सोमवार, 1 जून 2026

33- ऐसी जगह जहाँ कपड़ों के साथ प्रवेश वर्जित है

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

भाई तो क्या वहाँ नंगे जाते हैं ? अरे कुछ तो पहनते होंगे 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*युवा पुरातत्ववेत्ताओं की टीम अब एलोरा से आगे निकल चुकी है और उनका अगला पड़ाव है रास्ते में आनेवाला ज्योतिर्लिंग इसके बाद वे जायेंगे जैन साहब के मौसाजी के गाँव और फिर वाणी जी के यहाँ रात का भोजन करेंगे यह रोचक वर्णन पढ़िए इस भाग में ।*

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*भाग 33*

गुफा क्रमांक 16 में ऐसा क्या हुआ जो आप को नहीं पता 

बाहर ठंडे वातावरण से भीतर आने के बाद कुछ समय हमारा शरीर भीतर के तापमान के साथ सामंजस्य स्थापित करने में लेता है । रजाई में घुसने के बाद पहले तो कुछ देर बहुत तेज़ ठण्ड लगती है पर कुछ देर बाद शरीर सामान्य हो जाता है । वापस तम्बू में आने के बाद रज़ाई  के भीतर घुसते हुए रवीन्द्र को भी तेज़ ठण्ड लग रही थी उसने हलकी सी कंपकपाहट भरी आवाज़ में कहा .."हाँ यार अब सुना तेरा वो किस्सा ? रज़ाई में घुसकर किस्सा सुनने का मज़ा ही कुछ और है ।“ 

“हाँ, हाँ” मैंने कहा । मैं समझ गया, रवीन्द्र को एलोरा की गुफा क्रमांक सोलह में घटित उस घटना को जानने की उत्सुकता है । "ठीक है भाई बताता हूँ ।" मैंने कहा । "हुआ यह कि हम लोग भीतरी प्रांगण में बनी प्रतिमाएँ देख रहे थे । त्रिवेदी सर भी हमारे साथ थे और प्रतिमाओं के लक्षणों को समझने में हमारी मदद कर रहे थे । अचानक एक प्रतिमा के करीब पहुँचकर उन्होंने  पूछा “बताओ यह किसकी प्रतिमा है ?“ 

हम लोग सर खुजलाने लगे । प्रतिमा के लक्षणों में गदा, शंख, चक्र और पद्म दिखाई दे रहे थे और साथ ही जटाएँ, नाग व त्रिशूल भी दिखाई दे रहे थे । एक ओर से देखो तो वह विष्णु की प्रतिमा दिखाई देती थी और दूसरी ओर से शिव की । हम लोग शिव और विष्णु के विभिन्न नामों का उच्चारण करते रहे रूद्र,पशुपति,महाकाल, श्रीधर,नारायण,गरुड़ध्वज आदि लेकिन त्रिवेदी सर, सर हिलाकर इन्कार करते रहे ।

कुछ देर में ही वहाँ भीड़ लग गई । अन्य पर्यटक भी इस बात का इस रूप में आनंद ले रहे थे जैसे वहाँ कोई पहेली प्रतियोगिता चल रही हो । वे भी शिव और विष्णु के विभिन्न नामों का उच्चारण करते रहे ।अंत में जब सब हार गए तो सर को पता नहीं क्या सूझी वे जाकर उस प्रतिमा की बगल में खड़े हो गए और कहा “अब बताओ ?“ 

मैंने सोचा सर के प्रतिमा की बगल में खड़े होने में अवश्य ही कोई अर्थ छुपा है । कुछ देर सोचने के बाद मैंने सर के नाम के बारे में सोचा । उनका नाम एच. वी. त्रिवेदी है, यानि हरिहर वी. त्रिवेदी । मेरे दिमाग़ की बत्ती जल गई और मैंने तपाक से कहा “सर यह 'हरिहर' की प्रतिमा है । “ 

