शनिवार, 30 मई 2026

26.ताज़ा जन्मे बच्चे की तरह होते हैं ज़मीन से निकले अवशेष


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा-अब यात्रा आगे बढ़ती है । छात्र इंदौर पहुँच चुके हैं ।आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं । शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । 

इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं। पिछले भाग से शुरू हो चुका है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।*

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भाग 26

पूड़ी भंडार का किस्सा 

    प्राचीन भारतीय इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व के छात्रों के इस शैक्षणिक टूर में हमारी क्लास के कुछ दक्षिण भारतीय मित्र भी हमारे साथ थे जो हॉस्टल में रहते थे  । हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से खाने के पैकेट निकाल लिए हैं  । यह सभी छात्र मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आए  थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी की लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया । 

    वैसे भी इन्दौर शहर में आएँ  और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । 

    पूड़ी भण्डार के काउंटर पर एक सुन्दर सी लड़की थी । उससे हमने पूछा " पूड़ियाँ क्या भाव हैं ? " उसने कहा छह रुपये किलो साथ में सब्ज़ी फ्री । हमने किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हें  आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।

मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” इसमें हँसने की क्या बात है ? आमाशय ही तो लिखा है ।“ अजय हँसते हँसते बोला .. “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे, और उसे इम्प्रेस करने के लिए बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे हमें सब पता चल गया था । 

“ ठीक है, ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “दुकानवाली के चक्कर की क्या बात है अब भूख ही इतनी तेज़ थी तो क्या करते ..लो आगे भी तो सुनो ।" और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी । इंदौर पहुँचने पर हमें ज्ञात हुआ कि इस बार टूर में मध्यप्रदेश के भूतपूर्व पुरातत्व निदेशक डॉ. एच.वी. त्रिवेदी भी हम लोगों के साथ यात्रा पर चलेंगे  सो उन्हें लेने के लिए हम लोग उनके घर पहुंचे  । 

बहुत खूबसूरत घर था डॉ.त्रिवेदी का । वैसे भी एक पुरातत्ववेत्ता का घर देखने का अपना अलग आनंद होता है । ड्राइंग रूम में कुछ बेहतरीन पेंटिंग्स और प्राचीन प्रतिमाओं के इमिटेशन शिल्प सजावट को एक नया आयाम दे रहे थे । हम लोग जब पहुँचे सर भोजन कर रहे थे । उन्हें साथ लेकर रात लगभग दस बजे हमारी बस इंदौर से रवाना हुई । 

    इंदौर के बाद हमारा अगला गंतव्य जलगाँव था । सबके पेट भरे हुए थे  । उदर की मांग पूर्ण हो चुकी थी और  मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया था । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । इस तरह थोड़ी बहुत झपकी के साथ सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । 

    उस दिन हमें  समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग आगे की सीटों की मांग क्यों करते हैं ।

सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसी में हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । 

    वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था और वापसी में औरंगाबाद लौटना था जहाँ पहले से हमारा निवास तय था सो लॉज में कमरा लेने का कोई औचित्य भी  नहीं था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले कि  अन्य लोग किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती करने की ठान चुके थे । प्लेटफ़ॉर्म भी हमारे मध्यप्रदेश के बस स्थानकों के प्लेटफ़ॉर्म की तुलना में काफी साफ सुथरा नज़र आ रहा था हालाँकि इतना ध्यान देने लायक धैर्य और शक्ति हम में नहीं थी । 

सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ 

    कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी, बस हम दोनों वहाँ हमारे बिस्तर से चिपके हुए ख़ाली रैपरों और बीड़ी सिगरेट के ख़ाली खोकों के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । 

    नींद से बोझिल पलकें, सूखे होंठ, बिखरे बाल लिए मैले कपड़ों में हम लोग, सुबह सुबह अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच भिखमंगों  की तरह लग रहे थे  । हमने तुरंत उन लोगों का संकेत समझा और फटाफट उठकर अपना बिस्तर लपेटकर एक बेंच पर रख दिया । 

पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमें  क्यों नहीं जगाया तो हमारे मित्र मुरलीधर रेड्डी ने ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है ।“ 


    बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर महाराष्ट्र का विशेष नाश्ता आलू पोहा चने की गर्मागर्म मिसल के साथ भर पेट  खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।“ 


“ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जाएँगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके उनींदे चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  

अगली सुबह 

सुबह आर्य साहब ने पूछा  “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर, कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजन्ता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । हम लोग तो केवल पुरातत्व के छात्र हैं लेकिन यह कवि भी है ना, जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । जहाँ न पहुँचे रवि ... “ 

