अरे भूल गए विक्षिप्त मुहम्मद बिन तुगलक का नाम जो दिल्ली से दौलताबाद राजधानी लेकर गया था ।
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
पूर्वकथा- किसी को पता ही नहीं चला और शरद और महेश दोनों दोस्त औरंगाबाद शहर की सैर कर वापस आकर धर्मशाला में सो गए । चोरी छुपे शहर की सैर करना उनके लिए एक अद्भुत अनुभव था । छात्र जीवन की भी कैसी विवशता होती है आसपास कितने विविध तरह का भोजन था लेकिन उनके जेब में पैसे नहीं थे । खैर अब आगे की कहानी पढ़िए । आज यह लोग जा रहे हैं मुहम्मद बिन तुगलक की राजधानी यानि दौलताबाद देखने वहाँ इन लोगों ने जो शरारतें की हैं उसे देखकर आप हँस हँस कर लोटपोट हो जाएंगे । *
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*भाग 31*
रात मे तंबू के भीतर का दृश्य देखिए
" यार सोने की बात मत करो ,सोने की बात से ही मुझे नींद आने लगती है । " अशोक ने लम्बी सी उबासी ली और जेब में रखा अपना सिगरेट का पैकेट और माचिस निकाल ली ।
मैंने कहा " भाई मेरे, मैं तो औरंगाबाद की उस जीर्ण-शीर्ण धर्मशाला में सोने की बात कर रहा था यहाँ तो अपन अभी जागे हुए ही हैं ।
"लेकिन यार एक बात बता .." अशोक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा " तू जब सो गया था तो तूने डायरी कब लिखी ? मतलब तू डायरी लिखने का समय कैसे निकालता था ?" अशोक का सवाल वाजिब था ।
मैंने उसे डायरी लिखने का रहस्य बताया । " भाई इतनी भागदौड़ के बीच डायरी लिखना तो वाकई कठिन था इसलिए मैं सोने से पूर्व या बस में बैठे बैठे एक कॉपी में जल्दी जल्दी नोट्स ले लेता था और फिर फुर्सत मिलते ही उन्हें व्यवस्थित रूप से डायरी में उतार लेता था ।
बहुत कुछ तो मैंने उज्जैन वापस आने के बाद लिखा है । यही मेरी डायरी लेखन की रचना प्रक्रिया है ।" " अच्छा इसलिए तेरी डायरी इतनी सुव्यवस्थित है भाषा और शिल्प के लिहाज़ से ।" अशोक की इस प्रशंसा पर मैंने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया ।
अजंता एलोरा के उस टूर में अजय हम लोगों के साथ नहीं गया था इसलिए उसे यात्रा के बारे में जानने की उत्सुकता सबसे अधिक थी । आगे की डायरी वाचन के लिए मुझे उकसाते हुए उसने पूछा । “औरंगाबाद के बाद अगला गन्तव्य तुम लोगों का एलोरा था ना ?
“हाँ“ रवीन्द्र ने कहा … एलोरा की यात्रा के बीच मुहम्मद बिन तुगलक की राजधानी भी पड़ी थी और वहाँ हमारे राममिलन भैया और महेश ने मिल कर ऐसा उधम मचाया कि पूछो मत । “
“अरे वा ! बताओ ना यार फिर क्या हुआ ।" अजय की उत्सुकता इतनी बढ़ गई कि उसने ऊँट की तरह अपनी गर्दन आगे बढ़ा ली । रवीन्द्र ने उसकी गर्दन पकड़ी, उसे पीछे की ओर खींचा और ठीक से बैठा दिया ।
रवीन्द्र और अजय के बीच घटित यह दृश्य इतना नाटकीय था कि मुझे हँसी आ गई । मैंने कहा “बताता हूँ यार । औरंगाबाद की इस धर्मशाला में सोने की सुविधाजनक स्थितियाँ तो नहीं थीं किन्तु थकान नींद का साथ दे रही थी अतः सुविधाजीविता को उसके आगे परास्त होना ही था ।
