रविवार, 31 मई 2026

30-सात्विक भोजन का असर तामसिक भी होता है


नहीं ऐसा कैसे हो सकता है भाई , कहीं कुछ तो गड़बड़ है 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा - छात्र अपने एजुकेशन टूर में औरंगाबाद पहुंचते हैं और उस इमारत के सामने खड़े हैं जिसे धर्मशाला कहते हैं और उसका पियक्कड़  मैनेजर जिसका नाम बेवड़ा है, सॉरी देवड़ा है उस से वो बात कर रहे हैं । अब पुरानी इमारतों की बात आई है तो कहानी के साथ साथ हम  प्राचीन इमारतों की देखभाल और उनका रख रखाव पर भी बात कर लेते हैं ।

लेकिन इतनी सीरियस पोस्ट भी नहीं है भाई यहाँ बात उस जीर्ण शीर्ण धर्मशाला के साथ शुरू होती है जिसमे छात्रों को आज ठहराया गया है ।अब आगे देखिये खाना खाने का समय है और जैन साहब छात्रों को लेकर रेलवे की कैंटीन जा रहे है लेकिन दो छात्र मानते नहीं हैं और रात में सबकी नज़र बचाकर शहर घूमने निकल जाते हैं ।आखिर कुछ मस्ती तो होनी ही चाहिए

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*भाग 30*

सात्विक भोजन का तामसिक असर  

सुबह घाट पर प्रक्षालन हेतु प्रस्थान करते हुए रवीन्द्र कहने लगा "यार वो धर्मशाला की इमारत वाकई किसी ऐतिहासिक इमारत की तरह ही लग रही थी ।" अशोक को पता नहीं क्या सूझी वह ज़ोर से हँसने लगा । "अरे! इसमें हँसने की क्या बात है ?" रवींद्र का आश्चर्य स्वाभाविक था । "भाई हम लोग इतिहास के विद्यार्थी हैं सो हम लोगों को पढ़ने के लिए या ठहरने के लिए और रहने के लिए भी ऐतिहासिक इमारत ही मिलेगी न ?" 

अशोक ने हँसने पर फुल स्टॉप लगते हुए कहा । "अपने डिपार्टमेंट की बिल्डिंग को ही देख लो, पूरे ह्यूमेनिटी ब्लॉक से अलग थलग पीछे की ओर अकेली खड़ी है किसी प्राचीन ऐतिहासिक इमारत की तरह । दीवारों पर पेड़ उगने लगे हैं । क्लास में बैठो तभी समझ में आता है कि पर्यटन के लिए नहीं बल्कि पढ़ने के लिए आये हैं  ।" 

रवीन्द्र के चेहरे पर बस थोड़ी सी मुस्कान आई । "भाई , फिर भी अपन लोग पढ़ने ही तो आते हैं ..पर्यटन स्थल तो वह ह्यूमेनिटी  ब्लॉक है जहाँ आर्ट्स कामर्स वाले कई छात्र तफरीह करने आते हैं उनसे तो हम लाख गुना अच्छे हैं ।" 

फिर वह अपनी बातो की गाड़ी को हांक कर चर्चा की मुख्य सड़क पर ले आया .." पर्यटन स्थलों में औरंगाबाद की उस इमारत की तरह ऐसी कई प्राचीन इमारतें हैं जहाँ धर्मशालाएं और ढाबे चल रहे हैं । दरअसल हमारे देश में प्राचीन व ऐतिहासिक इमारतों का महत्व अब तक नहीं जाना गया है । जिन इमारतों को पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन कर लिया है उनका हाल तो ठीक है लेकिन अन्य कई इमारतें अभी भी उपेक्षित हैं ।“ 

“ ठीक कह रहे हो तुम । “ मैंने कहा “हमारे यहाँ अभी ऐसी कई इमारतों का ठीक से अध्ययन भी नहीं किया गया है । यहाँ तक कि बहुत सी इमारतों का तिथि निर्धारण भी सही सही नहीं हो पाया है । 

