रविवार, 25 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :आठवाँ दिन : छह


कैम्प में ओलम्पिक की चर्चा जारी है । मनुष्यों से बात घोड़ों पर आ गई है । और यहाँ एक रहस्य खुलता है । जैसे हम मनुष्यों के पूर्वज हुआ करते थे वैसे घोड़ों के भी तो रहे होंगे ? और उसके हाथ पाँव भी होंगे हमारे जैसे ?
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :आठवाँ दिन : छह                                                                                           
घोड़े की भी मनुष्यों जैसी पाँच उंगलियाँ होती थीं
           “ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिये इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था “ सर ने कहा “ इन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती,चक्रफेंक,भालाफेंक,घुड़दौड़ रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं । जैसे आजकल कार रेस में होती हैं ।"                                                                                   “ सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है । मैने कहा । हाँ “ सर बोले सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे क्योंकि विजेता रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक कहलाता था जिसके पास ज़्यादा घोड़े वो विजेता और दुर्घटना में भी सारथी ही मरता था मालिक को इनाम मिलता था । “                                                                                                                                                                                    
“और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं “ मैने कहा “ जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया । ““ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हे नहीं पता “ मैने कहा । “ लाखों साल पहले घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं और वह जंगलों में रहता था जहाँ सूखे पत्तो पर दौड़ने के लिये उंगलियाँ काम आती थीं । फिर जंगल कम हुए , और मैदान में दौड़ने के लिये उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: एक खुर रह गया । इन प्रजातियों के क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस नाम हैं । “ अच्छा इसलिये ओलम्पिक में घुड़्दौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“ रवीन्द्र ने कहा । “ लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “  ठीक है ठीक है चलो अब सो जाकर सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । “ सर ने आखरी फरमान जारी किया ।   अच्छा हुआ ना हमारे हाथ पैरों की  उंगलियाँ नहीं घिसीं वरना हम भी खुर वाले मनुष्य कहलाते और फिर क्या होता आप कल्पना कर सकते हैं ---शरद कोकास (चित्र गूगल से साभार )

12 टिप्‍पणियां:

  1. घोडों के बारे में यह जानकारी रोचक और ज्ञानवर्धक लगी.

    [..खुर वाले इंसान!कल्पना भयावह है!]

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  2. भले चलताऊ टिप्पणी सी लगे लेकिन यह कहने से रोक नहीं सकता - रोचक। सहज संवाद शैली और कहीं संस्कृत या अंग्रेजी शब्द प्रयोग का दुराग्रह नहीं। घोड़ों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी कितनी सहजता से बता गए !
    _______________
    @ अल्पना जी
    भयावह क्या है? हम तो प्रसन्न हुए जा रहे हैं कि जूतों का खर्च बच जाता।

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  3. जब आदमियों के खुर निकल आते तो फ़िर घोड़े की आवश्यक्ता समाप्त हो जाती, आज आदमी,आदमी के सर पर सवार होता,तब पीठ पर होता,पीठ पर चाबुक तो अभी भी पड़ते है और तब भी पड़ते, बढिया जानकारी के लिए बधाई,

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  4. एकलव्य पढ़े यह पोस्ट और अंगूठा देने के मलाल से बचे!

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  5. @ Girijesh ji...baat to sahi kahi lekin phir...NAAL lagwani padti khuron mein ..uska kaya???
    ab baat nikelee hai to duur tak jayegi...Imagine..Naal lage khuron se TYPE kar rahe hote...yah comment![ha ha ha]...

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  6. अगर मनुष्यों के खुर होते ! शायद इस पर लिखा जा चुका होगा। शरद जी आप की जानकारी में है क्या?
    अल्पना जी ने अनंत सम्भावनाओं की ओर इशारा किया है। शरद सरीखा कोई इस पर व्यंग्य लिख सकता है। जोशी न सही कोकास ही . .

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  7. " rochak jankari "

    ----- eksacchai { aawaz }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  8. कुछ भी हो शरद जी आप लोगों की बहस और चर्चा बड़ी सार्थक ही होती है कुछ ना कुछ बढ़िया बात निकल ही जाती है बहस में...

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