रात देर से सोने के बावजूद सुबह हम लोग जल्दी ही जाग गए और नहा धोकर तैयार हो गए । अक्सर जब सुबह सुबह कहीं निकलना होता है तो हम अपने आलस्य को अपने उत्साह के साथ समायोजित कर लेते हैं । धर्मशाला के सामने ही एक दुकान पर गर्मागर्म चने की मिसल वाला पोहा उपलब्ध था । एक कढ़ाई में तैयार पोहे का ढेर उस पर हरी मिर्ची,कटे हुए नीबू और लाल टमाटरों की सजावट हमें आकर्षित कर रही थी । वहीं एल्युमिनियम के एक गंज में देसी चने की रसेदार सब्ज़ी जिसे महाराष्ट्र में मिसल कहते हैं खदबदा रही थी । दोसे की तरह पोहा भी एक राष्ट्रीय नाश्ता है और काफी गरिष्ठ भोजन है फिर हम जैसे मुफलिसों के लिए तो यह नियामत है ।"
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| देसी चने की मिसल |
"यह मिसल और पोहे का क्या सम्बन्ध है ?" अजय ने मुझे बीच में ही रोककर पूछा ।अजय की यह अच्छी आदत है कि वह किसी भी जिज्ञासा को पेंडिंग नहीं छोड़ता और तुरंत पूछ लेता है । मैंने उसकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा "अपने मालवा में जैसे पोहे पर सेव डालकर देते हैं
वैसे ही महाराष्ट्र में पोहे पर उबले चने या मटर की गर्मागर्म सब्ज़ी यानि मिसल डालकर देते हैं ,इस तरह ठण्डा पोहा भी गर्म हो जाता है साथ ही तीखा खाने वालों की जिव्हा को उसका मनवांछित स्वाद भी मिल जाता है ।" अजय को जैसे नए ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी .. " अच्छा समझ गया, अपने यहाँ जैसे गर्म पानी की गंजी पर पोहे की कढ़ाई रखकर उसे चोवीस घंटे गर्म रखते हैं वैसे ही वहाँ मिसल को गर्म रखने का चलन होगा ।"| वड़ा पाव |
"हाँ, ऐसा ही कुछ है ।" मैंने कहा " मिसल के साथ यदि पाव यानि डबलरोटी लो तो उसे मिसल पाव कहते हैं और यदि उसी पाव को गर्मागर्म सब्जी यानि भाजी के साथ खाओ तो उसे भाजी पाव कहते हैं और वड़ा अर्थात आलूबोंड़े के साथ खाओ तो वह वड़ा पाव हो जाता है ।
महाराष्ट्र में खासकर मुंबई में यह गरीबों और मिल मजदूरों का खाना रहा है जो किसी ज़माने में बहुत सस्ता मिलता था । अंग्रेज़ों के ज़माने में जो मज़दूर कपड़ा मिलों में काम करते थे उनसे इतना काम लिया जाता था कि खाना पकाने का उनके पास समय नहीं रहता था सो इसी भोजन से वे अपनी भूख मिटाया करते थे । इनमे से पाव भाजी यह भोजन भी अब इडली-दोसे की तरह राष्ट्रीय भोजन हो चला है जिसे अब मक्खन - वक्खन के आडम्बर के साथ अभिजात्य वर्गीयों ने अपना लिया है । "पाव भाजी
"खैर आगे सुनो ।" भोजन पर अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए मैंने कहा " मिसल पोहे का नाश्ता करने के बाद हम लोग बस में आकर बैठ गए । हमें लौटकर औरंगाबाद नहीं आना था इसलिए हम लोगों ने अपना सामान भी बस में रख लिया था । बसंत का यह मौसम बहुत ही सुहावना था और हवा भी मंद मंद बह रही थी ।
बस की खिड़की से मैंने एक बार धर्मशाला की उस इमारत की और देखा सुबह के उजाले में वह कल की अपेक्षा ज़्यादा स्वस्थ्य लग रही थी । सब लोग जब बस के भीतर आकर बैठ गए तो जैन साहब ने एक बार पीछे मुड़कर देखा और पूछा " सब लोग आ गए ना ? " "यस सर " हम लोगों ने समवेत स्वरों में जवाब दिया ।
जैन साहब ने जमनालाल जी से कहा " चलो भाई । " ड्राइवर साहब ने जी साहब कहते हुए बस के सेल्फ में चाबी घुमा दी । हमारी बस अब एलोरा की ओर निकल चुकी थी । हम लोगों के पेट भरे हुए थे , नींद भी पूरी हो चुकी थी सो कुछ कुछ गाने का मन कर रहा था ..
" सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी .. हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं .."
मैंने तान छेड़ी ही थी कि देखा एक चमचमाती हुई टूरिस्ट बस हमारी मिनी बस की बगल से उसे ओवरटेक करते हुए आगे निकल गई । हमने देखा कि उसमें बैठे यात्री अपनी खिडकियों से झांकते हुए बहुत कुतुहूल से हमारी पुराने ज़माने की डॉज़ को देख रहे हैं ।
हमारे एक तेलगू भाषी सहपाठी केम्पुला लक्ष्मी नारायण ने कहा “ ये लोगां सोच रहे होयेंगे कि यह बस मोहन्जोदड़ो की खुदाई से निकली है ।“ उसकी बात पर हम सब लोगों ने ठहाका लगाया ।
केम्पुला की बात हमारी खटारा बस के ड्राइवर जमनालालजी के कानों तक भी पहुँच गई । उनके भीतर का अनुभवी कुशल चालक जाग गया और उन्होंने इस बात को ज़रा गम्भीरता से ले लिया । उन्होंने बस की स्पीड बढ़ाई और कुछ ही मिनटों में उस चमचमाती हुई टूरिस्ट बस से आगे निकल गए ।
जैसे ही हमारी डॉज़ उस बस से आगे निकली हम लोगों ने खुशी से 'हुर्रे…' कहा । लेकिन कुछ मिनटों बाद टूरिस्ट बस के ड्राइवर ने मौका देखा और ओवरटेक कर अपनी बस को हमारी बस से आगे ले गया । अबकी बार 'हुर्रे' की आवाज़ उस बस से आई ।
लेकिन जमनालाल जी भी कहाँ मानने वाले थे, एक जगह मौका देखकर वे फिर अपनी डॉज उस बस से आगे ले गए ।फिर तो दौलताबाद तक यह चूहे बिल्ली का खेल चलता रहा । हम लोग मस्ती के मूड में थे, गाने गा रहे थे और शोर मचा रहे थे । ऐसा लग रहा था जैसे हम लोग सचमुच पिकनिक के मूड में हों । जैन साहब और त्रिवेदी सर हम छात्रों की उधमबाज़ी देखकर भी अनदेखा कर रहे थे और आँखें बन्द किए मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे ।
हमारा अगला पड़ाव था दौलताबाद, अर्थात देवगिरी,
वह जगह जो मुहम्मद बिन तुगलक के तुगलकी फ़रमान की वज़ह से प्रसिद्ध है । हमने इतिहास की पुस्तकों में यह पढ़ रखा था कि सन 1325 ईसवी में तुगलक़ वंश के बादशाह गयासुद्दीन तुगलक़ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जौना खां 'मुहम्मद बिन तुगलक़' की उपाधि धारण कर दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठा ।
वह अत्यंत बुद्धिमान,धर्मनिरपेक्ष, कलाप्रेमी और कुशल योद्धा था लेकिन उसके नाम के साथ अनेक विशेषण भी जुड़े हैं जैसे ‘
अंतर्विरोधों का विस्मयकारी मिश्रण ‘
, रक्त का प्यासा ‘ इत्यादि । वहीं उसे परोपकारी की उपाधि भी दी गई है । उसने धर्म,जाति ,नस्ल आदि के आधार पर पद आवंटित न कर योग्यता के आधार पर लोगों को पद प्रदान किये थे ।
"मतलब मुहम्मद बिन तुगलक के समय आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी ?" अजय ने सवाल किया ।
"भाई उस समय आरक्षण जैसा कोई शब्द नहीं था यह तो हमारे देश की स्वतंत्रता के पश्चात देश के दलितों,पीड़ितों और शोषितों के उत्थान के लिए बाबासाहब आंबेडकर के प्रयासों से ही संभव हुआ । और यह ज़रूरी भी था । खैर ..."
