मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : आठवाँ दिन : पाँच

                 जिन दिनो मैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था , वहीं पास ही चम्बल नदी के किनारे एक उत्खनन कैम्प में जाना हुआ , डॉ. वाकणकर के निर्देशन मे हम लोग पन्द्रह दिन वहाँ रहे । उस दौरान काम के साथ साथ बहुत सारी बातों पर चर्चा होती रही ,हम मित्रों के बीच । यही सब प्रस्तुत कर रहा हूँ इन दिनों इस " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी में "। इसे आप कहीं से भी पढ़ सकते हैं इसलिये की डायरी के लिये कविता या कहानी जैसी कोई शर्त नहीं होती कि इसे प्रारम्भ से ही पढ़ा जाये ।इस तरह इस चर्चा में भी आप भाग ले सकते हैं । इसे भविष्य में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने की योजना है । तय है कि उसमें ब्लॉग के पाठक भी शामिल रहेंगे ।
               फिलहाल चर्चा चल रही है ओलम्पिक पर और उसमें होने वाले खेलों और भाग लेने वाले खिलाड़ियों पर । मुद्दा यह है कि उस समय स्त्रियों को खेल में भाग लेने की इज़ाज़त क्यों नहीं थी । चलिये आगे पढ़ते हैं...  
         एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : आठवाँ दिन : पाँच 
ओलम्पिक में स्त्रियों को भाग लेने की इज़ाज़त नहीं थी ।
             “ सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप “ अजय ने सर को मूल विषय पर वापसी के लिये संकेत दिया । “ हाँ “ सर बोले “ मैं कह रहा था कि ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिये इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।

              “ यह तो बड़ा अन्याय है सर “ रवीन्द्र ने कहा । “ हाँ “ सर बोले “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो , यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया ।शुरू शुरू में जियस के मन्दिर में होने वाले खेलों में ही उन्हे इज़ाज़त दी गई । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिये बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।
                “ अपने देश में कहाँ जीतती हैं सर ? अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है । लड़कों को सारे खेल खेलने की अनुमति है लेकिन लड़की ने जहाँ लड़कों के साथ खेलना चाहा कि बस ..। लड़के खेलते हैं क्या गुड्डे -गुड़ियों से ?  “ अशोक बोला ।
                 " इसीलिये तो लड़कियाँ पीछे रह जाती हैं । भले ही देश मे लड़कियों की हॉकी , फुटबाल ,क्रिकेट टीम हो लेकिन विश्व स्तर पर कहीं कोई नाम है क्या उनका ? और इन खेलों की छोड़ो अन्य खेलों में भी कहीं नाम है क्या ? अथेलेटिक्स में अन्य देशों की लड़कियाँ कितने करतब दिखलाती हैं हमारे देश की कोई खिलाड़ी नज़र आती है क्या ? इसका मतलब साफ है, हमारे देश में लड़के -लड़कियों  में भेदभाव किया जाता है ।  अजय ने गुस्से से कहा ।
                  बातचीत यूनान के ओलम्पिक से शुरू होकर भारत के खेल तक पहुंच चुकी थी और मैं इस प्रयास में था कि उसे फिर इतिहास की ओर ले जाऊँ लेकिन ,वर्तमान को इतिहास से फिर जोड़ना  इतना आसान नहीं था ।मैने कहा " इस पर विवाद मत करो भाई , कुछ इतिहास कारों का तो यह भी कहना है कि शुरू में स्त्रियाँ ही इस खेल में भाग लेती थीं , पुरुषों को बाद में अवसर दिया गया ।
                  " यह तो तुम नई बात बता रहे हो " रवीन्द्र ने कहा । मैने कहा " हाँ ओलम्पिक का इतिहास  तो यही कहता है ।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –चार




