगी या नहीं या फिर हमें अपना बिस्तरबन्द लादकर वहाँ तक पैदल ही जाना होगा ।

ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “ भैया, मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैंने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना ही लिया है । आपको किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है । चलो फिर ठीक है । ” रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली । उस दिन पूर्णिमा थी और फरवरी की उस धुंधलाती हुई शाम के विदा लेने की प्रतीक्षा करता हुआ बड़ा सा चांद बस निकलने ही वाला था । डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था । खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुँचा दी ।

अद्भुत द्रश्य था वहां । जाने कितने बरगद अपना आंचल फैलाये खड़े थे और उनके नीचे सफ़ेद तम्बुओं की एक कतार थी । तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी । गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मज़दूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई है और लोग उसे घेरे खड़े हैं । पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आ गए थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बातें  कर रहे थे । हम सभी छात्रों ने उन्हें प्रणाम किया । उन्होंने नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..” कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो, न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो, अणि लिए  अणे चक्कर अईया, अबार होश में अई जांगा..” “ नई बा साब ” ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “ अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे, ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..”

डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ यदि ऐसा होता तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था , मैं तो ऐसे कई टीलों की , कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ , और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा - वात्मा नहीं होती  , सब फालतू बात है ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है । उन्होंने  कहा “ देखो , यह होश में आ गई है , इसे घर ले जाओ ठीक से खाना - वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जाएगा । और आइन्दा से फालतू उपवास करने की कोई ज़रूरत नहीं । “ इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए… “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।”  मैं रवीन्द्र, अजय,अशोक और राममिलन  अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ तम्बुओं की ओर चल दिये ।


शरद कोकास 

एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी -भूमिका

एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी

शरद कोकास
भूमिका

उत्खनन स्थल का एक दृश्य
उत्खनन स्थल का एक दृश्य 
  नुष्य का यह सहज स्वभाव है कि वह वर्तमान में   जीते हुए भी कभी कभी अतीत में अथवा भविष्य में  जीने की कल्पना करता है ।  कभी न कभी यह ख़याल   हर एक के मन में आता है कि वह कुछ बरस पहले के  समय में चला जाए ताकि वह एक नए सिरे से वहाँ से  अपना जीवन प्रारम्भ कर सके , जो उस समय अप्राप्य  था उसे   प्राप्त कर सके, अपनी गलतियाँ सुधार सके ,  दुखों को दूर कर सके   और उन सुखों को भोग सके जिन्हें वह भोग नहीं पाया था । ।   ऐसा केवल कल्पना में संभव है । आज तक कोई ऐसी टाइम मशीन  नहीं बनी है कि मनुष्य उसमे बैठ जाए और सुदूर अतीत में पहुँच जाए । विज्ञान के बढ़ते चरणों के बावज़ूद यह संभव नहीं है, इसलिए कि जो बीत चुका है वह ठीक उसी तरह दोबारा कभी घटित नहीं होता । समय की अपनी एक गति होती है और बीते हुए समय में शामिल होना किसी के लिए संभव नहीं है । जब हमें अपने व्यतीत किये गए जीवन में शामिल होना संभव नहीं है तो उस समय में शामिल होना तो बिलकुल ही असम्भव है जो समय हमने नहीं देखा है । हम केवल उपलब्ध विवरणों के आधार पर उस दृश्य का पुनर्निर्माण कर सकते हैं । पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार इसमें हमारी सहायता करते हैं  । मनुष्य भौतिक रूप से भले ही उन दिनों में नहीं पहुँच सकता लेकिन उस कालखंड के ध्वस्त अवशेषों से उस सभ्यता का एक चित्र निर्माण कर सकता है  ज़मीन की परतों में दबी उस सभ्यता की साँसें  सुन सकता है ।