सर ने कहा “ बिलकुल ठीक । हरि यानि विष्णु और हर यानि शिव यह दोनों के संयुक्त रूप की प्रतिमा है, विष्णु और शिव की प्रतिमा के लक्षणों से युक्त इस प्रतिमा का नाम इसीलिए ‘हरिहर‘  है । वहाँ उपस्थित लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं । 

[हरिहर प्रतिमा हिंदू धर्म में भगवान शिव (हर) और भगवान विष्णु (हरि) के एकाकार (जुड़े हुए) रूप को दर्शाती है। यह मूर्ति शैव और वैष्णव संप्रदायों की एकता का प्रतीक है, जो यह संदेश देती है कि दोनों देव एक ही सर्वोच्च शक्ति के दो रूप हैं। [1, 2, 3, 4]

प्रतिमा का स्वरूप:
  • दाहिना भाग: भगवान शिव का होता है, जिनके हाथों में त्रिशूल और मुंडमाला होती है। जटा और तीसरा नेत्र भी इसी तरफ उकेरे जाते हैं। [1, 2, 3]
  • बायाँ भाग: भगवान विष्णु का होता है, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा या पद्म होता है। मुकुट और आभूषणों से अलंकृत रहता है। [1, 2, 3, 4]]

सर ने मेरी पीठ ठोंकी और कहा “तुम प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एव पुरातत्व में पूरे विक्रम विश्वविद्यालय में टॉप करोगे, यह मेरा आशिर्वाद है ।" मैंने तुरंत उनके चरण स्पर्श किये । ( बाद में मैंने वाकई में टॉप किया ) 

डायरी वाचन को विराम देते हुए मैंने मित्रों की और देखा । रवींद्र ने तालियाँ बजाने की शुरुआत की जिसमे सभी मित्र शामिल हो गए । “ और फिर त्रिवेदी सर का आशीर्वाद फलीभूत हुआ ,हमारे मुन्ना ने प्रीवियस में यूनिवर्सिटी में टॉप करके दिखाया ..पुनः बधाई ।” रवींद्र ने अपना एक्सपर्ट कमेन्ट दिया ।

"ठीक है, ठीक है, धन्यवाद भाई ..अब आगे की कथा सुनो ।" मैंने बात आगे बढ़ाई ... "धूप तेज़ हो चली थी और मैंने धूप से बचने के लिए  टोपी पहन रखी थी । जिन चट्टानों पर धूप पड़  रही थी और वे गर्म हो गई थीं । बीच बीच में मैं किसी मंदिर की छाँव में जाकर बैठ जाता था । 

मुझे ईश्वर में विश्वास नहीं है लेकिन मैंने महसूस किया कि ईश्वर में आस्था रखने वालों के लिए आस्था भी एक छाँव जैसी ही होती है जब तक रहती है तब तक वे चैन से रहते हैं और जब नहीं रहती तब भी वे इसके बगैर जी लेते हैं । 

कैलाश मंदिर के भीतर छाँव वाले हिस्से के पत्थर गर्म नहीं थे बल्कि अपेक्षाकृत ठंडे थे और दोपहर की तेज़ धूप से राहत पाने के लिए उस पर लोटने में मुझे आनंद आ रहा था । अचानक मुझे याद आया तीस साल पहले मेरे पिता जगमोहन कोकास अपने कॉलेज के छात्रों को लेकर इसी स्थान पर आये थे और उन्होंने एक तस्वीर भी खिंचवाई थी किसी चट्टान पर बैठकर जो मैंने उनके एल्बम में देखी थी मैंने उस चट्टान को ढूँढने की कोशिश की, साथ ही मुझे इस बात के लिए भी अफ़सोस हुआ कि हम में से किसी के पास कैमरा नहीं था ।

