शुक्रवार, 29 मई 2026

25-चलो नीली डॉज मे बैठकर घूमने चलते हैं

इस एपिसोड मे पढ़ेंगे आप घुमक्कड़ी का किस्सा 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं ।शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं।इस भाग से शुरू हो रहा है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।

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*भाग 25* 

25 - डायरी भीतर डायरी , नीली डॉज में सैर  

आज शिविर में हम लोगों का बारहवाँ दिन है । शाम को दंगवाड़ा गाँव से लौटते हुए अँधेरे की तरह ऊब अजय के चेहरे पर पसरी हुई थी । “यार यह सिटी जाना नहीं होता तो अब तक इस जंगल में ऊब गए होते ।“ “ लेकिन हम लोगों का सिटी फ्रेन्ड तो आया ही नहीं इस बार । “ रवीन्द्र ने महेश को याद करते हुए कहा  । “ अच्छा तुम अपने भीलवाड़ा के हीरो महेश चन्द्र शर्मा  की याद कर रहे हो  ? “ अशोक रवींद्र का संकेत समझ गया था  । “ हाँ यार, अपना यह  हीरो तो आया ही नहीं , उसने सर से कहा था कि घर से लौटते ही वह कैम्प में आएगा ..पता नहीं क्या हुआ ..अभी तक आया कैसे नहीं ? “ मुझे भी महेश की चिंता होने लगी थी  । 

“ आ जाएगा यार , वह मस्त मौला है .. वैसे तैने उसके साथ बहुत मस्ती की थी ना पिछले साल अजन्ता एलोरा के टूर में …क्यों ?" रवीन्द्र ने मुझे छेड़ा । "अच्छा तो तुझे सब पता है ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा  । “ वाह पता कैसे नहीं है ..हमने आँखें बंद थोड़े ही कर रखी थीं ।" रवीन्द्र की आँखों में शरारत थी । " अच्छा ,तैने तो डायरी में भी लिख रखा है ना उस टूर का किस्सा ? “ “ हाँ “ मैंने कहा । “ तो सुना ना यार, तेरी डायरी बड़ी मज़ेदार होती है, वैसे तू डायरी लेकर आया है ना ?

“ रवीन्द्र उस टूर का किस्सा जानने हो बेताब दिखाई दे रहा था  । रवींद्र की बात सुनकर अजय उछल पड़ा " तो सुना ना यार ..अब में तो गया नहीं था तुम लोगों के साथ इस बहाने मैं भी तुम लोगों के साथ यात्रा कर लूँगा । " मैंने अशोक की ओर देखते हुए कहा "अशोक भाई कहेंगे तो ज़रूर सुनाऊंगा ।" अशोक ने कुछ कहा नहीं बस अपने दाहिने हाथ का अंगूठा ऊपर उठा दिया ।" तो बात डन.." मैंने सबकी सहमति पाकर कहा .." आज भोजन के पश्चात यात्रा डायरी का पाठ करेंगे ।"

रात्रि भोजन के पश्चात रजाइयों के बीच हम लोगों की महफ़िल जम गई । तम्बू में सौ वाट का बल्ब जल रहा था जिसकी उपस्थिति हमें अँधेरे में सूरज की तरह लग रही थी । इस उत्खनन कैम्प में प्रकाश व्यवस्था के लिए काफी दूर से बिजली की लाइन खींचकर लाई गई है  और भोजनशाला के अलावा सभी तम्बुओं में एक एक बल्ब की व्यवस्था की गई है  । सभी बल्बों का स्विच एक ही जगह है  और रात्रि का भोजनादि समाप्त हो जाने के बाद ग्यारह बजे के लगभग स्विच ऑफ़ कर दिया जाता है । पिछले दिनों हुई बारिश और ठण्ड के मद्देनज़र हमने सर से अनुरोध किया कि रात में भी बिजली चालू रखें ताकि थोड़ी गर्मी मिलती रहे । रोशनी में नींद न आने जैसी समस्या से बढ़कर आजकल ठण्ड की समस्या है सो उन्होंने हमारा कहना मान लिया । वैसे भी रात में सांप-बिच्छू का अंदेशा रहता है  सो उसके लिए भी पर्याप्त रौशनी का रहना आवश्यक है । रौशनी में नींद न आने जैसी समस्या हम लोगों के साथ नहीं है । वैसे भी दिन भर काम करते हुए हम लोग इतना थक जाते हैं कि अगर बल्ब की जगह सूरज भी जलता रहे तो नींद आ जायेगी ।