ओलम्पिक ,कालभैरव और बजरंगबली
                आज ठंड कुछ बढ़ गई थी इसलिये भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय हम लोग तम्बू के सामने आग जलाकर बैठ गये । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आये कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । आर्य साहब ने कहा “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जायेगा । 
“ क्यों यहाँ ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “
डॉ.वाकणकर ने अलाव के पास आते हुए आर्य साहब की घोषणा सुन ली थी । सर के लिये हमने बैठने की व्यवस्था की और इस बात के लिये उत्सुक हो गये कि आज कोई ज्ञानवर्धक बात सुनने को मिलेगी । अजय ने तुरंत उनकी बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत तो ग्रीस से हुई है ना ? “ हाँ “ सर ने कहा । “ प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगितायें होती थीं । और सबसे मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । यहाँ ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं ,वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं ।
                “ सर जी , उनका देवता तो जीयस था फिर ये ओलिम्पी जियस कोई अलग देवता था क्या ? “ अजय ने सवाल किया । “अरे नहीं रे बावड़े “ सर ने कहा । “ अपने यहाँ कैसे एक देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे ..” वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राम मिलन ने तपाक से कहा “ जैसे बजरंग बली के नाम दक्षिणमुखी हनुमान , उत्तरमुखी हनुमान , मनोकामना हनुमान । “ 
                 “देखो ये बजरंगबली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में कैसे कालभैरव के नाम से  भेरू बाबा के कितने मन्दिर बन गये हैं । “आर्य साहब ने कहा ।
                 “ हाँ सर “ मैने कहा ।“ मैने भी देवास गेट पर एक उखाड़-पछाड़ भेरू बाबा का मन्दिर देखा है । कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते है तो तबाही मचा देते हैं ।.“ 
                  अशोक ने  कहा "सही है एक भगवान से किसीका मन नहीं भरता इसलिये सभीने अपने अपने भगवान बना लिये हैं , और उनके नाम पर अपने अपने धर्म बना लिये हैं ,और लड़ रहे हैं आपस में , मेरा भगवान बड़ा है , मेरा धर्म बड़ा है । और तो और एक धर्म के भीतर भी लड़ाईयाँ हो रही  हैं क्योंकि एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म है उनके अपने भगवान हैं , जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों में लड़ाइयाँ हो रही हैं .कि हम बड़े भक्त है । सबके अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से दूसरों को भी संचालित करना चाहते हैं ।  
             " यहाँ तक तो ठीक है " किशोर ने कहा " लेकिन अपने धर्म को बड़ा और सही धर्म बताकर और अपने देवता को दूसरे के देवता से बड़ा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है वह तो बिलकुल गलत है । "
             " इसका सिर्फ एक कारण है " मैने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया " कि लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है ,केवल सतही ज्ञान और अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । " 
             "बिलकुल सही , ग्रंथ भी तो इसी उद्देश्य से लिखे गये , अशोक ने कहा , जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिये मनुस्मृति रची गई । ग्रंथ लिखे जाने के बाद उनकी अपने अपने ढंग से व्याख्याएँ की गईं ।फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे ।  वैसे कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की जड़ ।" 
            आर्य सर समझ गये कि बातचीत गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होने इंटरप्ट किया , " भाई ये भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुंच गये ।फिर वे  ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे ,बोले “ भेरू से याद आया तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टुडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और रुआँसा होकर बोला “ सर मेरा नाम बहुत खराब है मुझे शर्म आती है , मै इसे बदलना चाहता हूँ ।“ तो मैने कहा “ अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू याने भैरव ,कालभैरव ,शिव का नाम है यह । तुम्हारा नाम है भैरव मालवी देखो कितना सुन्दर लगता है । “ 
             हम समझ गये कि अब इस विषय पर गम्भीर  चर्चा नहीं हो सकती ।( चित्र गूगल से साभार )  
  

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –तीन


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –तीन
मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता ।