मनुष्य जाति के विकास की यह यात्रा उसके उद्भव से प्रारंभ हुई जो आज तक लगातार जारी है । इस बीच उसने बहुत कठिन समय देखा है । अपनी जैविक इच्छाओं को लेकर पैदा हुआ मनुष्य भूख के इशारे पर नित नई खोज करता रहा ।  आज के सुविधा संपन्न मनुष्य का जीवन देखते हुए मुझे अक्सर उस मनुष्य का ख़याल आता है जिसका जीवन प्रकृति की कृपा पर अवलंबित था जो कभी भी किसी जंगली जानवर का भोजन बन जाता था या किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाता था । लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बावज़ूद उस मनुष्य ने हार नहीं मानी और प्रकृति से द्वंद्व करते हुए, हिमयुगों में समाप्त हो जाने के खतरों से बचते हुए अपनी विकास यात्रा जारी रखी इसलिए कि उसके पेट के साथ उसके आश्रितों का पेट जुड़ा था । यह वह दौर था जब व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज नामक संस्था का निर्माण जारी था । यह पांच हज़ार साल पुरानी बात है जब मनुष्य के पास औज़ार बनाने के लिए उपयुक्त  पत्थरों का भण्डार समाप्त होने की कगार पर था उसने  ताम्बे की खोज कर ली थी और अब वह पत्थरों के युग से ताम्बे के युग में प्रवेश कर रहा था । लेकिन उसके सामने अब नई चुनौतियाँ थीं । वह यायावरी की ज़िंदगी से तंग आकर एक स्थायी जीवन बिताना चाहता था । प्रकृति ने उसे ऐसे अवसर प्रदान किये और उसकी बिखरी हुई ज़िन्दगी धीरे धीरे बसने लगी । पुरापाषाण युग से निकल कर आने वाले मनुष्य के जीवन के इस कालखंड को ताम्राश्म युगीन सभ्यता का नाम दिया गया ।


जीवन अपने संप्रत्यय में स्थायी होते हुए भी व्यक्तिगत रूप में स्थायी नहीं होता । जैसे मनुष्य की मृत्यु होती है वैसे ही सभ्यताओं का भी विनाश होता है । एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है । एक बस्ती मिट जाती है और उसके अवशेषों पर दूसरी बस्ती का निर्माण होता है । समय की चादर उन अवशेषों को मिटटी में गहरे दफ्न कर देती है । अगर हम उस सभ्यता तक जाना भी चाहें तो एकाएक उस तक नहीं पहुँच सकते । पहले हमारा सामना बाद की सभ्यताओं से होता है और उसके पश्चात हम उस प्राचीन सभ्यता तक पहुँच सकते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता कालक्रमानुसार अतीत की खोज करते हुए यही काम करता है । वह परत दर परत ज़मीन के भीतर पहुँचते हुए अंततः उस सभ्यता तक पहुँच जाता है जिसके पास इस मनुष्य जाति के प्रारंभिक स्वप्न थे ।

शरद कोकास 


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बुधवार, 7 अगस्त 2019

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - पन्द्रहवां दिन - दो


29.उजड़ी इमारत की तरह का इंसान 

लेकिन हमारे पास पलकें भी थीं और हमें आज की रात चैन से सोना भी था और इसके लिए सर्वाधिक आवश्यक था सबसे पहले एक ठिकाना ढूँढना । जैन सर ने बताया कि ठहरने के लिए  औरंगाबाद में एक धर्मशाला पहले से ही उन्होंने तय कर रखी है । धर्मशाला का नाम सुनकर महेश ने मुँह बिचकाया । मैंने उसे इशारा किया कि फ़िलहाल चुप रहे । लेकिन जैन सर ने उसकी यह हरकत देख ली थी । वे बोले “ भई, हम लोगों का डिपार्टमेंट बहुत ग़रीब  है । अब होटल - वोटल में तो ठहरने लायक पैसा तो विश्वविद्यालय से नहीं मिलता है सो इसी में गुजारा करना होगा ।“

धर्मशाला के गेट पर पहुँचते ही ऐसा लगा जैसे हम लोग किसी ढहती हुई ऐतिहासिक इमारत के अहाते में प्रवेश कर रहे हों । प्रांगण में ढेर सारी जंगली घास उगी हुई थी । दीवारों पर सफ़ेदी हुए बरसों बीत चुके थे और मॉडर्न आर्ट की तरह जगह जगह काई के धब्बे दिखाई दे रहे थे । ईट- पत्थर मुन्डेरों पर इस तरह लटके हुए थे जैसे कुछ ही देर में आत्महत्या करने वाले हों  । बिजली भी शायद कट चुकी थी और अंधेरे कमरों में लालटेनें टिमटिमा रही थीं । प्रांगण में कुछ मुसाफ़िर ईट के चूल्हों पर शाम का भोजन पकाने में व्यस्त थे । धुएं की गंध के साथ रोटी की गंध मिलकर एक अजीब सी बू पैदा कर रही थी । हमारे जिस्मों का पसीना हमें बार बार चेतावनी दे रहा था कि उसे पानी से धो दिया जाए वर्ना वह हमारी रात बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा ।

