मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –तीन


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –तीन
मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता ।

फिर भी इतनी शर्म तो थी हम मे कि उस दिन हमने दंगवाड़ा जाना स्थगित कर दिया और समय बिताने के लिये भाटीजी की भोजनशाला के इर्द-गिर्द मँडराते रहे । हम लोगों ने प्लानिंग की कि राम मिलन भैया को मस्का लगाया जाये और उनकी नाराज़गी दूर की जाये । राम मिलन उसी दिन से हम लोगों से बेहद नाराज़ थे और हमारा तम्बू छोड़कर ,उस तम्बू में उन्होने अपनी स्थापना कर ली थी जहाँ उत्खनन के औज़ार फावड़ा गैंती घमेले इत्यादि रखे थे । वहीं उन्होने प्लास्टिक की निवाड़ वाले एक पलंग का जुगाड़ भी कर लिया था ।                                                                   
भैया के तम्बू में जब हम लोग पहुँचे तब वे मंकी कैप लगाये हनुमान चालीसा का पाठ करने में व्यस्त थे । हाँलाकि ठंड की वज़ह से पाठ में उनका मन नहीं लग रहा था । हम लोगों के तम्बू में प्रवेश करते ही उन्होने अपना पाठ बन्द कर दिया  और खीझते हुए कहा “ पता नहीं पिछले जनम में कउन से पाप किये थे जौने के लाने प्राचीन भारतीय इतिहास मे इम्मे करना पड़ा और यहाँ जंगल में मरने के लिये आना पड़ा । “                
हम लोग सोचकर गये थे कि उस दिन की घटना के लिये राममिलन भैया से माफी माँगेंगे और ऐसी कोई बात नहीं करेंगे जिस से उन्हे बुरा लगे । लेकिन इस से पहले कि हम कुछ कहते उनके ज़िगरी दुश्मन किशोरवा ने उन्हे छेड़ दिया “ तुम पिछ्ले जनम में क्या थे पंडत ? “ राम मिलन ने कोई जवाब नहीं दिया तो किशोर का हौसला बढ़ गया । “ज़रूर बन्दर रहे होगे । “ हमने तुरंत किशोर को आँख से इशारा किया लेकिन उस पर क्या असर होना था । राम मिलन जो पहली बात पर धैर्य धारण किये हुए थे इस बात पर उखड़ गये ..” और तुम किशोरवा ज़रूर गधे रहे होगे या उल्लू या सुअर । “ अरे रे राममिलन भैया काहे नाराज़ हो रहे हो “ किशोर ने तुरंत बात सम्भाली “ हम तो इसलिये कह रहे थे कि तुम इतनी हनुमान चालीसा पढ़ते हो ,बन्दर माने आखिर हनुमान जी के वंशज ही हुए ना ? “ हनुमान जी का नाम सुनकर राम मिलन थोड़े नर्म हुए और हँसने लगे । हम समझ गये कि वे खुश हो गये है । मैने सोचा अब बात कुछ सम्भाली जाये और एक फार्मूला छोड़ ही दिया जाये सो कहा “ भाई सही तो यह है कि मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता । कोशिकाओं से यह शरीर बनता है और कोशिकाओं के मरने के साथ ही मर जाता है । न उसमे कोई जीव होता है न कोई आत्मा ,न कोई दबी छुपी इच्छा शेष रहती है न कोई पाप पुण्य बचा रहता है । यह जो जीवन है बस एक बार का है ।                                                 
“ सही कह रहे हो “ रवीन्द्र ने कहा “ भूत प्रेत होते तो वे लोग हमारी मदद को नहीं आते ? आखिर हम उन्ही का अतीत तो खोज रहे हैं । रात भर में ट्रेंच खोद देते ,सुबह हम अवशेष बटोर लेते । हमे इतनी मेहनत तो ना करनी पड़ती ।“ बस उसके बाद फिर भोजन के समय तक भूतों के किस्से ही चलते रहे (चित्र गूगल से साभार )                

6 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी दोस्ती तो राममिलन जी से आपके ब्लॉग के बदौलत हुई है पर पिछले जन्म में हम भी बन्दर थे और राममिलन जी के जिगरी दोस्त थे। आखिर हम भी हनुमान जी के भक्त हैं भई! :-)

    बैकग्राउंड कलर बदलने और फोंट साइज बढ़ाने के लिए धन्यवाद!

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  2. बढ़िया संस्मरण . भूत प्रेत मात्र कल्पना कपोल ही है ....

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  3. बिल्कुल सही कहा आपने...जीवन एक बार मिलता है....ये दूसरा जन्म का चक्कर बड़ा कनफ्यूज़िंग लगता है..

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  4. @ कोशिकाओं से यह शरीर बनता है और कोशिकाओं के मरने के साथ ही मर जाता है । न उसमे कोई जीव होता है न कोई आत्मा ,न कोई दबी छुपी इच्छा शेष रहती है न कोई पाप पुण्य बचा रहता है । यह जो जीवन है बस एक बार का है ।

    “ सही कह रहे हो “ रवीन्द्र ने कहा “ भूत प्रेत होते तो वे लोग हमारी मदद को नहीं आते ? आखिर हम उन्ही का अतीत तो खोज रहे हैं । रात भर में ट्रेंच खोद देते ,सुबह हम अवशेष बटोर लेते । हमे इतनी मेहनत तो ना करनी पड़ती ।“


    शिछ्छा-दीछा भी साथ साथ चल रही है। ठीक है लेकिन भूत प्रेत पिशाच होते हैं, इसलिए कि हम कह रहे हैं। ;)
    भूत पिशाच निकट नहीं आवैं ...
    'मानस का हंस' में किशोर तुलसी द्वारा महाश्मशान में अर्द्ध रात्रि को शंख वादन प्रकरण पढ़े कि नहीं? न पढ़े हों तो पढ़ डालिए।

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  5. रावसाहब उस शंखवादन की पोल जानने के लिये तो नागर जी के भूत से सम्पर्क करना होगा ..और ये तो बड़ा ही मुस्किल काम हैगा .क्योंकि मेरी मदद को आने से तो वो रहे। होते तभी ना आते । . बोला ..रामबोला । यह अच्छी याद दिलाई इस किताब के कुछ प्रसंगों पर मैने कुछ छोटी छोटी कविताये लिखी थी . कभी पढ़वाउंगा - और कैसे है ? -शरद

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