मैंने कहा "हम मुहम्मद बिन तुगलक की बात कर रहे थे । उस समय दिल्ली सल्तनत तेईस प्रान्तों में विभाजित थी । दक्षिण के वैभव और सम्पन्नता से आकर्षित होकर उसने एक फ़रमान जारी किया कि अबसे राजधानी दिल्ली नही बल्कि देवगिरी या दौलताबाद होगी ।
राजधानी परिवर्तन के कारणों पर इतिहासकारों में काफी विवाद है । कुछ लोगों का कहना है कि मंगोल आक्रमणकारियों से सुरक्षा हेतु उसने दक्षिण के इस स्थान का चयन किया ।जो भी हो फ़रमान जारी करने के बाद मुहम्मद बिन तुगलक़ स्वयं अपना राजकाज यहाँ ले आया और जनता के लिए हुक्म जारी किया कि सब लोग दिल्ली खाली कर दें और दौलताबाद चले जाएँ ।
"यह बात तो इतिहास में बहुत चर्चा में रही है इसी कारण तो उसे पागल कहा गया" अजय ने कहा ।
"हाँ भाई ऐसा ही है लेकिन सुन लो फिर से रिविज़न हो जायेगा " मैंने कहा .." बस फिर क्या था, सारे बूढ़े - बच्चे, औरतें पैदल पैदल दौलताबाद के लिए रवाना हो गए । अब दिल्ली से दौलताबाद इतना करीब तो था नहीं कि एक दिन में पहुँच जाएँ । रास्ते में न जाने कितने लोग मर गए । लेकिन कुछ दिनों बाद उसका मूड बदल गया और उसने तेरह सौ पैंतीस में फिर फ़रमान जारी कर दिया कि सब लोग वापस दिल्ली आ जाएँ ।
थके-मांदे बीमार लोग पुन: दिल्ली के लिए निकल पड़े, कुछ लोगों ने जाने से इंकार कर दिया और वे लोग यहीं या रास्ते में ही बस गए । यह अजीब तरह की पागलपन की हरकत थी इसीलिए इतिहास मे उसका नाम विक्षिप्त के रूप में दर्ज है । हालाँकि दक्षिण में इस्लामिक संस्कृति के विकास में इस घटना का बहुत योगदान रहा । आगे चलकर बहमनी साम्राज्य की स्थापना में भी इसकी भूमिका रही ।
"मतलब अभी जो दौलताबाद के आसपास मुस्लिम आबादी है वह उन्हीं लोगों की वंशज है ?" अजय ने पूछा ।
"हाँ ऐसा हो सकता है ।" मैंने कहा .."खैर आगे सुनो.. दौलताबाद के इस चर्चित किले को देखने के लिए हम लोग बस से उतरे । जैन साहब और डॉ एच. वी. त्रिवेदी बस में ही बैठे रहे ।
जैन सर ने कहा “ हम लोग इतनी बार यह किला देख चुके हैं कि अब हमें इसमें कोई रुचि नहीं है, जाओ तुम लोग देख आओ, इसका इतिहास तो तुम लोग जानते ही हो । “दोनों की बात सुनकर हम लोगों ने राहत की साँस ली, दरअसल हम लोग चाहते भी यही थे । लेकिन जाने से पहले उन लोगों ने हमारे लिए एक शर्त रख दी “देखें कौन जल्दी किला देखकर आता है ।“
मैंने महेश से कहा “भाई अपन तो नहीं जीतने वाले, वैसे भी यह शर्त इसलिए है कि हम लोग फालतू समय न बर्बाद करें ।“ हमारी बस के साथ भागमभाग का खेल खेलने वाली वह टूरिस्ट बस भी वहीं ठहर गई थी और सैलानी उतर कर प्रवेश द्वार की ओर आ रहे थे । यह पुणे या मुम्बई का कोई ग्रूप था जिसमें कई परिवार शामिल थे । रंगबिरंगे परिधानों में बस से उतरती लड़कियों को देखकर महेश बहुत अर्थपूर्ण ढंग से मेरी ओर देखकर मुस्कराया । संकेतात्मक चित्र
“ हा हा हा “ अचानक अजय जोर से हंसने लगा । “अरे क्या हुआ ?“ मैंने पूछा । “कुछ नहीं ।“ अजय ने कहा ..” मुझे महेश ने यह किस्सा सुनाया था कि उसने वहाँ कितनी बदमाशियाँ की थीं ।“
