📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि यात्रा अब समाप्ति की ओर है और छात्रों की टोली उज्जैन वापसी के लिए निकल चुकी है इस भाग में आप पढेंगे मांडू और धार की यात्रा का वर्णन। डायरी भीतर डायरी के इस भाग में एक ब्रेक के बाद पढ़िए आगे का वृतांत*
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*भाग 34*
आज के डायरी पाठ की शुरुआत करने से पहले
बाहर काफी ठण्ड थी इसलिए अधिक देर बाहर ठहरना संभव नहीं था । तम्बू में लौटकर फिर हम लोग बिस्तर में घुस गए । अचानक रवीन्द्र को याद आया ..“अरे यार तेरे गाने की बात से याद आया तैने दो - तीन दिन से गाना नहीं सुनाया है .. चल इसी बात पर एक सुना दे “।
“ गाना वाना अभी नहीं ..कल सुनायेंगे ।" मैंने कहा । " वैसे भी आज काफी रात हो चुकी है, कहो तो बाक़ी का हिस्सा कल सुनाया जाए ? "
"नहीं नहीं ।" अशोक ने अपनी सिगरेट से एक सुट्टा मारते हुए कहा .. नींद तो वैसे भी किसी को नहीं आ रही है आज अपन यह यात्रा वृतांत समाप्त कर लेते हैं । तेरे पास किस्सों की तो कमी नहीं है कल से फिर कोई नया किस्सा सुनेंगे ।“
मैंने कहा " हाँ यह भी सही है ,आज ही समाप्त कर लें वर्ना लिंक टूट जाएगा " अजय ने ऑंखें फाड़ कर चौंकते हुए अपनी गर्दन आगे बढ़ाई । मैंने कहा " ऐसा क्या चौंक कर देख रहा है ..लिंक ही कहा है ।"
राममिलन भैया की ट्यूबलाइट अचानक जल गई और उन्होंने भीम की तरह एक अट्टहास किया ।
"खैर आगे की डायरी सुनो ।" डायरी खोलते हुए मैंने कहा और जनता को पिछले सन्दर्भ से जोड़ने के लिए हमेशा की तरह प्रश्न किया .." तो हम कहाँ थे ?"
अजय बढ़िया कांटीन्युटी मैनेजर है । उसने कहा .."अजंता एलोरा की यात्रा समाप्त कर आप लोग धार और मांडू होते हुए उज्जैन वापसी के सुहाने सफ़र पर थे और बस में खोये खोये चाँद से संवाद स्थापित करते हुए गाना गाते हुए ड्राइवर जमनालाल जी का उत्साह वर्धन कर रहे थे ।"
"वैरी गुड़ " मैंने अजय की पीठ ठोकते हुए कहा और डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया ...
हमारी डॉज अँधेरे की चादर को चीरती हुई लगातार मांडू की ओर बढ़ रही थी । सुबह बस होने वाली ही थी । आसमान अपने श्याम वस्त्र उतारकर श्वेत वस्त्र धारण कर रहा था । सड़क के दोनों ओर हरियाली का विशाल साम्राज्य फैला हुआ था जो अब अँधेरे की गुलामी से आज़ाद होकर स्वतंत्रता के प्रकाश में स्पष्ट दृष्टिगोचर था ।
मॉर्निंग वाक पर निकले हुए ताज़गी से भरी ठंडी हवा के झोंके तन को सहलाने लगे थे । प्राणवायु बस की खिड़की के रास्ते बाहर से भीतर आकर वाणी जी के यहाँ के सुस्वादु भोजन हज़म हो जाने के फलस्वरूप आमाशय में उपजी विभिन्न प्रकार की गैसों को स्थानापन्न कर रही थी ।
मैंने बस में बैठे अपने साथियों पर एक नज़र डाली । सभी प्रकृति के इस सौन्दर्य से बेख़बर नींद में मस्त थे । भारद्वाज भी मेरे साथ रात भर जागा था लेकिन इस वक़्त वह भी आँखें झपका रहा था । जमनालाल जी ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस सड़क के एक किनारे रोक दी ।
पता चला सामने ही एक नदी है । सुबह का धुँधलका अभी पूरी तरह दूर नहीं हुआ था । विचार हुआ यहीं फ्रेश होकर, नहा धोकर आगे बढ़ा जाए । जलगाँव बस स्टैंड का सुलभ स्नानगृह , औरंगाबाद में धर्मशाला की बावड़ी और उम्बरखेड़ के कुएँ पर शाही स्नान के बाद हमारा यह चौथा स्नान था जो नदी पर होने जा रहा था । स्नान का इतना आनंद तो कुम्भ में स्नान करने वालों को भी नहीं मिलता होगा, जितना हमें हमें मिल रहा था ।