“हाँ ।“ रवीन्द्र ने कहा “ प्राचीन स्थापत्य की जानकारी देने वाली साहित्यिक कृतियाँ तो हमारे पास विपुल मात्रा में उपलब्ध हैं और धार्मिक, कलात्मक, दार्शनिक, राजनैतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी उनकी अंतर्वस्तु अत्यन्त मूल्यवान है लेकिन वास्तुकला एवं स्थापत्य की सूक्ष्मता की दृष्टि से उनमें बहुत सी कमियाँ हैं । इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि उनमें रचनाकाल और रचनास्थल का उल्लेख नहीं है । शायद इन्हें इस तरह भविष्य के ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा भी न गया हो । “

“हाँ ऐसा ही है ।“ मैंने कहा “उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक इतिहास लेखन को वैज्ञानिक रूप से मान्यता नहीं प्राप्त हुई थी इसलिए  साहित्य के आधार पर इन इमारतों और नगरों का अध्ययन कर पाना कठिन है । तुम्हें  पता ही होगा कि भारत के वास्तुशिल्प और उसके इतिहास पर पहला ग्रंथ ब्रिटिश स्कॉटिश वास्तुकार और इतिहासकार जे फ़र्ग्युसन ने लिखा था ‘हिस्ट्री ऑफ इन्डियन ऐन्ड ईस्टर्न आर्किटेक्चर‘ जो अठारह सौ सड़सठ में लन्दन से प्रकाशित हुआ था । लेकिन इसमें भी भारतीय वास्तुशिल्प का वर्गीकरण बौद्ध, जैन व मुस्लिम आधार पर हुआ है ।“ 

“ यही तो मुश्किल है ।“ रवीन्द्र ने कहा “धार्मिक आधार पर वर्गीकरण होने से वास्तुशिल्प के अध्ययन में बहुत सारे पक्ष छूट जाते हैं या कह सकते हैं कि जानबूझ कर छोड़ दिए जाते हैं और यह भी कि इसके अन्तर्गत सभी इमारतों को शामिल करना भी कठिन होता है । यही कारण है कि हमारे यहाँ की प्राचीन वास्तुकला को विदेशों में जो स्थान प्राप्त होना चाहिये था वह नहीं हो सका ।“

"लेकिन अब स्थितियाँ बदल रही हैं ।“ मैंने प्रतिवाद करते हुए कहा । “स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा मे सराहनीय कदम उठाये गए हैं । पुरातात्विक खोजों का सिलसिला लगातार जारी है । इतिहास व संस्कृति सम्बन्धी विभिन्न शोधपत्र लिखे जा रहे हैं । प्राचीन नगरों और इमारतों का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है । हालाँकि अभी भी बहुत से पुनरुत्थान वादी लोग धार्मिक आधार पर ऐतिहासिक इमारतों का पुनर्मूल्यांकन करने की अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं ।

यह प्रवृत्ति आगे चलकर ख़तरनाक हो सकती है हो सकता है आगे चलकर लोग धर्म के आधार पर इन ऐतिहासिक इमारतों पर अपना दावा पेश करने लगें । 

कल को मुगलों के वंशज कह दें कि ताजमहल हमारा है और इसके पर्यटन से प्राप्त राजस्व पर हमारा हक़ है ।" 

"बराब्बर" अशोक ने कहा " यही तो मैं कह रहा हूँ जैसे मंदिर वाले अपना दावा करते हैं वैसे ही मस्जिद और मकबरे वाले भी करेंगे ।" "लेकिन इससे क्या होगा क्या हम धर्म के आधार पर अपनी इस साझी धरोहर को बाँट लें ? यह कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है जल्द से जल्द इसके लिए कोई कड़ा कानून बनना चाहिए ।"

अजय अपने दाँतों पर बेरहमी से ब्रश चला रहा था और हम लोगों की बातें सुन रहा था, उसने पच से टुथपेस्ट का झाग थूका और कहा “ भाई कानून तो पहले से ही है लेकिन सिर्फ कानून से क्या होगा ? जनता को धर्म के उन्माद से बचाना जरुरी है तब ही हम इन ऐतिहासिक इमारतों को बचा पाएंगे वर्ना भीड़ का क्या भरोसा ? क्या पता कब इन्हें नष्ट कर दे । वैसे भी जब तक हम इन इमारतों को कानून बनाकर बचा पाएंगे तब तक तो हमारे यहाँ की जनता इन्हें नष्ट कर देगी