फिर भी इतनी शर्म तो थी हम मे कि उस दिन हमने दंगवाड़ा जाना स्थगित कर दिया और समय बिताने के लिये भाटीजी की भोजनशाला के इर्द-गिर्द मँडराते रहे । हम लोगों ने प्लानिंग की कि राम मिलन भैया को मस्का लगाया जाये और उनकी नाराज़गी दूर की जाये । राम मिलन उसी दिन से हम लोगों से बेहद नाराज़ थे और हमारा तम्बू छोड़कर ,उस तम्बू में उन्होने अपनी स्थापना कर ली थी जहाँ उत्खनन के औज़ार फावड़ा गैंती घमेले इत्यादि रखे थे । वहीं उन्होने प्लास्टिक की निवाड़ वाले एक पलंग का जुगाड़ भी कर लिया था ।                                                                   
भैया के तम्बू में जब हम लोग पहुँचे तब वे मंकी कैप लगाये हनुमान चालीसा का पाठ करने में व्यस्त थे । हाँलाकि ठंड की वज़ह से पाठ में उनका मन नहीं लग रहा था । हम लोगों के तम्बू में प्रवेश करते ही उन्होने अपना पाठ बन्द कर दिया  और खीझते हुए कहा “ पता नहीं पिछले जनम में कउन से पाप किये थे जौने के लाने प्राचीन भारतीय इतिहास मे इम्मे करना पड़ा और यहाँ जंगल में मरने के लिये आना पड़ा । “                
हम लोग सोचकर गये थे कि उस दिन की घटना के लिये राममिलन भैया से माफी माँगेंगे और ऐसी कोई बात नहीं करेंगे जिस से उन्हे बुरा लगे । लेकिन इस से पहले कि हम कुछ कहते उनके ज़िगरी दुश्मन किशोरवा ने उन्हे छेड़ दिया “ तुम पिछ्ले जनम में क्या थे पंडत ? “ राम मिलन ने कोई जवाब नहीं दिया तो किशोर का हौसला बढ़ गया । “ज़रूर बन्दर रहे होगे । “ हमने तुरंत किशोर को आँख से इशारा किया लेकिन उस पर क्या असर होना था । राम मिलन जो पहली बात पर धैर्य धारण किये हुए थे इस बात पर उखड़ गये ..” और तुम किशोरवा ज़रूर गधे रहे होगे या उल्लू या सुअर । “ अरे रे राममिलन भैया काहे नाराज़ हो रहे हो “ किशोर ने तुरंत बात सम्भाली “ हम तो इसलिये कह रहे थे कि तुम इतनी हनुमान चालीसा पढ़ते हो ,बन्दर माने आखिर हनुमान जी के वंशज ही हुए ना ? “ हनुमान जी का नाम सुनकर राम मिलन थोड़े नर्म हुए और हँसने लगे । हम समझ गये कि वे खुश हो गये है । मैने सोचा अब बात कुछ सम्भाली जाये और एक फार्मूला छोड़ ही दिया जाये सो कहा “ भाई सही तो यह है कि मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता । कोशिकाओं से यह शरीर बनता है और कोशिकाओं के मरने के साथ ही मर जाता है । न उसमे कोई जीव होता है न कोई आत्मा ,न कोई दबी छुपी इच्छा शेष रहती है न कोई पाप पुण्य बचा रहता है । यह जो जीवन है बस एक बार का है ।                                                 
“ सही कह रहे हो “ रवीन्द्र ने कहा “ भूत प्रेत होते तो वे लोग हमारी मदद को नहीं आते ? आखिर हम उन्ही का अतीत तो खोज रहे हैं । रात भर में ट्रेंच खोद देते ,सुबह हम अवशेष बटोर लेते । हमे इतनी मेहनत तो ना करनी पड़ती ।“ बस उसके बाद फिर भोजन के समय तक भूतों के किस्से ही चलते रहे (चित्र गूगल से साभार )                

