तस्करी कैसे होती थी , ज़मीन से निकली वस्तु घर क्यों नहीं ले जा सकते, पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर है पढिए इस एपिसोड मे
🐴 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 🐴
शरद कोकास
पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि सारे छात्र शाम हो जाने के पास अलाव के पास बैठे हैं और आज की बातचीत में शामिल है प्राचीन समय में ग्रीस में होने वाले ओलम्पिक की बातें और पांच खुर वाले घोड़े की बातें .. लीजिये पढ़िए अब उससे आगे..*
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🦄 *भाग - इक्कीस* 🐴
21 - *प्राचीन मूर्तियों पर तस्करों की नज़र*
अलाव की आग बुझ चुकी थी और अंगारों के स्थान पर अब राख़ नज़र आ रही थी । मुझे यकीन था कि राख़ के नीचे कोई चिंगारी अवश्य दबी हुई होगी जिसे उम्मीद होगी कि किसी दिन आग की तलाश में भटकता हुआ कोई मुसाफ़िर शायद फिर यहाँ आएगा ।
मुझे दुष्यंत जी की ग़ज़ल का वह शेर याद आया
"थोड़ी आँच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो ,
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफ़िर आयेंगे ।"
हम लोग भी मुसाफ़िर की तरह ही तो यहाँ आये हैं ..कुछ दिन बाद यहाँ से चले जायेंगे । तब तक न आग बची होगी न चिंगारी । क्या पता इस साईट में भी आगे कुछ न निकले और फिर पुरातत्व विभाग इसे अन्य साइट्स की तरह विस्मृत कर किसी नई साईट पर काम की तलाश में जुट जाए ।
इस अनदेखे भविष्य के बारे में सोचते हुए मुझे जाने क्या क्या ख़याल आने लगे । मैंने सोचा हो सकता है फिर बरसों बाद यहाँ कोई बस्ती बसे और फिर एक दिन चम्बल की बाढ़ के बाद वह बस्ती भी उजड़ जाए । फिर बरसों बाद कोई पुरातत्ववेत्ता किसी प्राचीन सभ्यता की तलाश में यहाँ तक पहुँचे और उसे उपरी सतह पर राख का यह ढेर मिले ।
क्या उसे इस बात का ख़याल भी आएगा कि विक्रम विश्वविद्यालय के कुछ छात्र पुरातत्ववेत्ता यहाँ आये थे और सर्दियों की किसी रात में यहाँ बैठकर उन्होंने अपने पुरखों के साथ साथ ग्रीक के ओलिम्पिस पर्वत पर रहने वाले देवताओं को याद किया था ?
रात गहराने लगी थी । सारे मित्र नींद में दिनभर की स्मृतियों के साथ किसी दौड़ में शामिल हो चुके थे । मुझे नींद नहीं आ रही थी .. मैं चुपचाप लेटा हुआ और अपने घर के नर्म बिछौने के बारे में सोच रहा था । तम्बू में बीत रही इस ज़िंदगी के बारे में सोचते हुए मुझे अपने आदिम पुरखों के बारे में कुछ ख़याल आने लगे ।
मैं सोचने लगा .. उनका जीवन कितनी कठिनाइयों से भरा हुआ था । उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी ज्ञान अर्जित किया वे उसे किस तरह अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपते गए । आज एक बच्चा जन्म लेने के बाद अपनी उम्र के प्रारंभिक वर्षों में ही इतना कुछ सीख जाता है जिसे सीखने में हमारे पूर्वजों को हजारों साल लग गए । मुझे यह सोचकर अच्छा लगा कि हमारे आदिम पूर्वजों ने अपने स्वयं के प्रयासों से जो कुछ सीखा उसे अगली पीढ़ी को सौंपने की यह परंपरा अभी भी जारी है।