रजाइयों में घुसकर सभी के व्यवस्थित हो जाने के उपरान्त मैंने बैग से डायरी निकाली और पन्ने पलटने लगा । इस बीच रवीन्द्र अपनी भूमिका प्रस्तुत करने लगा …” याद है ना होली के दिन गए थे अपन लोग, अरे ..दो दिन तक तो इन लोगों की भंग ही नहीं उतरी थी, ऐसी ऐसी हरकतें की इन लोगों ने कि पूछो मत । हमारी बस में सामने की ओर एक ही दरवाज़ा था और यह लोग भांग के नशे में बार-बार पीछे जाकर दरवाज़ा ढूँढते थे और इंदौर में उस पूड़ी की दुकान की ख़ूबसूरत मालकिन को इम्प्रेस करने के चक्कर में तीन किलो पूड़ी खा गए, आखिर रात में रास्ते में नाले के किनारे बस रुकवानी पड़ी ।“ “चुप रहो यार“ मैंने गुस्से का अभिनय करते हुए कहा "जब देखो तब तुम लोगों को मस्ती सूझती है।"  " ऐसा नहीं है यार " रवीन्द्र ने सफाई दी " मैं तो तेरा बटन स्टार्ट कर रहा था " "ठीक है ठीक है अपने भीतर कोई स्टार्टिंग ट्रबल नहीं है .." मैंने  डायरी के पृष्ठ पलटते हुए  कहा “ अगर तू ही  बता देगा पूरा किस्सा तो मेरे लिए क्या बाक़ी रहेगा ?" " ठीक है भाई तू ही सुना ..अब पढ़ना शुरू भी कर  " रवींद्र ने वाचन के सम्पूर्ण अधिकार मुझे सौंपते हुए कहा ।

मैंने डायरी वाचन से पहले कुछ भूमिका बांधनी चाही  .. " तुम लोगों को याद होगा वह धुलैंडी का दिन था । न रंग का नशा ठीक से उतरा था न भंग का।   उस दिन शाम को हम लोग बस से निकले थे और हमारे साथ हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति पुरातत्व अध्ययन शाला के एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन और इन्दौर से मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक डॉ. एच .वी. त्रिवेदी भी थे । “ “ तू किस्सा सुनाता है या नहीं , यह सब तो हमको भी मालूम है । “ अब मुझे कोंचने की बारी रवीन्द्र की थी । “ भाई सुन तो लो" मैंने उसे शांत करते हुए कहा " आखिर भूमिका बताना भी तो ज़रूरी है ना , और यह भी कि यह डायरी मैंने अजन्ता से लौटकर आने के बाद औरंगाबाद की उस टूटी- फूटी धर्म शाला में बैठकर लिखी थी ।“ “हाहाहा “ अजय ज़ोर से हँस दिया …” अबे, टूटी फूटी नहीं जीर्ण - शीर्ण, हिन्दी का लेखक होकर भी ग़लत शब्द का प्रयोग करता है । जैसे हमारे कुछ लेखक लिखते हैं ‘ महिला लेखिकाएँ ‘… बताओ, लेखिका क्या पुरुष भी होते हैं… “  “ ठीक है माई-बाप आइंदा से ध्यान रखूँगा । मैंने उस चुप कराने के उद्देश्य से कहा और डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया ।

26 मार्च, रविवार । प्रस्थान के लिए कल 25 मार्च का दिन तय हो चुका था । हालाँकि कल धुलैंडी थी लेकिन सब को पता था कि दोपहर तक होली के सारे रंग फीके पड़ जाएँगे । महेश और राममिलन जब विश्राम लॉज स्थित मेरे रूम पर पहुँचे चार बज चुके थे और मैं मल्होत्रा के कमरे में उसके आईने के सामने खड़ा शेव कर रहा था । 

मेरे कमरे का आईना पिछले ही दिन  टूट गया था । “क्यों चलना नहीं है क्या ?“ महेश ने कमरे में प्रवेश करते ही मेरी हालत देखकर कहा । मैंने उत्तर में धीरे से उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए स्लो मोशन में अपनी गर्दन हाँ में हिलाई  । महेश ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा “ तो लगता है मेरी तरह तुमने भी ठंडाई जम कर ली है आज । “ मैं भी यह सुनकर उसी की तरह मुस्कुराने लगा । हम दोनों का एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने का यह सिलसिला कुछ देर चलता रहा, फिर महेश राममिलन भैया की ओर मुखातिब हुआ और उनसे कहा... “ राममिलन भैया ,भाईजान को तो तैयार होने में अभी कुछ विलम्ब है ,तुम यहीं रुको, मैं रूम से अभी अपना सामान लेकर आता हूँ । “ इतना कह कर वह लक्ष्मीनगर स्थित अपने रूम के लिए  प्रस्थान कर गया  ।

