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रविवार, 27 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – पाँच



जनता के साथ अजंता की सैर    

            भोजन के पश्चात पेट ही नहीं मन भी भरा भरा सा लगता है । भोजन शरीर में पहुँचकर उर्जा उत्पन्न करता है वह उर्जा कोशिकाओं में पहुँचकर रक्त प्रवाह को गति देती है और वह रक्त मस्तिष्क तक पहुँचकर समस्त क्रियाकलापों को गति देता है आखिर मन मस्तिष्क के इन्ही सब क्रियाकलापों का योग ही तो है । भाटी जी ने आज हरे मटर की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी जो उन्हें गाँव के मज़दूर दे गए थे ,साथ में टमाटर की चटनी भी । होटल के बेस्वाद भोजन से अलग इस भोजन के स्वाद की बात ही कुछ और थी सो हमारा मन प्रफुल्लित था इसलिए आज खाने के बाद टहलने का मन भी नहीं हुआ ।

            भोजनशाला से निकलकर हम लोग सीधे तम्बू में पहुँचे । जिस तरह घूमने जाने की इच्छा रखने वाला नन्हा शिशु अपने पिता का ध्यान आकर्षित कराने के लिए साइकल की ओर ऊँगली  से संकेत करता है उसी तरह अजय ने  मेरे बैग से मेरी डायरी निकाली और  मुझे थमा दी । मैं समझ गया सबकी इच्छा  आगे का यात्रा वृतांत सुनने की है । मैंने डायरी खोली और सवाल किया " तो हम कहाँ थे ? " अजय ने तपाक से कहा " सुलभ शौचालय में .. मेरा मतलब शौच आदि से निवृत होकर आप लोग जलगाँव के बस अड्डे पर गर्मागर्म चने की की मिसल वाला आलू पोहा खा रहे थे । " " ओके ओके ।" मैंने कहा और फिर जनता के बीच अजंता यात्रा का वाचन प्रारम्भ कर दिया ।

            "तो इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । हमारी डॉज के ड्राईवर जमनालाल जी ने बताया कि जलगाँव से अजंता की दूरी इकसठ किलोमीटर है और इस यात्रा में लगभग एक घन्टा लगता है । आज किसी सीट पर किसी का रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए मैंने खिड़की के पास की एक सीट चुनी और उस पर बैठ गया । बचपन से ही यात्रा में खिड़की से बाहर के दृश्यों को देखना मुझे अच्छा लगता है । जिस ज़िंदगी को हम जी नहीं सकते उसकी एक झलक ही मिल जाए तो क्या कम है । हिंदी साहित्य में आलोचना के अंतर्गत जब किसी के द्वारा ग्रामीण जीवन पर कुछ लिखा जाता है और उसमे गाँव के सुख दुःख शामिल नहीं होते अथवा गाँव का बहुत रूमानी वर्णन होता है तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी कविता में गाँव बस या रेल की खिड़की से देखे हुए गाँव जैसा है ।"

            "इसीलिए तो भैया हम तेरे को दंगवाड़ा गाँव घुमाने ले जाते हैं ताकि तू आगे चलकर जब बड़ा कवि बने तो गाँव के जीवन का यथार्थ वर्णन कर सके ।" अजय ने तपाक से मेरी इस बात पर कमेन्ट किया ।" ठीक है ठीक है, आगे जब बड़े होंगे तब देखेंगे ..क्या पता इस पुरातत्व विभाग में ऐसी जगह नौकरी मिले जहाँ गाँव में ही रहना अनिवार्य हो .. तब भी यह इच्छा पूरी हो जाएगी और बड़े कवि की छोड़ कवि ही बन जाएँ इतना काफी है ।"  "ओके भाई .." रवीन्द्र ने कहा " तब की तब देखी जाएगी, चल आगे की डायरी सुना ।"

            " लो सुनो । " मैंने कहा । खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्यों को देखते हुए कब अजंता आ गया पता ही नहीं चला । अजंता की दूरी दर्शाने वाले मील के पत्थर दिखाई देने लगे थे और मैं उन्हें पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी, अजंता केव्ज़  3 कि मी, अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । बौद्धकालीन अजंता की गुफाओं के विषय में कोर्स में मैंने काफी कुछ पढ़ रखा था । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए दूर दिखाई देने वाले छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे, जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।