हमारे पहुँचने की खबर मिलते ही धर्मशाला का मैनेजर जिसका नाम शायद देवड़ा था, दौड़ा चला आया । वह जैन सर को जानता था । हम समझ गए.. हम से पहले की बैचेस को इस धर्मशाला में रहने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है । देवड़ा नामक वह व्यक्ति मैले कुचैले से कपड़े पहने हुए था और पाँवों में स्पंज की टूटी हुई स्लीपर थी। वह आदमी कहीं से भी उस धर्मशाला का मैनेजर नहीं दिखाई दे रहा था । सर ने बताया कि उजड़ी इमारत की तरह दिखाई देने वाला यह इन्सान इस धर्मशाला का मालिक भी है जो पहले कभी बहुत संपन्न  हुआ करता था । “तो अब क्या हो गया है जो यह इस इमारत का मेन्टेनेन्स भी नहीं कर सकता ?“ मेरे मन में विचार आया लेकिन देवड़ा की लाल लाल आँखों, बहकती आवाज़ और लड़खड़ाते कदमों ने उसकी और इमारत की बदहाली का राज़ खोल दिया । अपने ज़माने का सम्पन्न देवड़ा अब पूरी तरह ‘बेवड़ा‘ हो चुका था ।

फिर भी वह होशियार था और कुछ व्यावसायिक बुद्धि तो उसमें थी ही । उसने हमारी आँखों में कौन्धता हुआ रोशनी का सवाल देखा और आवाज़ लगाई “इब्राहिम भाई, जल्दी से एक पेट्रोमैक्स का इन्तज़ाम करो ।“ फिर वह खिसियानी सी हँसी के साथ हमारी ओर मुख़ातिब हुआ “ क्या करें साब, वो बिल ज़्यादा आता था ना, दो तीन बार नहीं भर पाया इसलिए …हेहेहे…। फिर उसने काम करने वाली लड़की को आवाज़ लगाई …”कान्ता इन लोगों के लिए कुएँ से पानी निकाल दो …।”

फिर वह मैनेजरों सी विशिष्ट स्टाइल में बोला ...“ चलिए साहब, आप लोगों के लिए एक बड़े हाल का इन्तज़ाम कर दिया है, सामान वगैरह रखकर हाथ मुँह धो लीजिए मैं आप लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करता हूँ । फ़िर उसने इब्रहिम भाई के ज़रिये एक ढाबे वाले को बुलाया । जैन सर ने पूछा “ एक थाली का कितना लोगे ? “ उसने तपाक से उत्तर दिया “ आप लोगों के लिए मात्र पंद्रह रुपए सर । “ जैन सर कुछ देर सोचते रहे फिर उन्हें  लगा ज़रूर कहीं कुछ गड़बड़ है । उन्होंने देवड़ा से कहा “ रहने दीजिये भोजन की व्यवस्था हम खुद कर लेंगे ।“

“बस कर यार .. आज बहुत थक गए हैं अब नींद आ रही है ..आगे की डायरी कल सुनेंगे । " अशोक ने अपनी रजाई सर तक ओढ़ते हुए कहा । " यार कुछ भी कहो जैन साब खयाल तो बहुत रखते हैं हम लोगों का ।“ अजय भी सोने के लिए अपनी पोजीशन संभाल चुका था । रवीन्द्र ने उसकी रज़ाई खींची और उसे छेड़ते हुए चुटकी ली …” फिर भी बेटा, तुम मैडम के अंडर में डिज़र्टेशन लिख रहे हो ।“ “तो उससे क्या होता है  । “ अजय ने वापस अपनी रज़ाई गले तक ओढ़ते हुए कहा “ मैं तो जैन साहब की अनुशासन प्रियता और गुणों की बात कर रहा था । “ मैं समझ गया अब सब लोग सोने के मूड में आ गए हैं सो मैंने डायरी बंद की और उसे बैग में रखकर मैं भी बिस्तर में घुस गया ।