मुझे अपनी सुविधाओं के बारे में सोचते हुए यह ख़याल भी आया कि यदि मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलता तो शायद इतना कुछ ज्ञान अर्जित नहीं कर पाता । आज भी मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ कि एक बच्चा अपने घर में रहकर जितना कुछ नहीं सीख पाता जितना वह घर से बाहर निकलकर अकेले ही कठिनाइयों से जूझते हुए सीख जाता है ।
हम लोग अपने अपने घरों में माता-पिता के सान्निध्य में अनेक बातें सीख नहीं पाते हैं । यह शिविर हमारे लिए केवल पाठ्यक्रम से सम्बंधित ही नहीं है बल्कि यहाँ रहकर हम विपरीत परिस्थितियों में कैसे जिया जाए इस बात का भी प्रशिक्षण ले रहे हैं ।
शिविर के अनुशासन का पालन करना हमारे लिए अनिवार्य ही नहीं है बल्कि घर में जिस तरह की सुविधाओं के साथ हम जीते हैं बगैर उनके भी जीना सीखना हमारे इस शिविर के प्रशिक्षण का एक भाग है । इसीलिए डॉ वाकणकर हमें रोज़ हिदायतें दिया करते हैं और कभी -कभार हमारे तम्बू में निरीक्षण के लिए आया करते हैं ।
अगली सुबह की बात है
सुबह हम नींद से भारी अपनी पलकों को खोलने के प्रयास में ही थे कि अचानक तम्बू के बाहर सर की आहट सुनाई दी " आता हूँ थोड़ी देर में, सब व्यवस्थित कर लो ।" उन्होंने बाहर से ही कहा ।
हम फुर्ती से उठे और बिस्तर वगैरह तह करके करीने से लगा दिए । सारी चीजें कपड़े, बैग आदि भी व्यवस्थित रख कर उनका इंतज़ार करने लगे । कुछ ही देर वे वापस लौटे और तम्बू में प्रवेश कर उन्होंने चारों ओर अपनी नज़र घुमाई ।
तम्बू में सुव्यवस्था देख कर वे खुश हो गए "बहुत बढ़िया ..सब सामान तो अच्छी तरह जमाकर रखा है तुम लोगों ने , इसे आदत में शामिल कर लेना .. शादी के बाद पत्नी बहुत खुश रहेगी। " उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ।
निरीक्षण करते हुए अचानक उनकी निगाह उस चाल्कोलिथिक पात्र पर पड़ गई जिसे पाँच दिन पहले अशोक ट्रेंच से उठाकर ले आया था और बतौर ऐश ट्रे उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा था । “व्वा बेटा.. तो यह पात्र यहाँ रखा है ।“ उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा “शौक तो तुम्हारे रईसों के हैं ।“
इससे पहले कि अशोक अपने धूम्रपान की चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिन्दा होता उन्होंने कहा “ जानते हो तुम्हारी इस ऐश ट्रे की कीमत क्या है ? ये एक लाख से कम की नहीं है ।“ अशोक ने तुरंत माफी माँगी, बाहर जाकर ऐश ट्रे खाली की और डॉ. साब को देने लगा तो उन्होंने कहा “ ऐसे नहीं इसे अच्छी तरह धोकर साफ करो, सुखाओ और फिर आर्काईव में जमा करो .. नहीं तो तुम्हारा कोई जूनियर ‘चाल्कोलिथिक पीरियड में विल्स या पनामा का उद्भव’ जैसे विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत कर देगा । ऐसी ग़लती दोबारा नहीं होनी चाहिए ।“
डांट यद्यपि अशोक को पड़ी थी लेकिन हम सभी लोग अपने आप को अपराधी महसूस कर रहे थे । डांट का यह असर ट्रेंच पर पहुँचने तक भी कम नहीं हुआ था । हाँलाकि अशोक को इस बात पर संतोष था कि सिगरेट पीने के लिए उसे डाँट नहीं पड़ी ।
लेकिन बिना अनुमति उत्खनन में निकली किसी भी वस्तु को निजी उपयोग में लाना अपराध तो था ही ।
इसी अपराध बोध के कारण हम सभी असहज थे यद्यपि सर ने इसे सहज बनाने का प्रयास किया था ।
क्या ज़मीन से नीचे कोई वस्तु निकले तो हम उसका उपयोग कर सकते हैं ?
