शुक्रवार, 29 मई 2026

24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री

इसे पढ़कर निश्चित ही आप दहल जाएंगे ,अगर कमज़ोर दिल वाले हों तो ना पढ़ें 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा- रोम के उन गुलामों के जीवन का दुःख हमारे हर दुःख से बड़ा है शायद इसीलिए उनके दुःख के आगे हमारे दुःख छोटे लगते हैं । हाँ हम अपने दुखों को अभिव्यक्त कर सकते हैं लेकिन उन्हें तो अभिव्यक्ति का अधिकार भी नहीं था । इसी संसार में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के साथ ऐसा बर्ताव कर सकता है ऐसा हम सोच भी नहीं सकते लेकिन इतिहास में इससे भी बुरा घटित हो चुका है यह बात अविश्वसनीय नहीं है । ..चलिए रोम के गुलामों की कथा का यह अंतिम भाग भी पढ़ लीजिये वर्णन थोड़ा वीभत्स है लेकिन इसे सहन तो करना पड़ेगा शायद उस दौर के गुलामों की कथा पढ़कर हम आज के दमित शोषित वर्ग का दुःख जान सकें । अगले भाग से प्रारंभ करेंगे अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ।

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*भाग- चोवीस* 

*24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री*  

दोपहर का भोजन संपन्न करने के उपरान्त हम लोग सीधे ट्रेंच पर आ गए । मजदूर अभी खाना खाकर नहीं आये थे और आर्य सर भी नहीं लौटे थे । हम लोग ट्रेंच के पास पसरकर बैठ गए । 

अशोक ने बात शुरू की "प्राचीन रोम के अभिजात्य वर्ग के मनोरंजन हेतु खेले जाने वाले ग्लेडिएटरों के इस ख़ूनी खेल का वर्णन रोमांचक तो है लेकिन इसका किस्सा सुनते हुए बहुत तकलीफ़ होती है ।"  “यार, तू जब इस खेल का  वर्णन कर रहा था तो मुझे लगा जैसे फ्रीगंज चौराहे पर दो दादाओं की लड़ाई का वर्णन सुना रहा हो  ।“ अजय ने कहा  । 

“नहीं ऐसा नहीं है ।“ मैंने कहा “ दादाओं की लड़ाई आपसी दुश्मनी, ज़मीन, धन या स्त्री को लेकर होती है, या अपने वर्चस्व को लेकर और आजकल तो धर्म को लेकर भी होती है लेकिन इन ग्लेडियेटर्स की तो आपस में कोई दुश्मनी नहीं है, ये विवश गुलाम केवल धनाढ्य लोगों के मनोरंजन के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं । गुंडों में और गुलामों में  बहुत फर्क होता है । हालाँकि आजकल गुण्डे भी आजकल अपने राजनैतिक आकाओं के गुलाम ही होते हैं ।" 

"हाँ चल आगे का हाल सुना ।" अशोक ने कहा " तो हम कहाँ थे ? मैंने अपने अंदाज़ में पूछा ।अजय ने कहा "पहले एक ग्लेडिएटर ने दूसरे को छुरा घोंप दिया फिर प्रत्युत्तर में दूसरे ने उस पर अपने भाले से वार किया ।

" "ओके ।" मैंने लड़ाई का पिछले वर्णन की स्मृतियों को संग्रहित करते हुए कहा  “ देखो, एरिना में लड़ते हुए उन दोनों ग्लेडिएटर में से जिसे अधिक चोट लगी है वह ज़मीन पर गिर गया है ..खून से दोनों के जिस्म तरबतर हैं .. उनकी लड़ाई देखने वाले रोम के ये रईस लोग उन्माद से पागल हो रहे हैं ...मार डालो काट डालो की आवाज़ें गूंज रही हैं .. 

इस शोर - शराबे में भी जाने कहाँ से खून पीकर जीने वाली एक चिड़िया उड़ती हुई आ गई है  और रेत पर गिरी खून की बूँदें चुग रही है । 

अब कुछ देर के लिए दोनों ठहर गए हैं,  शायद अपनी नियति के बारे में सोच रहे हैं । उन्हें पता है कि उन दोनों में से एक को अभी इसी वक़्त मरना है या क्या पता दोनों को ही  । 