रवीन्द्र ने ऑब्जेक्शन लिया “लेकिन महेश ने कहाँ कोई बदमाशी की थी, ना किसी लड़की को छेड़ा, ना किसीसे अभद्र व्यवहार किया । महेश स्मार्ट ज़रूर है लेकिन बदमाश नहीं है ..और हमारा यह मुन्ना भी बिलकुल बदमाश नहीं है, हाँ लड़कियों को देखकर इसकी आँखों में चमक ज़रुर आ जाती है और आवाज़ भी थोड़ी बदल जाती है ।“ रवींद्र ने शरारत भरी नज़रों से मेरी ओर देखते हुए कहा ।
“नहीं यार, बदमाशियों से मेरा मतलब उस टूरिस्ट गाइड को परेशान करने के लिए तुम लोगों ने जो हरकतें की थी उससे था । “ अजय ने कहा ।
“हाँ हाँ, वही किस्सा तो सुना रहा हूँ .. आगे सुनो ।“ मैंने कहा .. “उस किले को नीचे से देखने पर यह प्रतीत ही नहीं होता था कि वह किला इतनी ऊँचाई पर बना होगा । कुछ देर तक तो हम किले के भीतर समतल मार्ग पर चलते रहे तत्पश्चात सीढ़ियाँ प्रारंभ हो गईं । मुम्बई का वह पर्यटक दल भी हमारे साथ साथ चल रहा था या ऐसा कह लें कि हम उनके साथ साथ चल रहे थे । उनका गाइड उन्हें किले के बारे में विभिन्न जानकारियों से अवगत करा रहा था ।
अचानक राममिलन भैया ने सवाल किया “का हो ..यह नीचे की ओर जौन बैरक जैसी बनी हैं यह किसलिए हैं ?“
महेश ज़ोर से हँसा और उसने तेज़ आवाज़ में कहा “ अरे का राममिलन भैया, इत्ती सी बात नहीं ना मालूम ? युद्ध के दौरान अगर किसी सिपाही को बीड़ी सिगरेट की तलब लगती तो वह कहाँ जा सकता था ? बस, यह बैरकें उसी काम में आती थीं .. दो सुट्टे मारो और फिर लड़ने लग जाओ ।“
हमने देखा कि ऐसा कहकर पर्यटक दल के बहुत सारे लोगों का ध्यान उसने अपनी ओर आकर्षित कर लिया था । भीतर पहुँचते पहुँचते तक तो उसने कुछ लोगों से अच्छी - ख़ासी दोस्ती भी कर ली थी ।
"ई महेसवा तो ई काम में बहुत माहिर है ,हमरा बहुतै मनोरंजन किया था उसने " राममिलन भैया की आँखों में दौलताबाद टूर का वह दृश्य कौंध रहा था ।
"आगे बताओ भाई सरद " उन्होंने उत्सुकता ज़ाहिर करते हुए कहा । " बिलकुल" मैंने आगे का वर्णन पढ़ना शुरू किया " किले के बेस से कुछ ऊपर की ओर जाने के पश्चात कुछ दूर चलकर एक गलियारा था जिसमें से कुछ चक्करदार सीढीयाँ किले के ऊपरी हिस्से की ओर जाती थीं । इन सीढ़ियों पर बिजली की व्यवस्था नहीं थी । गहन अन्धकार में उन सीढ़ियों से ऊपर की ओर जाना असंभव था इसलिए वहाँ एक मशालची की व्यवस्था की गई थी जो थोडा बहुत मेहनताना लेकर मशाल की रौशनी में छोटे छोटे समूहों में पर्यटकों को ऊपर की ओर ले जाता था ।
हम लोगों ने जैसे ही ऊपर जाने के लिए मशालची से बात की उस लक्ज़री बस वाले पर्यटक दल का गाइड वहाँ आ गया और उसने कहा "आप लोग बाद में आये हैं पहले हमारे ग्रूप के लोग ऊपर जायेंगे ।"
हम समझ गए, वह गाइड बार बार उसकी बस से अपनी मिनी बस को आगे ले जाने वाली हमारी हरकतों की वज़ह से पहले से ही हमसे खफ़ा था और इसीलिए वह इस बात के लिए अड़ गया कि पहले उसके दल के लोग ऊपर जाएँगे ।
हालाँकि हम लोग साथ साथ ही वहाँ पहुँचे थे और यह आवश्यक नहीं था कि हम लोग ही पहले ऊपर जाएँ लेकिन उसका कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि हम लोगों को वह अपमानजनक लगा ।