मैं कुछ ही देर में नहा - धोकर तैयार हो गया । नहाने के बाद काफी ताज़गी सी महसूस हो रही थी । देह और मन दोनों सफ़र के लिए तैयार थे । “क्यों राममिलन भैया, नीचे चले ? “ मैंने राममिलन से पूछा । “और क्या । “ उन्होंने  जवाब दिया ..”बस तो नीचे ही आएगी ना ।“ हम लोग अपने बैग लेकर विश्राम लॉज की सीढ़ियों से नीचे उतरे और उज्जैन के फ्रीगंज इलाके में स्थित शहीद पार्क के एक कोने में चौरसिया के पान ठेले के सामने खड़े रहकर बस की प्रतीक्षा करने लगे ।

अभी गर्मियों की शुरुआत नहीं हुई थी लेकिन हवाओं में वाष्प की कुछ गर्म गर्म सी गंध थी । पेड़ों के साये पार्क से बाहर निकलकर सड़क तक पहुँच चुके थे और आती जाती गाड़ियाँ उन्हें  रौंद रहीं थीं । मैं देखने लगा , गाड़ियाँ गुजर जाने के बाद भी वे साये ज्यों के त्यों दिखाई देते थे और वे उनका बाल बाँका नहीं कर पा रही थीं । इससे पहले कि कोई भाववादी टाइप का विचार मेरे मन में आता, मुझे बाबा नागार्जुन की कविता याद आ गई और मैंने नारे के अन्दाज़ में उसका पाठ करते हुए कहा ... “ जले ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक, बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक ।“ 

“ का हो सरदवा ? का हुई गवा ? बड़े खुस हो ?“ राममिलन भैया ने मुझे कविता का सस्वर पाठ करते देखा तो पूछा ।  मैंने उनकी बात के जवाब में उनकी ओर देखकर दो बार आँखें मिचकाईं  और होली की इस ढलती दोपहर में मादक गंध अपने भीतर समाये धीमे धीमे बहती हवाओं की भांति मंद मंद मुस्कुराने लगा । यह बसन्त का मौसम था और विदा लेती हुई धूप मन में पुलक पैदा कर रही थी । हवा के झोंके अजीब तरह से गुदगुदा रहे थे । वहाँ खड़े खड़े हम लोग काफी देर तक विक्रम विश्वविद्यालय के जियालॉजी डिपार्टमेंट की मिनी बस की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी । रेल की बजाय बस से जाने का उद्देश्य यही था कि अपनी गाड़ी रहने से सुविधा रहेगी और साइट सीइंग का खर्चा भी बच जाएगा । ऐसा हमारे एच. ओ. डी. जैन साहब का विचार था । 

आखिर प्रतीक्षा समाप्त हुई । कुछ ही देर में दूर से नीले रंग की वह ‘ डॉज ‘ आती दिखाई दी । महेश भी इस बीच पहुँच चुका था । उसने हाथ बढ़ाकर गाड़ी रोकी और पीछे से घुसने की कोशिश करने लगा । खिड़की से झाँकते मित्रों ने हँसते हुए कहा … "भैया दरवाज़ा पीछे नहीं सामने है …। ” हमें तो बस महेश का अनुसरण करना था । देखा तो बस में हमारे एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन सबसे आगे की सीट पर बैठे थे । हम लोगों ने उन्हें नमस्कार किया । हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व के हॉस्टल में रहने वाले छात्रों ने पहले ही सामने की जगह कैप्चर कर ली थी । हम लोगों के हिस्से में आईं पीछे की सीटें ।

बस ने टावर चौक से बाईं ओर एक टर्न लिया और उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी थी । अशोक समझ गया कि मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । ख़ामोशी दिखाई नहीं दे रही थी लेकिन वह मेरे साथ बस की सीट पर आकर बैठ गई थी  । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. “चुटकुला सुनो भैया सरद..” अब ऐसे माहौल में कोई कितनी देर उदास रह सकता है । अंतत: मेरा मूड ठीक हो गया, ओढ़ी हुई उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा । 

हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिए  रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग हम लोग इंदौर पहुँच गये । बस से नीचे उतरते ही हम लोगों ने महसूस किया कि भूख की तीव्रता के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी हमारे दिन फ़ाकामस्ती में कट रहे थे और सुबह से कुछ खाया भी नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ ऊपर उठाई और भीतर घुसा हुआ अपना पेट दिखाकर कहा .. लो, देख लो और चाहो तो कान लगाकर सुन लो  .. भीतर से भी खाना दो, खाना दो की आवाज़ आ रही है या नहीं । 

“ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने ऑंखें फाड़ते हुए कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और बड़ी मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था यार ....। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है, ज़बान भले ही एक बार खामोश हो जाए यह खामोश नहीं रहता , शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ विद्रोह की आवाज़ यहीं से उठती है । इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिए उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है ।“ " बस बस कॉमरेड .. रवीन्द्र ने होंठों पर ऊँगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए कहा  "भाषण बाद में देना पहले खाने का प्रबंध करो । " 


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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