लीजिये पिताजी की वह तस्वीर 

"हाँ यार ,तुम लोग कैमरा क्यों नहीं ले गये थे ?" अजय ने पूछा । "अब क्या बतायें यार .." मैंने कहा" होता तो ले नहीं जाते ..इतनी ग़रीबी में गये थे कि खाने को भी पूरे पैसे नहीं थे हम लोगों के पास ..कैमरे का इंतजाम कहाँ से करते फिर कैमरे के अलावा फ़िल्म के भी तो पैसे लगते । हाँ डिपार्टमेंट से जैन साहब को कैमरा ले जाना था लेकिन पता नहीं क्या हुआ वे भी नहीं ले गए अब उनके लिए यह टूर कोई नई बात तो थी नहीं ।"

 "दुखी मत हो भाई.." रवींद्र ने कहा "यह तैने जो लिखा है ना वह कैमरे की किसी तस्वीर में नहीं आ सकता था । इसीलिए कहते हैं कि शब्द की क्षमता और ताकत हमेशा चित्र से अधिक होती है ।" मैंने कृतज्ञ भाव से रवींद्र की और देखा । "चल भाई आगे सुना ।" किशोर भैया को आगे का हाल जानने की उत्सुकता थी । "ठीक है सुनो.." मैंने कहा ।

दोपहर के साढ़े तीन बज चुके थे । हम लोग जल्दी जल्दी एलोरा की सारी गुफायें देख रहे थे । हालाँकि हमें यह पता था कि सैलानियों के लिए पिकनिक भाव से भले ही एक दिन में यह स्पॉट देख लेना संभव हो, परन्तु शैक्षणिक भाव से इनका अध्ययन करने वाले हम पुरातत्व के छात्रों के लिए यह संभव नहीं था । लेकिन समय कम था सो वापस भी लौटना था । भूख अलग सत्याग्रह कर रही थी, सो बेमन से ही सही शाम ढलने के पहले हम लोगों को बाहर आना पड़ा । 

एलोरा केव्स के परिसर में ही कुछ खाने की दुकानें थीं । भूख के इलाज़ के लिए एक कैन्टीन का प्रिस्क्रिप्शन देखा तो ज्ञात हुआ कि 'राइस प्लेट' उपलब्ध है जिसमे हमें चार रोटी, दाल और चावल दिया जाएगा । लेकिन भोजन ठंडा हो चुका था और खाना गरम कर खिलाने में होटल मालिक को कोई दिलचस्पी नहीं थी । मैंने और महेश ने ऐसे भोजन के लिए पैसे बर्बाद करने से बेहतर चाय और बिस्किट लेना उचित समझा । हालाँकि हमारे कुछ मित्र ठंडी राइस प्लेट ही उदरस्थ कर गए । बाद में जब चाय बिस्किट से भी हमारा पेट नहीं भरा तो हमने कुछ फल और ब्रेड भी ले ली ।

चलो अब उस जगह चलते हैं ..बिना कपड़ों वाली 

वापसी में पता चला कि एलोरा से कुछ ही दूरी पर घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग है, यह देश के प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है । इसका निर्माण शिवाजी के पितामह मालोजी राजा भोंसले ने करवाया था । तत्पश्चात इसका जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर ने करवाया । यह मंदिर भी डेक्कन ट्रैप के उन्हीं लाल भूरे बेसाल्ट पत्थरों से बना है । जनता की राय हुई कि लगे हाथ इसके भी दर्शन कर लिए जाएँ । 

वहाँ पहुँचने पर पता चला कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए कपड़े उतारकर नंगे बदन,केवल धोती पहनकर ही प्रवेश मिल सकता है । 

वहाँ इस शुभ कार्य के लिए बाकायदा किराये पर धोती भी उपलब्ध थी, लेकिन दूसरों के उतारे वस्त्र धारण करने से बेहतर दर्शन न करना ही ठीक है, यह कहकर कुछ मित्र तो मुक्त हो लिए । मुझे गर्भगृह में स्थापित भगवान से तो कुछ लेना देना नहीं था लेकिन गर्भगृह के भीतर की वास्तुकला देखने की मेरी इच्छा अवश्य थी । 