उस वक्त यह चित्र  कहीं चर्चा में ही नहीं था 

प्राचीन मंदिरों में जाकर देखो पुरातत्व विभाग ने साफ साफ लिखा है कि यह संरक्षित स्मारक है लेकिन लोग बाग पूजा करने, दही दूध से अभिषेक करने और गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते । 

मैंने कहा “ भाई पूजा प्रार्थना के अधिकार का यह अलग मुद्दा है, साथ ही साथ संवेदनशील भी है और फिलहाल हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे है । इसके लिए  बेहतर होगा आप पंडित राम मिलन जी से चर्चा करें, वे आपको बता देंगे कि उनके पूर्वजों द्वारा बनाए गए प्राचीन मंदिरों में पूजा पाठ करने का उनका हक़ उनसे छीन कर आप इस देश की ऐतिहासिक परम्परा के साथ क्या खिलवाड़ करने वाले हैं । “ 


“चलो चलो जल्दी करो  “रवीन्द्र ने फरमान जारी किया …” आज भाटी जी ने नाश्ते में जलेबी का इंतज़ाम किया है । जलेबी जैसे टेढ़े इस मुद्दे पर फिर कभी बात करेंगे । “ राममिलन भैया हम लोगों से काफी दूर थे लेकिन अपना नाम जैसे ही उनके कानों में पड़ा वे पल भर के लिए ठिठके फिर तम्बुओं की ओर बढ़ गए ।

आज मजदूर काम पर वापस आ गए थे इसलिए काम समय पर समाप्त हो गया । आज दंगवाड़ा जाने का प्लान भी नहीं था इसलिए भोजन भी हमने समय से कुछ पहले ही कर लिया और रात की बैठक भी हमने जल्दी ही शुरू कर दी । 

भाई लोगों को डायरी पाठ सुनने की इतनी ज़्यादा उत्सुकता थी कि व्यर्थ समय गंवाना बिलकुल गवारा न था । हालाँकि एक फालतू सा विचार उनके मन में आया था था कि आज एलोरा प्रवास का वर्णन और वापसी मे धार, मांडू की यात्रा सब के बारे में सुन लेंगे । जबकि मुझे पता था कि आज के आज सब कुछ बता पाना संभव नहीं है । हमारे डायरी पाठ के श्रोता सुनते हुए बैल की तरह सीधे सीधे रास्ते पर कहाँ चलते थे उन्हें तो सांड की तरह  बातों की गलियों में इधर उधर घुस जाने की आदत थी । 

तो हम कहाँ थे ?

डायरी खोलकर पन्ने पलटते हुए मैंने एक फालतू सा सवाल किया “तो हम कहाँ थे ? “ यात्रा विवरण सुनने की उत्सुक जनता में अजय नामक उत्साही बालक ने याद दिलाया “आप बेवड़ा …मतलब देवड़ा की धर्मशाला में प्रवेश कर चुके थे और कुएँ से पानी भरती हुई कांता बहन को निहार रहे थे ।“ 

“ऐसा कहाँ लिखा है यार मैंने डायरी में ?“ मैंने चौंक कर कहा । “ नहीं लिखा है इसलिए तो कह रहे हैं ।“ किशोर भैया ने चुटकी ली “हमें पता है आप क्या लिखते हैं और क्या नहीं लिखते । 

आप भी इस देश के गौरवशाली परम्परा के वाहक इतिहासकारों की तरह हैं, जो नहीं हुआ है उसे इतिहास कह कर लिख देंगे और जो वास्तव में घटित हुआ है वह नहीं लिखेंगे । “

“ठीक है ठीक है, इतिहासकारों की बदमाशी पर बात बाद में करेंगे फ़िलहाल आप आगे का वर्णन सुनिये …।” मैंने डायरी के पन्ने पलटते हुए कहा । 