शरद कोकास 

शनिवार, 8 सितंबर 2018

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - पन्द्रहवाँ दिन - एक -पनचक्की


पानी से चलने वाली चक्की    

बीबी का मकबरा औरंगाबाद 
उत्खनन शिविर में आये आज हमें पंद्रह दिन हो गए हैं । इन पंद्रह दिनों में मेहनतकशों के जीवन को बहुत क़रीब से जानने का अवसर हमें मिला है । मजदूरों से बातें करते हुए हमने उनके सुख-दुःख भी बांटे और जाना कि उनका जीवन बाहर से जैसा दिखाई देता है वास्तव में ऐसा नहीं है ।और लोगों की तरह हम भी यही समझते थे कि यह लोग खाते पीते मस्त रहते हैं और इन्हें कोई चिंता नहीं है । लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है । आम शहरी लोगों की तरह उन्हें सुविधाएँ हासिल नहीं हैं और वे बहुत कठिनाई से बहुत सीमित संसाधनों के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं ।


  हम मध्यवर्गीय स्वयं को बहुत मेहनती और कार्यकुशल समझने के भ्रम में जीते हैं और सोचते हैं कि हम उतना ही श्रम कर लेंगे जितना कि श्रमिक करते हैं । लेकिन यदि एक दिन श्रमिक न आयें तो हमारा यह भ्रम टूट जाता है । साईट पर भी आज ऐसा ही कुछ हुआ । किसी कारणवश गाँव से आज अधिकांश श्रमिक नहीं आ पाये और उनकी अनुपस्थिति में मिटटी फेंकने और साफ़ सफ़ाई के कार्य भी हमें ही करने पड़े । शाम को ज्ञात हुआ कि हालत प्रतिदिन की अपेक्षा आज कुछ अधिक ही ख़राब है । शाम को चम्बल पर पहुँचकर हाथ-मुँह धोने तक अँधेरा होने लगा था सो हमने आज सिटी भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और सन्ध्याकालीन भोजन भी शीघ्र ही ग्रहण कर लिया । आज शिवमंदिर की ओर टहलने जाने की भी मनस्थिति नहीं थी ।
एक पुरानी पनचक्की 

भोजनशाला में कुछ देर आर्य सर से गपियाने के उपरांत हम लोग अपने तम्बू में आ गए । थकावट कितनी भी हो बिना बतियाये हम लोगों को नींद नहीं आने वाली थी । नींद के महल में प्रवेश करने हेतु यह प्रवेश पत्र आवश्यक था । बिना किसीके कुछ कहे मैंने अपनी डायरी निकाली और कथावाचक की मुद्रा में बैठ गया । राममिलन भैया खाना पचाने के लिए अभी बाहर ही टहल रहे थे । किशोर ने तम्बू से बाहर सिर निकाला और ज़ोर से आवाज़ लगाई “ अरे ओ राममिलनवा, जल्दी आओ कथा शुरू हो रही है ।“ जैसे ही राममिलन भैया भीतर आकर बैठे मैंने
औरंगाबाद की पनचक्की 
डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया …

”बीबी का मकबरा देखने के बाद हमने वहीं परिसर में स्थित अन्य इमारतों का अवलोकन प्रारंभ किया । आगे उसी दौर की एक पनचक्की थी जो बरसों से बंद पड़ी थी । कहते हैं इसे सम्राट ने फ़कीरों के लिए  आटे का इन्तज़ाम करने के उद्देश्य से बनाया था । यह कभी पानी की ताकत से चलती थी , इसमें पानी के प्रवाह से एक चक्र को घुमाया जाता था उससे यह चक्की जुड़ी होती थी .पानी की ताकत को उस युग  में ही पहचान लिया गया था और इसी पहचान की वज़ह से आधुनिक युग में बिजली का जन्म हुआ । आज हम बगैर बिजली के इस दुनिया के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकते । “

“ अच्छा इसीलिए हमारे गाँव में हमारी दादी अभी भी बिजली से चलने वाली चक्की को पनचक्की ही कहती हैं ।" राममिलन भैया ने चक्की के इतिहास को लोकपरम्परा से जोड़ते हुए कहा । “ बिलकुल सही ।" रवींद्र ने कहा । "यही कारण है कि हम अपने जीवन में इतिहास को इस तरह शामिल पाते हैं । हमारे जीवन में हमारे इर्दगिर्द आज जो भी वस्तुएँ है उनकी पूर्वज वस्तुएँ उसी तरह की हुआ करती थीं जैसे बिजली का पंखा, मेज़,चाकू, सीढ़ियाँ और भी बहुत कुछ । हर वस्तु में उसका इतिहास छुपा हुआ है । भले ही उनके नाम पूर्व में कुछ और रहे हों । इसीलिए ना हम उत्खनन कर आज की वस्तुओं की पूर्वज वस्तुओं को ढूँढ निकाल रहे है ताकि इन वस्तुओं के माध्यम से उस परम्परा की खोज कर सकें ।“

“ लेकिन इससे हो क्या जाएगा । परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है ।“ अजय विमर्श के मूड में था  “आज जो वस्तुएँ हम देख रहे हैं यह पुरातन वस्तुओं का परिवर्तित रूप ही तो है । कल इनका भी रूप परिवर्तन हो जाएगा और यह पहले से ज़्यादा सुविधाजनक हो जाएंगी । जैसे हाथ के पंखे के बाद, रस्सी से खेंचे जाने वाले पंखे का अविष्कार हुआ, फिर बिजली के पंखे का, फिर कूलर और फिर ए सी का । हमें जो भी परिवर्तन करना है वह वर्तमान में उपलब्ध वस्तुओं में करना है पुरातन वस्तुओं से इस परिवर्तन में क्या सहायता मिलने वाली है ? और इससे मानवजाति के विकास की प्रक्रिया में क्या अन्तर होने वाला है ?

“ वाह !“ रवीन्द्र ने कहा “अंतर कैसे नहीं होगा ? जब तक आप पिछली वस्तु पर अनुसंधान नहीं करेंगे, उसकी कमियों, अच्छाइयों या सीमा के बारे में नहीं जानेंगे  तब तक उसका रूप परिवर्तन  कैसे कर सकेंगे ?” “नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूँ । " अजय ने अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयास किया । "जिस वस्तु पर अनुसंधान हो चुका है और जो ज़मीन के भीतर दब चुकी है वह भविष्य की वस्तुओं के लिए किस तरह उपयोगी है ?" मैंने कहा “मैं तुम्हारा आशय समझ गया हूँ । तुम यही कहना चाहते हो कि अब कूलर और ए सी के ज़माने में हाथ के पंखे का क्या काम ? वह तो पुराने ज़माने की बात हो चुका है । “ रवीन्द्र ने ठहाका लगाया …”जब बिजली गुल हो जाती है ना बेटा ..तब यही हाथ का पंखा याद आता है ।“

मैंने कहा “नहीं इसका उत्तर इतना सरल भी नहीं है । दर असल वस्तुओं के साथ साथ उनसे जुड़ी तकनीक का भी विकास होता है और इस विकास के लिए  पिछले अनुभव और विकास की प्रक्रिया को जानना बहुत ज़रूरी होता है । यदि ऐसा नहीं करेंगे तो क्रमवार विकास दर्ज नहीं हो पायेगा और वही गलतियाँ दोहराई जायेंगी जो पहले की पीढ़ियों में हो चुकी हैं । जैसे अभी हम्फ़ी के उत्खनन में राजा कृष्णदेव राय द्वारा बनवाया गया एक रानी का महल मिला है जिसमें दीवारों के भीतर नालियाँ बनाई गईं थीं जिनमें पानी प्रवाहित कर वातानुकूलन की व्यवस्था  की गई थी । अर्थात वातानुकूलन में पानी की उपयोगिता को रेखांकित किया गया । उसके बाद ही कूलर बना और अब गैस की खोज हो जाने के बाद उससे चलने वाला ए सी ।"

"तात्पर्य यह कि मनुष्य हर दौर में अपने आसपास उपलब्ध वस्तुओं की सहायता से अपने पूर्वजों द्वारा संचित ज्ञान के आधार पर ही विकास करता है ।" रवींद्र ने कहा । "हाँ ।" मैंने उसकी बात का समर्थन किया।  "अगर हम वस्तुओं के इतिहास को देखकर आगे विकास नही करेंगे तो  हम अपने अतीत को लेकर इतरा तो सकेंगे कि हमारे पूर्वजों ने यह किया, वह किया, लेकिन यह नहीं जान सकेंगे कि यह कैसे किया तथा उससे सबक लेकर उनके द्वारा अर्जित ज्ञान का उपयोग नहीं कर सकेंगे । इस तरह यह एक ऐसा खोखला पुरातन प्रेम बन कर रह जाएगा जिसकी कोई सार्थकता नहीं होगी । “