कुछ मित्र किराये की धोती पहनकर अवश्य भीतर गए जिन्हें  बाद में हम लोग खुजली की बीमारी हो जाने का राग देकर डराते रहे । महेश ने कहा “ गनीमत है ठन्ड के दिन नहीं हैं वरना इनमें से कुछ लोग ठंड की वज़ह से ही नंगे बदन इस ठंडे अन्धेरे गर्भगृह में प्रवेश करने से इन्कार कर देते ।“ 

बस में बैठने के पश्चात महेश ने धीरे से पूछा ... “यार स्त्रियों के लिए  भी मन्दिर में प्रवेश करने की यही शर्त है क्या ?“ मैंने उसे घूरकर देखा तो वह चुप हो गया । 

फिर मैंने मुस्कुराकर उससे कहा .. “ तुझे नहीं पता इस देश में मंदिर पुरुषों ने बनाए हैं और नियम भी उन्ही के बनाये हुए चलते हैं । विशिष्ट वस्त्र धारण कर प्रवेश करना तो दूर 

देश में ऐसे बहुत सारे मंदिर हैं जहाँ स्त्रियों के लिए प्रवेश भी वर्जित  

है, केरल का पद्मनाभ मंदिर, पुष्कर का कार्तिकेय मंदिर, त्र्यम्बकेश्वर मंदिर और शिंगनापुर का शनि मंदिर तो इसके लिए प्रसिद्ध है ही । 

सामान्य मंदिरों में भी रजस्वला होने की स्थिति में स्त्रियों को प्रवेश नहीं मिलता । स्त्रियाँ इस स्थिति में न घर में पूजा -पाठ कर सकती हैं न किसी धार्मिक कार्यक्रम में भाग ले सकती हैं । धर्म कोई भी हो उसमें स्त्रियों को सदैव गौण ही माना गया । जबकि इस देश में स्त्रियों को देवी मानकर पूजा जाता है । और स्त्रियाँ ही नहीं दलितों के लिए भी कई मंदिरों में प्रवेश निषेध है । 

बाबासाहब आम्बेडकर ने इसीलिए सन 1930 में दलितों के मंदिर प्रवेश का आन्दोलन प्रारंभ किया था । देख लो अब इस वैज्ञानिक युग में भी यह हाल है ।“ मैंने देखा कि महेश मेरी बात अनसुनी कर कहीं और देखने लगा था । जब भी मैं काम की कोई बात करता था उसका ध्यान मेरी बात में नहीं लगता था ।

घृष्णेश्वर मंदिर से बाहर निकलकर बस में बैठते ही जैन साहब ने घोषणा की "अब हम लोग यहाँ से चापानेर जायेंगे, वहाँ चाय पियेंगे और फिर रात्रि भोजन वाणी जी के गाँव में करने के पश्चात रात में ही धार और मांडू के लिए रवाना हो जायेंगे ।" 

महेश ने कहा " मतलब आज भी बाबाजी ने नाईट हाल्ट के पैसे बचा लिए ।" मुझे तो रात की यात्रा से वैसे भी कोई परेशानी नहीं थी मैंने उससे कहा " तो क्या हुआ वैसे भी अब वापस औरंगाबाद तो जाना नहीं है कांता बेन से दोबारा मिलना है क्या ? " महेश मुस्कुराने लगा । 

अब इससे आगे की हमारी यात्रा मांडू और धार होते हुए उज्जैन वापसी की यात्रा थी । कुछ ही देर में हम लोग  चापानेर पहुँच गए  । वहाँ पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि यह जैन साहब के मौसाजी का गाँव है । कुछ देर ठहरकर हम लोगों ने चाय पी और साथ में बिस्कुट तो थे ही । 