"लेकिन दोनों कैसे मरेंगे मरना तो एक को ही होगा ?" अजय ने कहा । अशोक ने जवाब दिया "भाई एक को तो दूसरा अभी मार देगा लेकिन दूसरा इतना ज़ख़्मी है कि वह कभी भी मर सकता है ।" "बिलकुल ठीक ।" मैंने कहा "अब देखो ..उन्हें रुका हुआ देख कर चाबुक लिए एक उस्ताद वहाँ आ गया है और देखो उसने दोनों  की पीठ पर कोड़े बरसाना शुरू कर दिया  ..” लड़ों हरामजादों  रुक क्यों गए  ?” लड़ो,लड़ो,लड़ो,मार डालो ..काट डालो  ..”। लेकिन अगला क्या करे , उसमें तो उठने की ताकत ही नहीं है । उस्ताद अब उस खड़े हुए ग्लेडिएटर को ललकार रहा है .. मार दे इसे ..मार डाल, ख़त्म कर दे । 

वह ग्लेडिएटर ज़मीन पर पड़े ग्लेडिएटर के जिस्म पर खड़ा है, एक पांव उसके दाईं  ओर और दूसरा उसके बाईं ओर । उसकी निगाहें दर्शकों से होते हुए सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए रोम के सम्राट पर जाकर ठहरती हैं । सम्राट एक नज़र  दर्शकों पर डालता है .. सब ओर से आवाजें आ रही हैं .. मारो, मारो, मार डालो .. 

अचानक सम्राट मुस्कुराता है और उसकी ओर से एक फरमान गूंजता है ..वह एक हाथ हवा में उठता है और अंगूठा नीचे की ओर झुका देता है .. यह संकेत है ..हत्या कर दो, मार डालो उसे । खड़ा हुआ ग्लेडियेटर दोनों  हाथों से अपना भाला हवा में ऊँचा उठाता है और ज़मीन पर पड़े हुए दूसरे ग्लेडियेटर के सीने में पूरी ताकत से भोंक देता है ।"

"भयानक उन्माद से भरी चीखें पूरे कोलोसियम में व्याप्त हैं । जनता हत्या के इस दृश्य को देखकर पागल हो गई है, उनका उन्माद चरम पर पहुँच चुका है जैसे वह उस हत्यारे ग्लेडिएटर में अपना रूप देख रही है । 

राजा का एक सिपाही उस मरे हुए गुलाम के पास पहुँचता है, वह उसके सर को हिला कर देखता है, वह गुलाम मर चुका है इस बात की तसल्ली करने के लिए वह अपनी कमर में बन्धा एक भारी हथौड़ा निकालता है और उसे उस ग्लेडियेटर की लाश की कनपटी पर जोर से मारता है  ..उफ़..इस प्रहार से मरे हुए उस गुलाम का सर फट गया है और पीला पीला भेजा निकलकर बाहर आ गया है, प्रहार इतना तेज़ था कि भेजा भी चूर चूर हो गया है और खून में लिथड़े हुए उसके कुछ टुकड़े हथौड़े पर चिपक गए हैं  । 

अब वह सिपाही बाकी अंगों को चूर चूर करने के लिए उन पर भी हथौड़ा चला रहा है,  अब वह सिपाही हथौड़ा उठाकर रोमनों का अभिवादन कर रहा है जैसे उसने बहुत बड़ा काम किया हो । इतने में अखाड़े का एक दूसरा उस्ताद एक गधा लेकर वहाँ आ गया है उसने लाश को एक ज़ंजीर द्वारा उस गधे से बांध  दिया है , चाबुक पड़ते ही वह गधा दौड़ पड़ा है और मैदान के गोल गोल चक्कर लगा रहा है ...पूरे मैदान में उस लाश से भेजे और शरीर के टुकड़े टूट टूट कर गिर रहे हैं । 

रोमन जनता आनन्द विभोर होकर हँस रही है, खिलखिला रही है, उन्माद में तालियाँ बजा रही है, सीटियाँ बजा रही है, नाच रही है । इधर कोलोसियम के कर्मचारियों द्वारा उस खूनी रेत को पलट दिया गया है और उस शेड में अब अगला जोड़ा फिर मौत के इस खूनी खेल के लिए  तैयार है । “

“बस कर ..बस कर यार …“ रवीन्द्र चीखा “बन्द कर तेरी यह रनिंग कमेंट्री ...बहुत हो गया, अब यह बर्दाश्त से बाहर है ।“ ग्लेडियेटर्स की कहानी सुनकर सभी का मन बहुत भारी हो गया था । 

मैं ख़ुद अपने आप को बहुत अपसेट महसूस कर रहा था । जाने कितने प्रश्न मेरे मन में जन्म ले रहे थे .. क्या इस तरह के ख़ूनी खेल अब भी हमारे यहाँ नहीं खेले जाते ? क्या युद्ध और दंगों में इस तरह की वीभत्स हत्याएँ नहीं होतीं ? क्या हमारे देश की जनता को धर्मयुद्धों, क्रुसेड या जिहाद के नाम पर सदियों पहले इस तरह संस्कारित नहीं कर दिया गया है कि वे दुश्मनों का बहता खून देखकर प्रसन्न होते हैं और भूल जाते हैं कि मरने वाला कोई भी हो है तो आखिर मनुष्य ही ? 