“हाँ तो हाथ मुँह धोकर हम लोगों ने अपना सामान ऊपर हाल में रख दिया और भोजन की तलाश में निकलने ही वाले थे कि जैन साहब सामने दिखाई दिए । उन्होंने हमें  आगाह किया ... “ देखो भाई, भोजन हेतु उत्तम स्थान की तलाश करना, पिछली बार जब हम यहाँ आए थे तो बाज़ार का कुछ उल्टा- सीधा खाकर कुछ छात्रों को उल्टियाँ हो गईं थीं । “ 

जैन साहब की बात पर हमें  पूरा विश्वास था लेकिन इससे पहले कि वे उस प्रवास की इस दुखद घटना का विस्तार से बयान करते सारे छात्र चुपचाप खिसक लिए और शेष रह गए मैं, महेश और राममिलन । 

जैन साहब ने पिछली यात्रा के इस दुखद वमन प्रसंग का उपसंहार करते हुए छात्रों की क्षीण उपस्थिति को लक्ष्य करते हुए कहा “ कोई बात नहीं , जिन लोगों को जाना था चले गए आप लोग मेरे साथ चलिए ।“ 

और फिर रेल्वे के शुद्ध सात्विक भोजन की प्रशंसा करते हुए वे हमें  पैदल पैदल औरंगाबाद रेल्वे स्टेशन के भोजनालय में ले गए । जब भोजन हमारे सामने आया तो हमने देखा, कुछ सूखी सूखी सी रोटियाँ, पानी जैसी पतली दाल, और फ़ीकी फ़ीकी सी लौकी की सब्ज़ी । 

मैंने महेश से कहा “चुपचाप खा ले, सात्विक भोजन इसे ही कहते हैं । “ महेश भीलवाड़ा राजस्थान का रहने वाला है और तेज़ मिर्च खाने का आदी है, उसने कहा तो कुछ नहीं लेकिन उसकी आँखों से गुस्सा साफ साफ झलक रहा था । बाहर निकल कर मैंने उससे कहा “चलो शुद्धता से तो साक्षात्कार हो गया स्वाद से कहीं और कर लेते हैं ।“

अब दो आवारा रात मे निकलते हैं औरंगाबाद की सड़कों पर 

धर्मशाला पहुँचकर जैन सर आराम से सो गए । बाकी छात्र भी लौट आए थे और अपना अपना बिस्तर लगा कर सो रहे थे । मेरी और महेश की आँखों में नींद नहीं थी । पूरे पैसे देकर भी पेट भर भोजन न कर पाने का मलाल था सो नींद कैसे आती । महेश ने धीरे से इशारा किया । हम लोग दबे पाँव उठे और कुर्ते -पायजामे में ही बाहर आ गए । कपडे-वपड़े बदलने की कोई ज़रूरत नहीं थी वैसे भी इस नए शहर में हमें कौन पहचान सकता था । फिर हम लोगों ने विदेशी टूरिस्टों को देखा है  वे तो हाफ़ पैंट पहने हुए ही दुनिया भर की यात्रा कर लेते हैं और उनके साथ की गौरांग महिलाएँ भी इतने कम कपड़े पहनती हैं कि भारतीय पर्यटकों के लिए वे भी दर्शनीय वस्तु बन जाती हैं । 

बाहर आकर देखा तो सारा शहर जाग रहा था ।  टूरिस्ट सेन्टर होने के कारण यहाँ  देर रात तक चहल पहल रहती है । वैसे भी अधिक रात नहीं हुई थी यही कोई रात का दस बजा होगा । पास ही बस स्टॉप था । हम लोग एक बस में बैठे और यात्रियों से किसी चहल-पहल वाली जगह का पता पूछकर शाहगन्ज की टिकट ले ली । रास्ते भर हम लोग मुसाफिरों से गाइड का काम लेते रहे । औरंगपुरा, वहाँ से रॉक्सी टाकीज़ और फिर शाहगंज यानि ‘ हार्ट ऑफ सिटी ‘ । शाहगंज में हम लोग बस से उतरे और पैदल पैदल भटकने लगे । एक घंटा  घूमकर हम लोगों ने सारा बाज़ार देख लिया । 

यह एक पर्यटन स्थल का बाज़ार था । सभी हॉटल्स, रेस्तराँ और दुकाने खुली हुई थीं । सड़क पर गाड़ियाँ बहुत कम थीं और ज़्यादातर लोग पैदल ही टहल रहे थे ।चारों ओर बड़े बड़े होर्डिन्ग्स और नियान लाइट में चमकते हुए होटलों के नाम रात की जवानी की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे । 