“ठीक है ठीक है “ किशोर भैया जो अब तक चुपचाप बैठे थे बोल पड़े …” भाई पनचक्की के आगे भी तो बढ़ो ।“ मैं उनका आशय समझ गया था । मैंने फ़िर डायरी पढ़ना प्रारंभ कर दिया …“ पनचक्की के पास ही जल से भरा एक विशाल कुण्ड था जिसमें कई छोटी - बड़ी अनेक मछलियाँ तैर रही थीं । पास ही खड़े थे कुछ बच्चे जो उन मछलियों को राजगीरे के लड्डू खिला रहे थे और खुशी से उन मछलियों की तरह ही उछल रहे थे । “चलो बच्चों..“ बच्चों के अभिभावक ने आवाज़ लगाई । “मछलियों के सोने का टाइम हो गया है ।“ मुझे मुस्कुराता देख एक बच्चे ने सवाल किया “ मछली सोती कैसे होगी अंकल उसकी तो पलकें ही नहीं होतीं ?“ मैंने उस बच्चे की पीठ थपथपाई । मुझे सवाल करने वाले बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं ।

शरद कोकास 



शनिवार, 23 जून 2018

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -चौदहवां दिन -तीन

औरंगज़ेबवा की लुगाई की फरमाईस 

तो किस्सा कोताह यह कि आज भी  सूरज उसी तरह उगा जैसे कि रोज़ उगता है भाटी जी ने वैसे ही प्रेम से दोनों वक़्त का भोजन करवाया, शाम को सिटी का दौरा भी हुआ और फिर रात आई और हम लोग अपने तम्बू में रजाई ओढ़कर बैठ गए ।  “हाँ तो भाईजान आज क्या इरादा है, औरंगजेब की सल्तनत में चलें ? ” रजाई में पदस्थ हो जाने के बाद  रवीन्द्र ने मुझसे सवाल किया । “बिलकुल ।“ मैंने कहा “आज सुनाते हैं आगे की यात्रा की डायरी ।“  मैंने डायरी निकाली और पाठ शुरू कर दिया…

“अजंता से हम लोगों ने शाम लगभग चार बजे प्रस्थान किया । लेकिन अब वापसी  जलगाँव की ओर नहीं थी बल्कि हमारा गन्तव्य औरंगाबाद था । वह दुनिया हम पीछे छोड़ आये थे जहाँ बुद्धम शरणम गच्छामि के स्वर गूंजा करते थे । शाम ढलने से पूर्व ही हमारी बस औरंगाबाद पहुँच गई । बस की खिड़की से मार्च की धूप भीतर आ रही थी, मैं बाहर देखते हुए औरंगाबाद शहर का अक्स अपनी आँखों में बसाने की कोशिश कर रहा था । वातावरण में मग़रिब की अज़ान गूँज रही थी ..अल्ला हो अकबर ..। मैं कुछ सोचकर मुस्कुराया...अच्छा हुआ कि उस दौर में अलग अलग धर्म अलग अलग समय में साँस लेते रहे वर्ना एक धर्म वालों द्वारा दूसरे धर्म वालों की सांसें रोक दी जाती । हालाँकि मेरा सोचना पूरी तरह सही भी नहीं था । बौद्ध धर्म के बाद यद्यपि इस्लाम सैकड़ों साल बाद आया लेकिन उस समय ब्राह्मण धर्म ने यह काम किया । मेरी आँखों के सामने अचानक पुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य सम्राट ब्रह्द्रथ की हत्या का दृश्य कौंध गया ।