             मैं सोचने लगा उस कालखंड विशेष के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा, यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे,  न वाहनों की कर्कश आवाज़ होगी न धूल न धुआं । बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी, नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार, आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी और वातावरण  में गूंजते  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर । अचानक बस ने आख़िरी  मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में विचरण करता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों, टूरिस्ट बसों, छोटी छोटी दुकानों और होटलों की दमघोटू भीड़ के बीच गिरकर चकनाचूर हो गया । वहाँ का शोर सुनकर मुझे लगा जैसे मैं किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।

             मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकी जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं की श्रंखला के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया । मैं अपनी मूर्खता पर मन ही मन हँस रहा था । जाने क्यों मुझे इस बात का गुमान था कि गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमें उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।

            सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें जो सबसे पहली गुफा मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो, तीन,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जिस गुफा में चित्र उकेरे गए वह गुफा क्रमांक दस है । इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं । अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हें  देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था, लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हें अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।

मेरे डायरी वाचन के बीच अचानक अजय का एक सवाल कूद पड़ा “ लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “आगे यही लिखा है मैंने । बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस , अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया । उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।"

इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय, रवीन्द्र, अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हें  पहली बार बता रहा हूँ । “फिर क्या हुआ ?“ अशोक ने सवाल किया । “बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं, बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ, मुद्राओं में दुख की परिभाषा, चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …गृहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा, भिक्षुओं के भिक्षाटन ,उपदेश श्रवण,संगीति जैसे विभिन्न क्रियाकलाप, दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या, इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम जिस कला व संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।

"लेकिन अँधेरी गुफाओं के भीतर कलाकारों ने यह चित्र बनाये कैसे होंगे ?" अजय ने मुझसे सवाल किया । "आसान था ।" मैंने कहा । फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरामैन जिस तरह रिफ्लेक्टर का उपयोग करते हैं उसी तरह इन कलाकारों ने भी सूर्य की रौशनी को भीतर तक लाने के लिए चमकीली सतह वाले रिफ्लेक्टर्स का उपयोग किया होगा और रंग भी फूल, पत्तों, रंगीन पत्थर  और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चर्बी , पौधों का अर्क आदि की सहायता से बनाये होंगे इसीलिए अब तक यह चित्र जस के तस हैं ।"

"लेकिन मैंने देखा है बहुत सारे चित्रों में अब रंगों का क्षरण हो रहा है ।" अशोक ने कहा । " हाँ यह तो है," मैंने कहा  "इतने सारे लोगों का आना, कृत्रिम रौशनी और प्रदूषण कुछ न कुछ असर तो होगा ही, इसीलिए अब कुछ चित्रों को संरक्षित करने के लिए उन पर टचिंग की जा रही है ।" "लेकिन इससे तो मूल पेंटिंग्स ख़राब हो जाएँगी " अशोक ने कहा । "हाँ हो सकता है लेकिन किया भी क्या जा सकता है, अजंता अब एक बहुत बड़ा पर्यटन उद्योग है । खैर आगे सुनो " इतना कहकर मैंने फिर डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया । 

"गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज चुके थे लेकिन हमें वापस भी लौटना भी था । हम जैसे अध्ययनकर्ताओं के लिए चार -पांच घंटों का यह समय बहुत कम था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिए  यहाँ आएँगे हम लोगों ने संतोष कर लिया । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे, यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “अरे भाई , भूख- वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को ?” भूख एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था चाहे वह कितना भी रंगीन और आकर्षक हो । “चलो महेश ।“ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।"

" हा आ आ आ " बड़ा सा मुँह फाड़ते हुए अजय ने कहा " बस कर यार इसके आगे की डायरी अब कल सुनेंगे, अभी तो बहुत ज़ोरों की नींद आ रही है ।" " ठीक है ।" मैंने कहा । "बाक़ी कल ।" वैसे भी हम लोगों का यह सामूहिक अनुशासन है कि यदि एक व्यक्ति सोने की इच्छा प्रकट करता है तो सभी के लिए वार्तालाप स्थगित करना अनिवार्य होता है । मैंने रज़ाई सर तक ओढ़ ली और अपनी आँखें बंद कर लीं । मेरा मन बुद्धकाल में पहुँच गया था । देह को यात्रा के लिए साधनों की आवश्यकता होती है लेकिन मन तो जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है मन की यह यात्रा जारी थी ..बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर ..। फिर जैसे तन की यात्रा में नींद आती है मन की यात्रा में भी आना 