रोशनी में नहाया हुआ शहर का यह हिस्सा बेहद खूबसूरत लग रहा था । सैलानियों के आकर्षण के लिए  यहाँ तमाम इन्तज़ाम थे । खाने की भी कई दुकानें खुली हुई थीं । कुछ ठेलों पर कोयले की अंगीठी पर कबाब सिंक रहे थे और उनसे उठता हुआ धुआं और भुने मांस की गंध वातावरण में अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी । खाने की दुकानों के बाहर एल्युमिनियम के बड़े बड़े बर्तनों में बिरयानी रखी हुई थी और मसालों की गन्ध से वातावरण खुशगवार हो रहा था । मुझे चेखव की एक कहानी याद आने लगी जो मैंने बचपन में पढ़ी थी ।

अचानक महेश ने पूछा “ यार यह औरंगज़ेब का बसाया हुआ शहर है, यहाँ कहीं मुजरा भी तो होता होगा ? “ मुझे ज़ोरों की हँसी आई, सात्विक भोजन का ऐसा तामसिक असर तो पहली बार देखा है । “ भाई " मैंने कहा " औरंगज़ेब बहुत सात्विक किस्म का व्यक्ति था । खाने पीने में, वेशभूषा में वह बहुत संयम बरतता था तुम उसके राज्य में ऐसी किसी चीज़ की कल्पना भी नहीं कर सकते । लेकिन तुम सही बताओ तुम्हें सही में मुजरा देखना है ? “ मैंने महेश से पूछा । 

महेश हँस दिया “ नहीं यार, ऐसे ही पूछ रहा हूँ, जेब में खाने के लिए  पैसे नहीं है मुजरा कहाँ से देखेंगे ।“ खाने का पैसा तो हम लोग रेल्वे की कैन्टीन में खर्च कर चुके थे और आज की तारीख में भोजन के लिए अब कोई बजट नहीं था, सो हम लोगों ने कबाब की खुशबुओं के बीच किसी योगी के समान टहलते हुए दिल बहलाने के लिए एक पैकेट फल्ली दाना लिया और टूँगते हुए धर्मशाला वापस आ गए । सारे के सारे लोग घोड़े बेचकर सो रहे थे, हमारी इस आवारागर्दी की किसीको कानों कान खबर नहीं हुई और हम लोग अपने बिस्तर में घुस कर सो गए ।“

शरद कोकास 

शहर की रात्रिकालीन रौनक में घूमने के लिए ये स्थान प्रमुख हैं:
  • बीबी का मकबरा (Bibi Ka Maqbara): 'दक्कन का ताज' कहलाने वाले इस स्मारक को रात में दूधिया रोशनी (Floodlights) से जगमगाया जाता है। इस समय यहाँ का शांत और मनमोहक नज़ारा देखने लायक होता है। [1, 2]
  • गुलमंडी और सिटी चौक (Gulmandi & City Chowk): स्थानीय खरीदारी और स्ट्रीट फूड के लिए ये सबसे बेहतरीन जगहें हैं। रात के समय इन बाज़ारों की चहल-पहल और स्थानीय संस्कृति बहुत आकर्षक लगती है।
  • सफ़ारी पब और कैफ़े कल्चर (Cafes & Nightlife): शहर के पॉश इलाकों जैसे उस्मानपुरा और अदालत रोड पर रात के समय युवा रौनक देखने को मिलती है। यहाँ के आधुनिक कैफ़े और रेस्टोरेंट देर रात तक खुले रहते हैं। [1]
  • शहर की लाइट और नज़ारे: रात में शहर के मुख्य चौराहों और ऐतिहासिक दरवाज़ों (जैसे भडकल गेट) की सजावट और रोशनी शहर की खूबसूरती को चार चांद लगा देती है। [1]
रात में घूमने के दौरान आप ऑटोरिक्शा या कैब की मदद ले सकते हैं। स्थानीय जायके का स्वाद चखने के लिए मुख्य बाज़ारों और कैफे का रुख ज़रूर करें।


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