हम सबके उतरे हुए चेहरे देखकर उन्होंने कहा " देखो भाई, हम सब इस बात को जानते हैं कि हम उन्हीं वस्तुओं का उपयोग कर सकते हैं जिन्हें हमने ख़रीदा है अथवा श्रम से प्राप्त किया है । पुरातत्व की खुदाई जिन साइट्स पर होती है वहाँ पहले से ही ऐसी वस्तुएँ मिलती रही हैं । अब कई बार यह वस्तुएँ लोगों की निजी ज़मीन में भी मिलती हैं लेकिन ग्रामीण लोग इन महत्वपूर्ण अवशेषों का महत्व नहीं जानते इसलिए इन्हें साधारण वस्तुएँ समझकर अपने घर ले जाते हैं ।
यह काम बिल्कुल नहीं करना है
कई बार पुराने स्थापत्य की ईंटे मिलती हैं जिनका उपयोग वे अपने घर की दीवार बनाने में कर लेते हैं । ग़नीमत की मूर्तियों को वे देव प्रतिमा समझते हैं वर्ना उनका उपयोग भी सीढ़ियों की तरह कर लेते, हालाँकि प्रस्तर स्तंभों को लेकर उनकी यह समझ नहीं है इसलिए कई बार ऐसा करते भी हैं ।"
ग्रामीणों द्वारा पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं के निजी उपयोग के ऐसे उदाहरण देकर सर ने हमें अपराध बोध से उबार लिया था । हालाँकि हम इस बात को जान रहे थे कि ग्रामीणों में और हम में फ़र्क है वे यह काम इसलिए करते हैं कि वे वस्तुओं के पुरातात्विक महत्व को नहीं जानते और हम...।
बात फिर से अशोक के इस चौर्यकर्म पर न पहुँचे इसलिए अजय ने उनकी बात के तारतम्य में सवाल किया "लेकिन सर पुरातत्व विभाग ग्रामीणों को पुरातात्विक महत्व की सामग्री घर ले जाने से मना क्यों नहीं करता ?"
सर ने कहा " जब तक पुरातत्व विभाग को इसकी खबर मिलती है तब तक बहुत सारी सामग्री गाँव वाले ले जा चुके होते हैं । कई बार खेत जोतते हुए सोने चांदी के सिक्के, नक्काशीदार बर्तन, मिटटी के खिलौने आदि मिलते हैं, गाँव वाले उन्हें घर ले जाते हैं ।
यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे इसका महत्व नहीं जानते बल्कि मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि जो वस्तु उसे लावारिस पड़ी मिल जाए उस पर वह कब्ज़ा कर लेता है ।"
"सर लेकिन मूर्तियाँ वगैरह तो जंगलों में पड़ी रहती हैं, उन्हें तो कुछ नहीं होता ।" रवीन्द्र ने कहा ।
"नहीं ऐसा नहीं है ।" सर ने कहा " जंगलों में पड़ी मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व वे नहीं जानते । उन्हें वे देव मूर्तियाँ समझते हैं और उन्हें हाथ लगाने से डरते हैं । या फिर किसी पेड़ आदि के नीचे रख देते हैं और हाथ जोड़ने लगते हैं या पूजा-पाठ करने लगते हैं । उनसे कोई ख़तरा भी नहीं है लेकिन मुश्किल तब होती है जब जंगलों में लावारिस पड़ी इन मूर्तियों की ख़बर फैलती है और यह ख़बर मूर्ति चोरों या तस्करों तक पहुँच जाती है ।
कभी कभी किसी अन्य तरीक़े से भी उन पर तस्करों की नज़र पड़ जाती है । उनके मुखबीर घूमते रहते हैं ना । उनका सूचना तंत्र कुछ ऐसा होता है कि सरकारी अमले से पहले उन्हें सूचना मिल जाती है और वे रातों रात ट्रकों में भरकर मूर्तियाँ ले जाते हैं इसलिए कि वे अच्छी तरह जानते हैं प्राचीन भारतीय शिल्पकला की इन प्रस्तर प्रतिमाओं की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बहुत कीमत है ।"
पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर होता है ?