सोमवार, 8 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -दूसरा दिन-छः


प्र
मैंने बात आगे बढ़ाई “ लेकिन तीसरी सहस्त्राब्दि  ईसा पूर्व तक मेसोपोटेमिया के  इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली थी । दलदल सुखाने और सिंचाई के लिए  यहाँ नहरें खोदी गईं, खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था । खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैयार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें नर्म नर्म घास चरती थीं । नगरों में शिल्पी, बढ़ई आदि कारीगर रहा करते थे और ऊन, खजूर, अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “

            "यार अब समझ में आया कि अरब देशों के लोग खजूर को इतना पसंद क्यों करते हैं ।" अजय ने कहा "और यह भी समझ में आ गया कि मुसलमान लोग रमज़ान के महीने में रोजा खोलने के लिए खजूर का इस्तेमाल क्यों करते हैं । "हाँ यह सही है ।" मैंने कहा "जिस क्षेत्र में किसी धर्म का उदय होता है उस क्षेत्र का खान-पान, रीति रिवाज़, रहन - सहन सब कुछ उस धर्म में शामिल हो जाता है ,फिर उस धर्म के लोग दुनिया के किसी भी क्षेत्र में रहें वे उन्ही रीति -रिवाजों का पालन करते हैं । लेकिन यह बात जो मैं बता रहा हूँ यह इस्लाम के अविर्भाव से हजारों साल पहले की है ।"

            “मतलब यह कि मेसोपोटेमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गए  ? ” रवीन्द्र ने मेरी बात को फ़िर से पटरी पर लाते हुए कहा । “हाँ” मैंने बताया, "लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गए और शेष वैसे ही विपन्न रहे । दरअसल अधिकता ही इस भेद को जन्म देती है । उस समय दक्षिण मेसोपोटामिया की उर्वर ज़मीन में एक दाने से सौ दाने पैदा होते थे और खजूर का एक पेड़ वर्ष में पचास  किलो से भी अधिक खजूर देता था । इसका अर्थ यह हुआ कि उन लोगों के पास आवश्यकता से अधिक अन्न हो गया लेकिन इसके मालिक सब नहीं हुए ।"

            "हमारे यहाँ भी तो यही हाल है भाई " अशोक ने कहा । "हमारे यहाँ भी किसान इतना अनाज पैदा करता है लेकिन सब बड़े बड़े लोगों के गोदामों में जमा हो जाता है किसान के पास तो बमुश्किल अपने खाने लायक अनाज बचा रहता है ।" " तुम ठीक कह रहे हो " मैंने कहा " लेकिन इसकी वज़ह से यह हुआ कि कुछ संभ्रांत और पुरोहित किस्म के लोगों ने ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और शेष लोग जिनमें  युद्धबंदी भी थे उनके दास हो गए । गरीबों के पास अपनी भूमि नहीं थी वे ज़मींदारों के यहाँ काम करने लगे  । इस तरह दक्षिण मेसोपोटामिया में कृषि, पशुपालन और शिल्प का विकास तो हुआ ही साथ साथ  दासों , सामुदायिक किसानों और संपन्न दास स्वामियों के वर्ग भी बन गए । बहुत से शिल्पी और किसान धनी लोगों के कर्जदार बनते गए ।"

            "मतलब यह सिर्फ हमारे देश में ही नहीं हो रहा बल्कि पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है ।" अशोक ने कहा और रज़ाई के भीतर मुँह घुसा लिया । मैंने देखा कि सबको नींद सी आ रही है । अशोक की बात ख़त्म होते ही रवींद्र ने आज की रात्रिकालीन सभा की समाप्ति की घोषणा करते हुए पहला फरमान जारी किया .."अभी भी कहाँ कुछ बदला है न बदलने वाला है चलो अब सब लोग सो जाओ ।"