मैं बस की खिड़की से निरंतर बाहर की ओर देख रहा था । यह दो ऋतुओं के बीच का संक्रमण काल था और मौसम में बोरियत भरी उदासी छाई हुई थी । दिन अब लम्बी उबासी की तरह कुछ लम्बे होने लगे थे । पंछी अभी आसमान में ही थे और पेड़ों के पास सन्नाटा छाया हुआ था । यह अजीब बात थी कि पंछियों के पास घर होने के बावजूद उन्हें भी घरौंदों में वापस लौटने की चिंता नहीं थी । फिर सूरज तो ठहरा बेघर ..वह लौटता भी तो कहाँ लौटता सो लाल पीले नीले कपड़े पहने हुए मज़े में पश्चिम के फुटपाथ पर टहल रहा था । जल्दी तो खैर हमें भी नहीं थी । हम सभी छात्र वैसे भी बेघर थे । अपना अपना घर छोड़कर कुछ बनने की इच्छा लेकर निकले थे, क्या बनेंगे, कहाँ रहेंगे किसी को नहीं पता था सो घर क्या और बाहर क्या, इस भाव के साथ इस यायावरी का आनंद ले रहे थे ।

दिन ढलने में अभी काफी समय था इसलिए तय किया गया कि धर्मशाला पहुँचने और अँधेरा होने से पहले बीबी का मक़बरा तो देख ही लिया जाए । हमारे बस ड्राइवर जमनालाल जी ने रास्ता पूछ पूछ कर आखिर बीबी का मक़बरा ढूँढ ही लिया । प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सामने थी मुगल काल की एक बेहतरीन इमारत  जिसे देखते ही बरबस मुँह से निकल गया …”अरे ! ताजमहल !“ ठीक ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में उपस्थित थी वहाँ मुगल शासक औरंगज़ेब की बेग़म राबिया दौरानी की समाधि । लेकिन कहाँ ताजमहल और कहाँ बीबी का मक़बरा ! ताजमहल बेहतरीन सफेद संगमरमर का बना है और बीबी के मक़बरे  में यह संगमरमर सिर्फ़ सामने वाले भाग में है और वह भी लगभग पाँच साढ़े पाँच फ़ीट बस । शेष इमारत बलुआ पत्थर की है और मीनारें ईटों की बनी हुई हैं । इन पर चूने का मसाला लगा है जिसमें सीपियों की भस्म मिली हुई है ।
 
ताजमहल से इस इमारत की तुलना करते हुए एक प्रश्न मन में आया, दोनों ही इमारतें सम्पन्न मुगल शासकों द्वारा बनाई गई हैं फिर इनमें इतना अंतर क्यों है ? जैन साहब ने हमारी शंका का समाधान किया …” प्रारंभिक मुग़ल शासकों के समय राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी, राजस्व की प्राप्ति भी अधिक होती थी और उनके खर्च भी अधिक नहीं थे इसलिए  इमारतें उच्च कोटि की सामग्री से बनाई जाती थीं, लेकिन बाद में साधनों के अभाव और धन की कमी के कारण उन्हें  सादा इमारतें बनानी पड़ीं, हालाँकि औरंगज़ेब ने भी सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने शासनकाल के प्रारंभ में दिल्ली की मोती मस्जिद जैसी इमारत बनाई और लाहौर में बादशाही मस्जिद भी बनवाई परन्तु बाद में आर्थिक अभाव के कारण उसे बीबी के मक़बरे जैसी साधारण इमारत बनाने के लिए विवश होना पड़ा ।"

" सर ,लेकिन यह औरंगज़ेब शुरू से औरंगाबाद में ही था क्या ? मुगलों का शासन तो उस समय आगरा में था ? " अजय ने सवाल किया । सर ने बताना शुरू किया " औरंगज़ेब को उसके पिता शाहजहाँ ने सन सोलह सौ चौंतीस में दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया । उस वक्त उसकी उम्र सोलह वर्ष थी । उसने महाराष्ट्र  के गाँव किरकी को अपनी राजधानी बनाई और उसका नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया । उसके बाद सोलह सौ सैंतीस में राबिया दुर्रानी से उसकी शादी हुई जिसका यह मकबरा उसने सोलह सौ अठहत्तर में बनवाया  । हालाँकि शादी के बाद सिर्फ सात साल वह यहाँ रहा और उसके बाद उसके पिता शाहजहाँ ने उसे गुजरात और फिर बदक्षां का सूबेदार बनाकर अफगानिस्तान भेज दिया । सोलह सौ अठ्ठावन में उसने अपने पिता को ताजमहल पर राजकीय खजाना खर्च करने का जुर्म लगाकर आगरे के किले में कैद कर दिया और खुद को बादशाह घोषित कर दिया । इसके बाद उसने सत्रह सौ सात तक यानि लगभग पचास वर्ष तक शासन किया ।"