रोमन सम्राटों के इस क्रूर खेल के ज़माने से लेकर आज तक भीड़ का यह पागलपन बढ़ता ही तो गया है ? पहले यह हत्याएँ सिर्फ एक खेल के मैदान में होती थीं और अब युद्ध के मैदानों से लेकर गली, मोहल्लों और चौराहों पर होती हैं । आज भी धर्म के नाम पर, विरोध के नाम पर या अपने विचारों से सहमत न होने के कारण किसी को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है । 

चलो अब टॉपिक चेंज किया जाए 

दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर हम लोगों की भूमिका केवल एक छात्र पुरातत्ववेत्ता की तरह ही है  सो हमें इन चिंताओं के अलावा भी ट्रेंच पर अपना रोज़ का खुदाई का काम तो पूरा करना ही था । ऐसी ही मनःस्थिति के साथ हम लोगों ने शेष दिवस का अपना काम पूरा किया कुछ अवशेष और ढूँढ निकाले । खैर दिन का काम निपटाया गया और शाम को फिर सिटी घूमने का प्लान बन गया । 

लौट कर आने के बाद महसूस हुआ कि ठंड बहुत बढ़ गई  है और भोजन के बाद सिवाय बिस्तर में घुसने के और कोई चारा नहीं है । “ यार यह ठंड के दिन भी कितने मज़ेदार होते हैं । 

रवीन्द्र ने अपनी मंकी कैप के भीतर से झाँकते हुए कहा । “ घंट मजेदार होते हैं । “ अजय ने खीझकर कहा ..” घर में रहते तो दिन भर रजाई में घुसे रहते, बीबी के हाथ का गर्मागर्म खाना खाते ..और ... “ 

“चुप रह यार, तेरी बीबी है तो इतरा रहा है, हम कुँवारों पर कुछ तो रहम कर ।“ रवीन्द्र ने कहा  । “ यहाँ तो ठंड में हमारी कुल्फी जमी जा रही है, ऊपर से इस तम्बू में भी छेद भी  हैं, जाने कहाँ से रात में यह आवारा हवा घुस आती है । ऊपर से सुबह जल्दी जागो , वाकणकर सर के आदेश का पालन करते हुए चम्बल में नहाने जाओ ।  अब संस्कार ही कुछ ऐसे है अपन तो अशोक के समान नहाने की टैबलेट खाने से रहे, ठण्ड हो या ओले गिरें नहाना तो पड़ेगा ही  । “

  "फिर भी हम लोगों की ज़िन्दगी उन गुलामों से बेहतर है उन्हें तो जीने की सुविधा ही इसलिए प्रदान की जाती थी कि एक दिन उन्हें एक दिन मार दिया जाये । ग़नीमत है अब यह दास प्रथा समाप्त हो चुकी है ।" रवीन्द्र के दिमाग़ में अब तक वह दृश्य किसी चलचित्र की भांति चल रहा था । 

"हाँ " मैंने कहा । "हम लोग भी अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त हो चुके हैं ।""लेकिन रोमन सम्राटों की उस गुलामी और इस गुलामी में अंतर है भाई ।" 

अशोक ने मेरा प्रतिवाद किया । "कहाँ अंतर है ?" मैंने कहा "क्या अंग्रेज़ों की गुलामी के समय देश की जनता को नारकीय जीवन भोगना नहीं पड़ा ? क्या उस समय भी वे भारतीय लोगों की ऐसे ही क्रूर तरीके से हत्या नहीं करते थे ?" "सही कह रहे हो ।" 

रवीन्द्र ने कहा " लेकिन उनके जाने के बाद भी जनता की हालत में भी बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ । लोग तो अब भी भूख और ग़रीबी की वज़ह से मरते हैं ।" 

मैंने कहा " बस इस बात का संतोष है कि अब हम आज़ाद हैं और एक जनतंत्र में रह रहे हैं, दिल बहलाने के लिए यह ख़याल अच्छा है । ठीक है बाक़ी चर्चा कल, अब सब लोग मुँह ढांककर सो जाओ , ठण्ड बहुत तेज़ है वर्ना कल हम सब गुलामों की ठण्ड की वज़ह से मौत घोषित कर दी जाएगी ।"


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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