1900-------------------------------


7  -  जल से ढँकी हुई थी पृथ्वी

            रवींद्र के फ़रमान के बावज़ूद किसीको नींद नहीं आ रही थी । दरअसल ठण्ड कुछ बढ़ गई थी और हम लोग हल्की हल्की कंपकंपाहट महसूस कर रहे थे । हर कोई थोड़ी थोड़ी देर में रजाई से मुँह बाहर निकालता था और देखता था कि कौन कौन हिल-डुल रहा है ।"कितना अच्छा हो खजूर के गुड़ और अदरक वाली एक कप गरमागरम चाय मिल जाए ।" अजय ने एक असंभव सी इच्छा प्रकट की । "चुप रह ।" रवीन्द्र ने उसे डाँटते हुए कहा "चाय की कल्पना भी नहीं करना, भाटी जी चूल्हा बुझाकर कबके सो चुके होंगे और अब भगवान भी आ जाएँ तो वे नहीं जागने वाले ।" "ठीक है यार, हम भी ठण्ड भगाने के लिए अशोक की चुंगी से एक सुट्टा मार लेंगे ।" अजय ने कहा ।

            अचानक अशोक को ख़याल आया कि उसने बहुत देर से सिगरेट नहीं पी है ।"सुलगाऊं क्या ?" उसने अजय से पूछा  और बिना उसके जवाब की राह देखे अपने बिस्तर के नीचे छुपाकर रखे पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर जला ली । सिगरेट जलाकर उसने ढेर सारा धुआं तम्बू की छत की ओर फेंका और दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर डमरू की तरह एक विशिष्ट स्टाइल में मटकाते हुए  कहा " जोसी .. ठण्ड वंड कुछ पास न आवै जब हम अपनी सिगरेट सुलगावें।"  “ अजय ने अपनी नाक के सामने आया धुआँ हटाने का अभिनय करते हुए कहा "ठीक है भैया, तुम्हारे द्वारा फैलाये हुए प्रदूषण से ही ठण्ड भाग जाए और नींद आ जाये तो कितना अच्छा हो ।"

            नींद न आने तक बातचीत करना हमारी विवशता ही नहीं ज़रूरत भी थी इसलिए कि ठण्ड की दुश्मनी नींद से थी और वह इस कदर हावी थी कि अपने अलावा कुछ सोचने ही नहीं दे रही थी । अजय ने मेरी ओर मुखातिब होकर कहा  “ कामरेड, तुम यह जो वर्ग - संघर्ष की कथा सुना रहे थे इसे बाद में सुनाना पहले यह बताओ कि क्या प्रलय की मूल कथा भी यहीं की है ? ऐसा मैंने सुना है ।" “हाँ ।” मैंने कहा “ यह बात सही है । उस समय मेसोपोटामिया के इस क्षेत्र में बार बार बाढ़ आया करती थी, कभी कभी तो बाढ़ की वज़ह से यहाँ की दोनों नदियाँ दज़ला और फ़रात आपस में मिल जाती थीं और प्रलय जैसी स्थिति हो जाती थी, शायद उसी के चलते यहाँ इस कथा ने जन्म लिया हो । कथा कुछ ऐसी है कि..." मैंने देखा अचानक अजय की रज़ाई में एक जलजला सा आ रहा है l

            "अरे सुनो, सुनो " अजय ने रजाई फेंकी और सीधा होकर बैठ गया .. "भाई कहानी सुना रहा है ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा .." सुनाता हूँ, लेकिन वादा करो कि बीच में टोकोगे नहीं । और ढंग से रज़ाई ओढ़कर बैठो नहीं तो वाकणकर सर को बता दूँगा कि यह जानबूझकर आत्महत्या का प्रयास कर रहा था ।" अजय ने अपने चारों और ठीक से रज़ाई लपेट ली और मुँह पर उंगली रख कर अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठ गया 