रात्रि के भोजन की व्यवस्था हमारे डिपार्टमेंट के एक कर्मचारी श्री विनायक वाणी के गाँव उम्बरखेड़ में थी । वाणी जी ने पहले ही पत्र द्वारा अपने घर के लोगों को सूचित कर दिया था कि हम लोग फलां फलां तारीख को पहुँचेंगे ।पहले तो हम लोग शहरी होने के अपने श्रेष्ठता बोध के कारण गाँव जाने की बात पर ही नाक भौं सिकोड़ते रहे लेकिन जैसे ही हम लोग गाँव पहुँचे, पीपल के नीचे बिछी हुई चारपाइयाँ और विशाल कुएँ को देख कर हमें  लगा ... अरे वाह यही है गाँव का असली आनंद । वहाँ हम लोगों के स्वागत की अभूतपूर्व तैयारी थी ।

वाणी जी के इस बाड़े नुमा मकान के आँगन में स्थित कुएँ से बाल्टी भर भर कर पानी खींचने और नहाने में जो आनंद आया वह किसी फ़ाइव स्टार होटल के सुसज्जित, सर्वसुविधायुक्त बाथरूम में भी नहीं मिल सकता था । दिन भर की थकान से चूर, पसीने से महकते बदन को ठण्डा पानी भिगोता रहा और फिर हवाओं के टॉवेल ने उसे सुखाकर तरोताज़ा कर दिया । 

वाणी जी ने हम लोगों के लिए  विशुद्ध महाराष्ट्रीय ढंग का भोजन बनवाया था, मीठी नीम की पत्ती और राई से छौंकी हुई गरमागरम कढ़ी साथ में गरम गरम चावल, बैंगन की झन्नाटेदार सब्ज़ी, हरी मिर्च की चटनी, प्याज़ का बेसन , नीबू प्याज़ टमाटर हरी मिर्ची का सलाद, मिर्ची और लहसुन को कुचलकर बनाया गया 'ठेचा',  साथ में गुड़ और दूध । दो दिनों से हम लोग अल्लम -गल्लम खाकर अपना पेट भर रहे थे यहाँ तो सम्पूर्ण भोजन उपलब्ध था और उसके लिए हमें पैसे भी नहीं देने थे । हम लोगों ने छककर इन व्यंजनों का स्वाद लिया ।

भोजन के बाद कुछ देर हम लोगों ने आंगन में बिछी चारपाईयों पर कमर सीधी की । मैंने तो बाकायदा दो घंटे की नींद ही ले ली । ठीक एक बजे जैन साहब ने सबको जगा दिया .."चलो बच्चों ,अपना सामान समेटो और बस में बैठ जाओ ।" मैंने रवींद्र को जगाते हुए कहा ..चल भाई .. गाँव के सुख से बाहर निकलने का समय हो गया है ।" 

चलो अब बाज बहादुर और रानी रूपमती के शहर जाना है 

हमारा अगला पड़ाव था मांडू । जब मैं बस में सवार हुआ तो काफी फ़्रेश महसूस कर रहा था । मैं सामने जाकर ड्राइवर की सीट की बगल में बैठ गया । ड्राइवर जमनालाल जी ने कहा, “ साहब आज आप मेरे साथ जागियेगा देखिये सुबह तक मांडू न पहुँचा दूँ तो ।"  मैंने कहा “ ज़रूर, आप चलाते रहो हम चलते रहेंगे । कुछ देर में ही मेरा लॉन्ग प्ले रिकार्ड शुरू हो गया … सुहाना सफर और ये मौसम हँसी … खोया खोया चांद खुला आसमान …आँखों में सारी रात जाएगी , तुमको भी कैसे नींद आएगी । और मुझे सचमुच नींद नहीं आई ।

मैंने डायरी बंद की "भाई वहाँ भले ही नींद न आई हो लेकिन अब तो हमें नींद आ रही है ।" अशोक ने कहा .." यार तू भी गजब करता है बस दो पन्ने ही तो बचे हैं वह भी सुना दे फिर यात्रा की यह डायरी ख़तम .. रुक जा एक सुट्टा मार कर आता हूँ ।" अशोक को उठता देख हम सब लोग अपनी अपनी रजाइयों से बाहर निकले और मैदान की और चल दिए ।

बाज बहादुर और रानी रूपमती का किस्सा और इतिहास अगले एपिसोड में पढ़ें 

*शरद कोकास*


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