" सर, लेकिन इसका औरंगाबाद के बीबी के मकबरे की सादगी से क्या सम्बन्ध है ? मैंने पूछा ।" वही तो बता रहा हूँ ।" जैन सर ने कहा " चूँकि वह राजकीय कोश का व्यर्थ के कामों में खर्च करने के विरुद्ध था और खुद के लिए भी बहुत कम खर्च  करता था इसलिए उसने इस इमारत पर भी अधिक नहीं खर्च किया । हालाँकि उसने पैसा काफी कमाया जैसे उसने जजिया कर लगाया लेकिन वह सब राज्य के लिए खर्च किया ।" बहरहाल, इस इमारत के ताजमहल के मुकाबले कम सुन्दर होने का कारण  हम लोगों की समझ में आ गया था ..बोले तो  जितना पैसा उतना काम । औरंगज़ेब के बारे में वास्तविक और गढ़े गए दोनों तरह के इतिहास को ताक पर रखकर हम लोगों ने उसके बसाये औरंगाबाद में जी भरकर ईरान, मध्य एशिया, दिल्ली और आगरा से आई वास्तुकला की मुगल शैली के इस स्थापत्य का आनंद लिया और आगे बढ़ गए ।“

राम मिलन भैया जो हम लोगों से रूठकर पिछले दिनों अलग तम्बू में चले गए थे, उनका गुस्सा हमारे माफ़ीनामे के बाद शांत हो चुका है और एक सज्जन व्यक्ति की तरह वे हम दुर्जनों के बीच आकर बैठने लगे हैं । वे भी सब लोगों के साथ मेरा डायरी पाठ सुन रहे थे  । सुनते हुए  हुए अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सबके सामने प्रस्तुत की... “ का हो, ई शाहजहाँ ने तो अपन लुगाई की फ़रमाइस पर ताजमहल बनवा दिया, औरंगज़ेबवा की लुगाई की भी कौनो फ़रमाइस रही थी क्या ? “ राममिलन भैया की बात सुनकर पहले तो हम लोग बहुत हँसे  फिर अजय ने जवाब दिया “ अब क्या पता पंडित, हो सकता है कि बहू ने सोचा हो जब हमारी सास के लिए  इतना बड़ा मक़बरा  बना है तो छोटा-मोटा हमारे लिए  भी बन जाए । आखिर बड़े घर की सास है तो बहू भी कम बड़े घर की नहीं है । अब उसका आदमी कंजूस है तो क्या हुआ ।“ मुगलकालीन इतिहास के इस विखंडन पर मैं क्या कहता, मैंने अपना सिर पीट लिया और कहा “ बस भैया , आज के लिए बहुत हो गया,  बाकी का यात्रा विवरण कल ।"


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - चौदहवां दिन - दो


दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो 


प्रतिदिन की भांति तैयार होकर हम लोग ट्रेंच पर पहुँच गए । आज हमारा उत्खनन शिविर में चौदहवां दिवस था । ट्रेंच पर पहुँचकर हम लोगों ने अपनी कापियों पर नज़र डाली और कल छोड़े हुए काम की तस्दीक की । अब हमें कल से आगे के उत्खनन कार्य में व्यस्त हो जाना था । फिर आज का दिन भी उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले तेरह दिन बीते थे । कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो श्येड्युल के अनुसार हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन हमें पहले ही आने में देर हो गई इसलिए एक माह से पहले ही प्रशिक्षण कार्य पूर्ण करना होगा । फिर हमें थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए बहुत कम समय बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है । हमें पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे ऐसा विचार कर हम लोग यहाँ से जाने का मन बना रहे हैं । फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा ।

शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी एक सी हो जाती है । कभी कभी भविष्य की चिंताओं के कारण भी मन उदास हो जाता है  । शाम को कहीं जाने का मन नहीं था लेकिन समय तो बिताना ही था और फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का भी लग चुका है सो यह भ्रमण कार्य भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं की तरह हो जाते थे । हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे हालाँकि पर्यावरण ,अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन और स्वास्थ्य जागरूकता सम्बन्धी बातें तो हम उन्हें बताते ही हैं । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमायें पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनकी बेहतरी के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं । मुक्तिबोध ने कहा भी है .."इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए ।"

फिर भी कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थिति देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “

दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।