            मैंने प्रलय की कथा शुरू की .."माइथोलॉजी में ऐसी मान्यता है कि शुरुआत में यह समूची पृथ्वी जल से ढँकी हुई थी और सब ओर सिर्फ जल ही जल था । आसमान से भी ऊपर एक देवलोक था जहाँ देवता रहते थे और पृथ्वी को जल में डूबा हुआ देखकर बहुत अफ़सोस किया करते थे । देवताओं का प्रयास था कि पृथ्वी को किसी तरह जल से अलग किया जाए ताकि इस पर मनुष्यों को बसाया जा सके, लेकिन एक दैत्य उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था । उसे समाप्त किये बगैर कोई चारा नहीं था । सो देवताओं ने उससे युद्ध किया जिसमें देवाधिपति द्वारा वह दैत्य  मार दिया गया l फिर देवताओं ने उस दैत्य के मृत शरीर के दो टुकड़े कर दिए,  फिर देह के ऊपरी  भाग से आकाश व तारों का निर्माण किया और निचले भाग से ज़मीन का । फिर उन्होंने ज़मीन पर पेड़ पौधे उगाए , मिटटी से इंसान और जानवर बनाये और उन्हें इस धरती पर बसाया  । “

            “लेकिन यह तो कोरी कल्पना है भाई, बृह्मांड,तारे, पृथ्वी और मनुष्य इस तरह तो नहीं बने थे ।“ अजय ने कहा । “ लो तुमने टोक दिया न, अरे भाई मैंने कब कहा कि ऐसा सचमुच में घटित हुआ था । मैंने पहले ही कहा था कि यह कहानी है, पृथ्वी और मनुष्य के जन्म को लेकर हमारे यहाँ भी इस तरह की कितनी ही कहानियाँ हैं । उस समय मनुष्य के पास जितना ज्ञान था उस आधार पर उसने यह कथायें रचीं । कुछ कल्पनायें आगे जाकर सत्य साबित हो गईं और कुछ कल्पनाएँ ही रह गईं । जैसे कि आज से चार सौ साल पहले तक यही सत्य था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है । अगर गेलेलियो और ब्रूनो जैसे वैज्ञानिक नहीं होते तो आज भी यही सत्य माना जाता । “ रवीन्द्र ने कहा “ नहीं, ये लोग नहीं होते तो कोई और होता लेकिन सच तो एक न एक दिन सामने आता ही है । खैर, तुम आगे की कहानी सुनाओ ।"

            “ज़रूर..” मैंने कहा ।“ अब देवताओं की बसाई पृथ्वी पर सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, मनुष्य झोपड़ियाँ बनाकर रह रहे थे और अपना भरण-पोषण कर रहे थे कि अचानक किसी बात पर देवता मनुष्य से नाराज़ हो गए, उन्होंने तय किया कि मनुष्यों की इस पृथ्वी को फिर से पानी में डुबो दिया जाए ।" "भैया हमें पता है, देवता किस बात से नाराज़ हुए होंगे ।" राममिलन भैया ने तुरंत हमारी कहानी में ब्रेक लगाते हुए कहा " ई इंसान तो सुरु से ही पापी रहा है, जैसे तुम लोग देवी-देवताओं को नहीं पूजते वैसे ही उसने भी देवी देवताओं को पूजना बंद कर दिया होगा, अब नाराज़ नहीं होंगे तो क्या ।"

            " ठीक कह रहे हो भैया" मैंने कहा " सारी ग़लती तो मनुष्यों से ही होती है देवता भी कभी कोई ग़लती करते हैं मेसोपोटामिया में भी ऐसा ही हुआ ।  असीरियों के देवता एंलिल ने मनुष्यों के पाप की वज़ह से ही ऐसा किया था, खैर, देवताओं की नाराज़गी के कारणों पर हम बाद में शोध करेंगे, आगे सुनो कि क्या हुआ ।" मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा " हुआ यह कि अन्य देवताओं की नाराज़गी के बावजूद  जल देवता इया मनुष्यों पर प्रसन्न थे सो उन्होंने यह खबर लीक कर दी ।