"सर, लेकिन यह प्रतिमाएँ और उत्खनन में निकली वस्तुएँ तो कितनी पुरानी होती हैं ।अर्थशास्त्र का नियम है कि जो वस्तु जितनी पुरानी होती है उसकी कीमत उतनी ही कम हो जाती है फिर इनकी कीमतें इतनी ज़्यादा क्यों होती है ?" अजय ने सवाल किया ।
" यह तुमने बहुत सही सवाल किया है " सर ने कहा ।" लेकिन पुरानी और प्राचीन में फ़र्क होता है कार पुरानी हो सकती है और प्रतिमा प्राचीन । प्राचीनता का सन्दर्भ धर्म,संस्कृति, इतिहास और परंपरा से होता है उसीके अनुसार उसकी कीमत तय होती है ।
"अजय ने पूछा " सर यह निर्धारित करने के लिए कि कोई वस्तु कितनी प्राचीन है और उसकी क्या कीमत है कोई नियम तो होता होगा ?" अजय बहुत सूझ-बूझ भरे सवाल कर रहा था ।
"हाँ, है ना ।" सर ने कहा " यह एन्शिएंट मान्युमेंट्स एंड अर्क्यालोजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट 1958 द्वारा तय होता है । इसमें प्राचीन अवशेषों की परिभाषा के अंतर्गत सौ वर्ष से अधिक के सभी प्राचीन सिक्के , अभिलेख,इमारतें,प्रतिमाएँ इत्यादि आते हैं । वस्तुओं की प्राचीनता और महत्व के अनुसार उनकी कीमत निर्धारित होती है ।
इस एक्ट में पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं की परिभाषा , उत्खनन के नियम और परमिशन की प्रक्रिया, किसी निजी स्थान के अधिग्रहण का मुआवजा, प्राचीन अवशेषों की देखभाल , उनकी सुरक्षा के नियम और चोरी या उन्हें अपने स्थान से हटाये जाने या नुकसान पहुँचाये जाने पर सज़ा के प्रावधान आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है ।"
अशोक काफी देर से हम लोगों की बातचीत सुन रहा था । वह जान गया था कि इन बड़े बड़े चोरों के आगे उसकी चोरी तो बहुत मामूली सी है । अचानक उसके भीतर देशभक्ति का जज़्बा जाग गया .." सर ,सबसे ज़्यादा नुकसान तो हमारा अंग्रेज़ों ने किया है । जाने कितनी बेशकीमती पुरातात्विक धरोहर वे अपने साथ ले गए । उनके म्युज़ीयम्स हमारे यहाँ की वस्तुओं से भरे हुए हैं ।"
सर ने कहा " हाँ यह बात तो है, इसलिए कि पुरातत्व का महत्व हमारे देश में सबसे पहले उन्हीं ने जाना । उन्नीस सौ इक्कीस में जब जॉन मार्शल पुरातत्व के निदेशक थे उन्होंने दयाराम साहनी के साथ हड़प्पा में खुदाई करवाई । यह साईट भी अंग्रेज़ों द्वारा वहाँ रेल लाइन बिछाने के दौरान प्राप्त हुई थी । बहुत सारे अवशेष तो रेल लाइन में ही दब गए । उसके बाद अन्य स्थानों पर खुदाई हुई इसलिए इस बात की संभावना अधिक थी कि वे बहुत सारी सम्पदा अपने साथ ले गए ।"
" सर, लेकिन यह भी तो हो सकता है कि हमारे यहाँ के लोगों ने इस चोरी में उनकी मदद की हो, जानते हुए या अनजाने में भी ? " अशोक की बात पर सर केवल मुस्कुराते रहे ।
अब किशोर की बारी थी " लेकिन सर हमारे यहाँ की सरकार क्या करती रही ? उस वक्त की बात छोडिये आज भी इतनी सारी मूर्तियाँ बाहर भेज दी जाती हैं इनका संरक्षण नहीं हो पाता ऐसा क्यों है ? "
सर ने कहा " इसका सीधा सा कारण है हमारी सरकार में इतिहास बोध और चेतना का अभाव है । सरकारी लोग न अपनी संस्कृति के बारे में जानते हैं न अपनी विरासत के बारे में, जैसे गोरी और गजनी को देश लूटकर जाते समय उस समय के लोगों ने उनकी मदद की थी ना ,वैसी ही मदद यहाँ के भ्रष्टाचारी लोग भी चोरों और तस्करों की कर रहे हैं ।"
उसके बाद वे हम लोगों की ओर मुखातिब हुए और कहा .." मेरे ख़याल से तुम लोग अब समझ गए होगे कि इन अवशेषों का निजी उपयोग करना ग़लत है ।" " हाँ सर, हम लोग समझ गए । " हमने कहा ।
हालाँकि इतने बड़े बड़े चोरों के किस्से सुनकर हमारा अपराध बोध कुछ कम हो गया था । "तो चलो, अब खुदाई का काम शुरू करो ..बाक़ी गपशप रात में ।" सर ने काम की शुरुआत करने की घोषणा कर दी थी ।