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –दो

 नहीं भाई राव साहब ,डायरी बिला नहीं गई ,मै नवरात्र की कविताओं मे इतना व्यस्त हो गया था कि बिलकुल फुरसत नही मिली यह समझो कि खुदाई का काम बन्द हो गया था । चलो आज से फिर शुरू कर देते हैं । दर असल पुरातत्ववेत्ता के साथ ऐसा ही होता है ,वह करता कुछ है और लोग समझते कुछ हैं । चम्बल के किनारे उज्जैन के पास दंगवाड़ा के इस टीले पर भी हमारे साथ ऐसा ही हुआ । चलिये चलते हैं,रवीन्द्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी.किशोर त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा के साथ और पूछते है डॉ.वाकणकर से कुछ नये सवाल । हाँ पहले उस दिन का किस्सा ज़रा याद कर लिया जाये । दृश्य यह है कि  ट्रेंच मे कहीं से एक साँप घूमता घामता आ गया है और काम वहीं रुक गया है सारे मज़दूर डरे हुए हैं और सच पूछो तो हम भी और डॉ. साहब हम लोगों का उत्साहवर्धन करने का प्रयत्न कर रहे हैं .. 

हम ज़मीन में गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं
                     ट्रेंच से साँप की विदाई के पश्चात काम फिर आगे बढ़ा । आज हमें रेत की लेयर के नीचे फ्लोर तक पहुँचना ही था । लेकिन मज़दूरों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा था । शायद वे साँप देखकर डर गये थे । “ कईं व्ही गयो ? “ डॉ. वाकणकर ने उनकी असमंजसता देख कर उनसे पूछा । एक मज़दूर ने धीरे से कहा “ बासाब यहाँ गड़ा हुआ खजाना तो नहीं है ? “ सर ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहा ..” अरे तुम लोग कहीं यह तो नहीं समझ रहे हो कि यह खजाने वाला साँप था और अपने खजाने की रक्षा के लिये यहाँ बैठा था ? “ मज़दूर बेचारे क्या कहते वे तो सदियों से चली आ रही इस मान्यता के निरक्षर संवाहक थे । “ भई न तो ज़मीन में गड़ा कोई खजाना होता है न ही उसकी रक्षा करने वाला साँप होता है ,सब मनगढ़ंत बातें हैं ।
फिर सर हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ देखो अपने देश में कैसी कैसी मान्यतायें व्याप्त हैं । हम लोग एक साइट पर उत्खनन कर रहे थे वहाँ गाँव वाले रोज़ आते थे और पूछते थे “ कईं बा साब सोणा खोदण वास्ते आया हो कईं ? “ एक गड़रिया बालक तो रोज़ आता था और घंटों खड़ा रहता था । रोज़ सुबह आते ही सबसे पहले वह पूछता “ कईं सोणा मिल्यों कईं ? “ मैं ना में सर हिला देता तो वो फिर पूछता “फेर कईं मिल्यो ? “ तो मैं ये टूटी –फूटी पॉटरीज़ की ओर इशारा कर देता और कहता “ई मिल्यो है”। तो वह बड़े लोगों की तरह सिर हिलाता और कहता .”.हूँ ठीकरो मिल्यो है । “ और फिर वह हँसता हुआ चला जाता ।
सही है रवीन्द्र ने कहा “ आम लोग अभी भी यही समझते हैं कि हम लोग गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं । हम लोग जब शाम को दंगवाड़ा जाते हैं तो गाँव के लोग यही सवाल करते हैं । “ अरे बाप रे.. दंगवाड़ा का नाम रवीन्द्र ने क्या लिया सर का ध्यान हम लोगों की शरारत की ओर चला गया । उन्हे आर्य साहब ने बता दिया था कि हम लोगों ने राम मिलन के साथ शरारत की है और उसे अगिया बेताल के नाम पर डराने की कोशिश की है । उन्होने तुरंत कहा “ अच्छा तो तुम लोग दंगवाड़ा इसीलिये जाते हो कि बापड़े को परेशान करो । वो तो अच्छा हुआ मैने तुम लोगों की तरफ से समझा दिया नहीं तो वो कैम्प छोड़कर जा रहा था । “हम लोग क्या कहते कहाँ हमे डाँट खाने की उम्मीद थी लेकिन सर ने तो खुद ही हमे उबार लिया था