अब तो हम लोगों के लिए यह प्रेस्टिज का सवाल हो गया था । वैसे भी हम लोग कुछ शरारत के मूड में थे सो हम भी अड़ गए कि यहाँ पहले हम आए थे इसलिए हम ही पहले ऊपर जाएँगे ।
हमने उसकी बात के विपरीत बहुत शालीनता के साथ अपना दावा प्रस्तुत किया और उसके दल के अन्य सदस्यों को भी कन्विंस करने की कोशिश की । उसके समूह के लोगों को भी हमारी बात उचित लगी ।
लेकिन उनके समूह में पर्यटकों की संख्या अधिक थी और एक बार में मशालची उन्हें ले भी नहीं जा सकता था इसलिए यह तय किया गया कि उनका आधा समूह पहले ऊपर जाएगा फिर हम लोग ऊपर जाएँगे और अन्त में उसके समूह के शेष लोग । सो सबसे पहले महिलाएँ व बच्चे ऊपर गए और उसके बाद हम लोग ।
ऊपर पहुँचते हुए महेश ने उस मशालची को अपनी बातों में उलझा लिया और थोड़ा रौब झाड़कर व आवश्यकता से अधिक मेहनताना देकर इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह कुछ ठहरकर ही पुरुषों के ग्रूप को लेने नीचे जाएगा । दरअसल उसे उस गाइड को मज़ा चखाना था ।"
"हा हा हा " अशोक ने ठहाका लगाते हुए कहा " मैं ऐसे ही नहीं कहता हूँ कि यह महेश बहुत बदमाश है उसके दिमाग़ में जाने क्या क्या योजनायें चलती रहती हैं । वह उज्जैन में सिटी बस में भी बिना टिकट घूमता है , कंडक्टर को ऐसा राग देता है कि बिलकुल पैसे नहीं हैं उसकी जेब में । वह अपनी खटपटिया साइकिल से फ्रीगंज तक जाता है फिर उसे कंठाल जाना होता है तो कंडक्टर को पटा कर बस में ही अपनी साइकिल रख लेता है और वहाँ तक चला जाता है ।" हमारी बातचीत अब महेश पर केन्द्रित हो गई थी । मैंने भी अपनी डायरी बंद कर दी और गपशप में शामिल हो गया ।
*शरद कोकास*
कुछ इतिहास से
- व्यापक विस्थापन: सुल्तान ने केवल दरबारियों को ही नहीं, बल्कि दिल्ली के आम नागरिकों, विद्वानों, संतों और व्यापारियों तक को शहर खाली करने का आदेश दिया। [1, 2]
- कठिन यात्रा: लगभग 1,100 किलोमीटर की यह लंबी यात्रा पैदल तय करनी पड़ी। संसाधनों की कमी, भयंकर गर्मी और थकान के कारण रास्ते में ही बड़ी संख्या में लोग भूख, बीमारी और हादसों के कारण काल के गाल में समा गए। [1]
- अमानवीयता: इतिहासकारों के अनुसार, आदेश इतना सख्त था कि जो लोग दिल्ली छोड़ने में आनाकानी करते थे, उन्हें सजा दी जाती थी। वृद्धों और बीमारों को घसीट कर ले जाया जाता था, जिससे कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते थे।
- दिल्ली की बर्बादी: कभी गुलज़ार रहने वाली दिल्ली वीरान हो गई। समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी लिखते हैं कि दिल्ली के घरों में एक भी चिराग या धुआं तक दिखाई नहीं देता था। [1]
- असफलता का दंश: जब जनता जैसे-तैसे दौलताबाद पहुँची, तो वहाँ पानी की कमी और नई परिस्थितियों के कारण भारी असंतोष फैला। अंततः, कुछ वर्षों बाद सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ और जनता को वापस दिल्ली लौटने की अनुमति दे दी गई, लेकिन तब तक दिल्ली की मूल रौनक और बहुत से लोगों की जान जा चुकी थी। [1, 2, 3]






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