हम लोगों ने अपना अपना मोर्चा संभाल लिया ,अपनी कापियाँ निकालीं और पिछले दिन की खुदाई की प्रक्रिया और प्राप्त अवशेषों की सूची का अध्ययन किया । “ क्या यार इतने दिनों से खुदाई कर रहे हैं बस इतना ही खोद पाये ।“ अजय अभी भी वातावरण को सहज बनाने की कोशिश कर रहा था ।
जाने कैसे डॉ. वाकणकर ने उसकी बात सुन ली और कहा “ धीरज रखो बेटा, पुरातत्व की खुदाई इतनी आसान नहीं है । यह गढ्ढा खोदने का काम नहीं है, रोज़ थोड़ा थोड़ा खोदते हुए आगे बढ़ना होता है, किसी वैज्ञानिक की तरह, किसी खोजी की तरह, किसी चिकित्सक की तरह । इसे हलके में बिलकुल नहीं लिया जाना चाहिए, गंभीर होकर काम करोगे तो परिणाम निकलेगा ।"
हम लोग पहले से ही मायूस थे, उनकी बात सुनकर और मायूस हो गए । सर हम लोगों की उदासी भाँप गए । मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा “ अरे दुष्टों, इसमें उदास होने की क्या बात है , तुम लोग तो इतिहास बोध से लैस नौजवान हो और इस देश के बहुत सारे पढ़े लिखे और बड़े बड़े लोगों से बेहतर हो । चलो तुमको एक बढ़िया किस्सा सुनाता हूँ ।" किस्सा सुनने के तो हम लोग शौक़ीन थे ही सो सर की बात सुनने के लिए फिर उनके पास आ गए ।
एक और मजेदार किस्सा
"एक बार कि नई क्या हुआ " सर ने किस्सा बताना शुरू किया .." हम लोग एक साइट पर खुदाई कर रहे थे । एक दिन वहाँ एक नेताजी घूमते हुए आ गए । ट्रेंच को देखते हुए उन्होंने अपने अन्दाज़ में पूछा “हूँ... कितने दिनों से खुदाई चल रही है ?“
हमने बताया “ साब, एक माह से । “
इतना सुनते ही वे आग बबूला हो गए और ट्रेंच की ओर इशारा करके चिल्लाने लगे “एक महीने से खुदाई चल रही है और बस इतना ही खोदा है आप लोगों ने ? कितने आदमी लगा रखे हैं .. सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है जो इस तरह बरबाद कर रहे हो । मैं ये सब खुदाई-वुदाई बंद करवा दूंगा ।"
इससे पहले कि हम उन्हें कुछ समझा पाते कि नेताजी गड्ढा खोदने और पुरातत्व की खुदाई में बहुत फर्क होता है, वे आगबबूला होकर चल दिए और जाते जाते कह गए ..” अभी तीन दिन बाद मैं फिर इधर आउंगा, मुझे ठीक- ठाक काम दिखना चाहिये ।“
"फिर आपने क्या किया सर?" अशोक अब पूरी तरह सहज हो चुका था "और वो नेताजी दोबारा वहाँ वापिस आये क्या ?" “अरे, नेता जी भी कहीं पांच साल से पहले सूरत दिखाते हैं क्या ..उनको कहाँ आना था वापस ..वो सब ऐसे ही कह दिया था ।“ सर ने कहा । “मगर मुझे लगा क्या पता वापिस आ जायें तो मैंने दो मज़दूरों को बुलाया और साइट से बाहर दूर की एक ज़मीन बताकर कहा, वहाँ खोद डालो रे जितना खोद सको, बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ । तो ऐसा है भाइयों अपने सत्ताधीशों का पुरातत्व ज्ञान ।"
डॉ. वाकणकर द्वारा कहे गए शब्द ' ऊंडे जाओ ' मतलब खोदे जाओ , सुनकर हम लोग हँस हँस कर लोट पोट हो गए । "सर, ऐसे बेवकूफ नेता कौन थे और किस पार्टी के थे ?" अशोक ने हँसी रुकने के बाद उनसे पूछा । सर ने मुँह पर ऊँगली रखकर कहा "चुप । नाम नहीं बताऊंगा ।" । फिर कुछ देर बाद गम्भीर होकर कहने लगे “ ऐसा नहीं है कि वे कुछ नहीं जानते थे या यह केवल तकनीकी ज्ञान के अभाव के वज़ह से हुआ । दरअसल समाज में व्याप्त यह मनोवृति इतिहास को और पुरातत्ववेत्ताओं के कार्य को गैरज़रूरी समझने के कारण है । इतिहास बोध की कमी तो समाज में है ही लेकिन इसके तकनीकी पक्ष को भी वे गौण मानते हैं इसलिए यह उनकी समझ से परे है ।"
*शरद कोकास*
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- शीर्षक: भारत का राजपत्र (The Gazette of India) - असाधारण (Extraordinary)।
- विशिष्ट पहचान: अधिनियम संख्या, वर्ष और राष्ट्रपति की सहमति की तिथि।
- संरचना: प्रस्तावना के बाद अनुभाग (Sections) और अध्याय (Chapters)।
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