    “ बस बस ..बहुत पुराना हो गया । “ मैंने उसे चुप कराते हुए कहा । फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रहे थे  और हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो किसी ने उन्हें बाँहों में थाम लिया हो । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है । 

शाम काफी देर तक काम करते रहे हम लोग । अवशेषों को साफ़ कर उन्हें सीलबंद कर संरक्षित करने का कार्य उस दिन हम ठीक से नहीं सीख पाये थे । डॉ.वाकणकर ने आज हम सब लोगों को अलग अलग मनके,सिक्के, पॉटरी आदि दिए और उन्हें साफ़ करना सिखाया । 

    अवशेष को साफ़ करना बहुत महत्वपूर्ण काम है । इसके लिए छोटे बड़े अनेक प्रकार के ब्रशों, ब्लोअर और सुइयों का उपयोग किया जाता है । हम आम वस्तुओं की तरह साबुन या पानी से उनकी सफाई नहीं कर सकते इसलिए कि इनकी रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनके स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है । पानी से धोने में भी इस बात का ख़तरा रहता है कि इनमे यदि कोई हिस्सा पानी में घुलनशील हो तो वह नष्ट हो जाता है ।

सर ने बताया कि "सफाई करते समय इस बात का ध्यान रखना सबसे अधिक ज़रूरी होता है कि किसी प्रकार के आघात से उनके किसी हिस्से की टूट-फूट न हो । सफाई करने वाले ब्रश का दबाव कितना हो उसे किस एंगल से घुमाया जाए इसका भी ध्यान रखना होता है । हालाँकि इस तरह से सफ़ाई में बहुत समय लगता है कभी कभी तो एक मुहर को साफ़ करने में दो-तीन दिन तक लग जाते हैं ।" जब हम पॉटरीज़ को साफ़ कर रहे थे तो हमने देखा कि उनमे कुछ ऐसी भी हैं जो साबुत नहीं हैं । 

मेरे मन में एक सवाल उठ रहा था जो मैंने सर के सामने रखा "सर, यदि कोई मिटटी का बर्तन अथवा उसका कोई हिस्सा जो पहले से ही टूटा हुआ है सफाई करते हुए अगर थोड़ा और टूट भी गया तो क्या हो जायेगा ?" सर ने कहा " भाई पहले की टूट-फूट और अभी की टूट-फूट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है । किसी भी पॉटरी में  जो टूट-फूट हुई है वह तो हज़ारों साल पहले की है और उससे यह पता लगाना होता है कि वह कब टूटा था किस वज़ह से टूटा था आदि ।  

    लेकिन सफाई करते हुए यदि वह टूटता है तो उससे भ्रम उत्पन्न होता है और उसका कालक्रम निर्धारित करने में कठिनाई होती है ।इसलिए उसके साथ विशेष नोट लगाकर वह टूटा हुआ हिस्सा भी रखना होता है ।"

सर ने हमें सफाई के उपरांत की प्रक्रिया भी समझाई । सर ने बताया कि "सफ़ाई के बाद प्रत्येक अवशेष को एक सफ़ेद कपडे की थैली में सुरक्षित रख दिया जाता है और उस पर एक टैग लगा दिया जाता है जिसमें यह जानकारी होती है कि वह अवशेष किस साईट से, किस तारीख को, किस ट्रेंच से, उत्खनन के किस स्तर पर प्राप्त हुआ है तथा यह उत्खनन किसके मार्गदर्शन में हुआ है आदि आदि । इसके पश्चात उसे राजकीय संरक्षण में भेज दिया जाता है  । यह सब इसलिए ज़रूरी होता है कि जब उनके बारे में लिखा जाए तो उससे सम्बंधित सारे सन्दर्भ एक साथ मिल सकें ।"


*शरद कोकास*

 

Dr. H.V. Trivedi (Dr. Harihar V. Trivedi) was an eminent Indian epigraphist, numismatist, and historian who served as the Deputy Director of Archaeology, Archives, and Museums for the Government of Madhya Pradesh. He is widely celebrated as one of the country's foremost scholars of ancient Indian scripts and history. [1, 2, 3, 4, 5]
Key Contributions and Works
  • Epigraphy: He authored the definitive Epigraphs of Madhya Pradesh and edited volumes of the Corpus Inscriptionum Indicarum (Volume VII), which focused on the inscriptions of the Paramaras, Chandellas, and Kachchhapaghatas. [1, 2]
  • Numismatics: He penned the authoritative Catalogue of the Coins of Naga Kings of Padmavati. [1]
  • Excavations: He directed significant state excavations, including the excavation of an early 8th-century Shiva temple at Indragarh in the Mandasor district and assisted in digs at the Chalcolithic site of Manoti. [1, 2]

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