शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –दो

 नहीं भाई राव साहब ,डायरी बिला नहीं गई ,मै नवरात्र की कविताओं मे इतना व्यस्त हो गया था कि बिलकुल फुरसत नही मिली यह समझो कि खुदाई का काम बन्द हो गया था । चलो आज से फिर शुरू कर देते हैं । दर असल पुरातत्ववेत्ता के साथ ऐसा ही होता है ,वह करता कुछ है और लोग समझते कुछ हैं । चम्बल के किनारे उज्जैन के पास दंगवाड़ा के इस टीले पर भी हमारे साथ ऐसा ही हुआ । चलिये चलते हैं,रवीन्द्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी.किशोर त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा के साथ और पूछते है डॉ.वाकणकर से कुछ नये सवाल । हाँ पहले उस दिन का किस्सा ज़रा याद कर लिया जाये । दृश्य यह है कि  ट्रेंच मे कहीं से एक साँप घूमता घामता आ गया है और काम वहीं रुक गया है सारे मज़दूर डरे हुए हैं और सच पूछो तो हम भी और डॉ. साहब हम लोगों का उत्साहवर्धन करने का प्रयत्न कर रहे हैं .. 

हम ज़मीन में गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं
                     ट्रेंच से साँप की विदाई के पश्चात काम फिर आगे बढ़ा । आज हमें रेत की लेयर के नीचे फ्लोर तक पहुँचना ही था । लेकिन मज़दूरों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा था । शायद वे साँप देखकर डर गये थे । “ कईं व्ही गयो ? “ डॉ. वाकणकर ने उनकी असमंजसता देख कर उनसे पूछा । एक मज़दूर ने धीरे से कहा “ बासाब यहाँ गड़ा हुआ खजाना तो नहीं है ? “ सर ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहा ..” अरे तुम लोग कहीं यह तो नहीं समझ रहे हो कि यह खजाने वाला साँप था और अपने खजाने की रक्षा के लिये यहाँ बैठा था ? “ मज़दूर बेचारे क्या कहते वे तो सदियों से चली आ रही इस मान्यता के निरक्षर संवाहक थे । “ भई न तो ज़मीन में गड़ा कोई खजाना होता है न ही उसकी रक्षा करने वाला साँप होता है ,सब मनगढ़ंत बातें हैं ।
फिर सर हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ देखो अपने देश में कैसी कैसी मान्यतायें व्याप्त हैं । हम लोग एक साइट पर उत्खनन कर रहे थे वहाँ गाँव वाले रोज़ आते थे और पूछते थे “ कईं बा साब सोणा खोदण वास्ते आया हो कईं ? “ एक गड़रिया बालक तो रोज़ आता था और घंटों खड़ा रहता था । रोज़ सुबह आते ही सबसे पहले वह पूछता “ कईं सोणा मिल्यों कईं ? “ मैं ना में सर हिला देता तो वो फिर पूछता “फेर कईं मिल्यो ? “ तो मैं ये टूटी –फूटी पॉटरीज़ की ओर इशारा कर देता और कहता “ई मिल्यो है”। तो वह बड़े लोगों की तरह सिर हिलाता और कहता .”.हूँ ठीकरो मिल्यो है । “ और फिर वह हँसता हुआ चला जाता ।
सही है रवीन्द्र ने कहा “ आम लोग अभी भी यही समझते हैं कि हम लोग गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं । हम लोग जब शाम को दंगवाड़ा जाते हैं तो गाँव के लोग यही सवाल करते हैं । “ अरे बाप रे.. दंगवाड़ा का नाम रवीन्द्र ने क्या लिया सर का ध्यान हम लोगों की शरारत की ओर चला गया । उन्हे आर्य साहब ने बता दिया था कि हम लोगों ने राम मिलन के साथ शरारत की है और उसे अगिया बेताल के नाम पर डराने की कोशिश की है । उन्होने तुरंत कहा “ अच्छा तो तुम लोग दंगवाड़ा इसीलिये जाते हो कि बापड़े को परेशान करो । वो तो अच्छा हुआ मैने तुम लोगों की तरफ से समझा दिया नहीं तो वो कैम्प छोड़कर जा रहा था । “हम लोग क्या कहते कहाँ हमे डाँट खाने की उम्मीद थी लेकिन सर ने तो खुद ही हमे उबार लिया था

6 टिप्‍पणियां:

  1. सब छोड़ कर पहले ये बताइए कि ये ताजे ताजे 1000 के नोट कहाँ की खुदाई में मिल रहे हैं। मैं अभी ट्रेन पकड़ने के मूड में हूँ। दो दिन छुट्टी है। कुछ हासिल हो जाएगा।

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  2. मैं अपने लॉकर का नंबर और उसकी चाबी भेजूं
    गर मिल जाए तो ...

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  3. ठीकरे को परखने के लिये आंखें चाहियें न। हीरे को कंकर समझने वाली तो पूरी दुनियां है!

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  4. शरद भाई, आपकी शैली बहुत रोचक है और बांध लेता है। पर, बुरा मत मानना, आपका ये ब्लॉग टेम्प्लेट ऐसा है कि पढ़ा नहीं जाता। एक तो हरे रंग के बैकग्राउंड में काले अक्षर वैसे ही समझ में नहीं आते और फिर आपका फोंट साइज भी 11 है, फोंट साइज को 14 कर दो तो ज्यादा अच्छा हो। मैं तो पोस्ट को कॉपी करके तख्ती में पेस्ट करता हूँ और फिर पढ़ता हूँ।

    अधिक अच्छा हो यदि टेम्प्लेट ही बदल दो।

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  5. शरद भाई,कभी इधर पंजाब की तरफ चक्कर लगाईये...हमारेँ यहां भी बहुत से खजाने गढे हैं:)

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  6. अविनाश जी चाबी मेरे पास भेज देना . I कुछ रखना है या निकालना यह फैसला चाबी मिलने पार किया जायेगा ,चाबी वापिस तो नहीं भेजनी पड़ेगी

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