            "पक्की बात है " राममिलन भैया ने कहा " बे लोग जल देवता को ही जल चढाते होंगे।" "भाई कहानी सुनना है कि नहीं ?" मैंने किंचित रोष के साथ कहा .. "हाँ हाँ सुनाओ सुनाओ .." राममिलन भैया ने कहा ।मैंने कहानी आगे बढ़ाई  " तो हुआ यह कि उन्होंने यह बात सरकंडों को बता दी कि देवता फिर से इस पृथ्वी को पानी में डुबोने वाले हैं । उस समय झोपड़ियाँ सरकंडों की बनी होती थीं सो  सरकंडों ने यह बात झोपडी के मालिक ज़िउसुद्दू को बता दी । फिर क्या था, इससे पहले कि प्रलय हो झोपड़ी के मालिक यानि उस मनुष्य ने एक बड़ी सी नाव बनाई, उसमें अपने परिवार को, कुछ शिल्पकारों को व पशु पक्षियों के जोड़ों को बिठा लिया । फिर तयशुदा दिन खूब बरसात हुई, नाव में बैठे लोगों के अलावा सारे लोग डूब गए । फिर एक दिन बारिश थम गई । बारिश थमने पर सबसे पहले नाव से कौवे को भेजा गया कि वह पता लगाये कहाँ पर सूखी ज़मीन है सो कौवा उड़ा, उसने सूखी ज़मीन का पता लगाया वहाँ सारे लोग उतर गए और धरती पर बस गए । फिर उनकी संतानें हुईं और इस तरह दुनिया आगे बढ़ी । “

“ यार यह कहानी तो हर धर्म में है जैसे हमारे यहाँ मनु की नाव है, इस्लाम और क्रिश्चेनिटी में नूह  या नोहा की नाव है ? “ अजय ने कहा । “ बिलकुल । “ मैंने जवाब दिया । “ ऐसा माना जाता है कि मेसोपोटामिया से ही यह कथा पूरी दुनिया में पहुँची । दज़ला फ़रात के दोआब में स्थित निनेवे नगर में ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता लेयार्ड ने उत्खनन किया था वहाँ लगभग साढ़े चार हज़ार साल पहले की ईटों पर कीलाक्षरी लिपि में लिखी यह कहानी मिली बाद में गिलगमेश नामक महाकाव्य भी मिला जो लगभग तीन सौ पट्टिकाओं पर लिखा हुआ था जिसमे यह पूरी कहानी थी । फिर सन सत्ताईस अठ्ठाइस में ब्रिटेन और अमेरिका के तत्वावधान में पुराविद लियोनार्ड वूली ने सुमेर सभ्यता के अनेक नगर खोज निकाले जिनसे इस कहानी की ऐतिहासिकता की पुष्टि हुई । बाद में अन्य धर्मों में यह कथा आई । इसी से प्रेरित होकर, देवी-देवताओं का भय दिखाकर पुरोहितों ने लोगों को डराया धमकाया, यदि वे देवताओं की बात नहीं मानेंगे तो फिर एक दिन प्रलय होगा । इसके अलावा भी देवी देवताओं के नाम पर,पूजा-पाठ के नाम पर, व्रत-उपवास के नाम पर, दान- दक्षिणा के नाम पर  मनुष्य को डराने के लिए बहुत सी कथाएं रची गईं । “

“लेकिन मैं फिर कह रहा हूँ यह इतिहास नहीं है ऐसा कभी हुआ ही नहीं ।“ अजय तर्क के मूड में था । “ हाँ ठीक है तुम्हारा कहना ।” मैंने कहा “यह इतिहास नहीं है, मैंने कहा तो कि उस दौरान वहाँ भीषण बाढ़ आई थी जिसका प्रमाण खुदाई में मिली मिटटी और गाद है जिसकी वज़ह से ऐसी कहानियाँ रची गई । और ऐसा केवल मेसोपोटामिया में नहीं हुआ बल्कि पूरी दुनिया में हुआ ।लेकिन अफसोस यही है कि पढ़े-लिखे लोग भी पुराणकथाओं को इतिहास मान लेते हैं । वे जीवन भर इस बात को सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि किसी काल में ऐसा ऐसा हुआ होगा । वे जानना ही नहीं चाहते कि यह कथाएँ देवताओं पर मनुष्य का विश्वास जगाने या इस आधार पर कुछ मनुष्यों द्वारा शेष मनुष्यों पर शासन करने के लिए रची गईं थीं । इसीलिए  इतिहासकारों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे आम लोगों को इतिहास की वास्तविकता बतायें और बतायें कि इतिहास और कहानी में क्या फर्क है । वरना लोग झूठ को ही हमेशा सच समझते रहेंगे । गोयबल्स की मशहूर उक्ति है, झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है ।”