नदी किनारे की धरती को उपजाऊ बनाने में अपना थोड़ा सा योगदान कर स्नानादि के पश्चात हम लोग आगे बढ़े । अब हम मालवा में प्रवेश कर चुके थे । मार्ग में आने वाले एक गाँव धामनोद में हमने पोहे जलेबी का नाश्ता किया और चाय पी ।
महाराष्ट्र के पोहे और मालवा के पोहे के स्वाद में वाकई बहुत अंतर था । पता चला कि मांडू यहाँ से कुछ ही दूरी पर है । यह जानकर हम लोगों का उत्साह द्विगुणित हो गया । रात भर जागने की वज़ह से आँखों में कुछ जलन अवश्य हो रही थी । बैठे बैठे झपकी लेने की कोशिश की लेकिन ताज़गी ने नींद को हावी नहीं होने दिया ।
मांडू के परिसर में प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे प्रकृति ने अपना विशाल साम्राज्य यहाँ स्थापित कर रखा है । परिसर के बीच में एक छोटी सी झील थी । उस झील में हाथ मुँह धोकर हम लोग सबसे पहले रानी रूपमती का महल देखने गए ।
सबसे पहले हमने वह झरोखा देखा जहाँ से रानी प्रतिदिन नर्मदा के दर्शन किया करती थी । उसके बाद था बाजबहादुर का महल । फिर महलों का एक सिलसिला था, जहाज़ महल, नवेली महल, हिन्डोला महल और दाई का महल । यहीं पर एक ईको पॉइंट भी है । अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि यहाँ साफ सुनाई देती है । हम लोगों ने अपने मित्रों के नाम ले लेकर और उनके नामों के साथ नए नए विशेषण जोड़कर यहाँ बहुत शोर मचाया ।"
इतना सुनते ही अजय ने अपनी स्टाइल में हो हो करते हुए जोर से हँसना शुरू कर दिया " ए..तुम लोगों ने जैन साहब का नाम लेकर भी कुछ कहा था ईको पॉइंट पर पागल -वागल जैसा कुछ " अजय ने कहा । "चुप ।" मैंने उसे इशारा किया । " वह सब गोपनीय बातें हैं ।"
"ऐसे नहीं चलेगा यार .. " अचानक रवीन्द्र ने ओब्जेक्शन मी लार्ड की तरह अपने हाथ खड़े किये ।" क्या हुआ भाई, क्या नहीं चलेगा ?" मैंने अपनी हथेली हिलाई । रवींद्र ने कहा "हमें तुझसे एक पर्यटक की डायरी नहीं सुननी है, बल्कि एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी सुननी है । अब तूने इसमें लिखा हो या न लिखा हो तुझे मांडू की इतिहास गाथा तो सुनानी ही पड़ेगी ।"
" तो इसमें कौनसी बड़ी बात है " मुझे लगा था कि रवींद्र हमारी मस्ती वाले वर्णन को लेकर मुझे टोकने वाला था " लो अभी सुना देता हूँ इतिहास आखिर उसमे राजाओं की वंशावली ही तो सुनानी है । देखता हूँ क्या क्या मुझे याद है ..थोड़ा बहुत आगे पीछे हो सकता है सो भूल-चूक लेनी देनी । "
" हाँ यह हुई ना बात, राजाओं का काल याद रखने से हम वहाँ के स्थापत्य और परंपरा को उनसे जोड़ सकते हैं चल ..सुना बाक़ी कौन किसका बेटा है और कौन किसका बाप है वह हम देख लेंगे ।" रवींद्र ने कहा और वह सजग होकर बैठ गया ।
मैंने प्रोफेशनल अंदाज़ में कहना प्रारंभ किया " धार जिले के तलकपुर उत्खनन में प्राप्त एक प्राचीन शिलालेख के अनुसार ज्ञात होता है कि *छठी शताब्दी* में एक व्यापारी चन्द्रसिंह ने किसी मंडपा दुर्गा में एक प्रतिमा की स्थापना की थी । इसी मंडपा दुर्गा से यह अनुमान लगाया जाता है कि यही मांडव गढ़ रहा होगा ।
इसके बाद *छठी से नवीं शताब्दी तक* शासन करने वाले राष्ट्रकूटों आदि से होते हुए सीधे हम *दसवीं शताब्दी* में आते हैं ।
*दसवीं शताब्दी* में यहाँ कन्नौज के प्रतिहारी नरेशों का शासन था । उन्होंने परमार वंशीय श्रीरमन को मालवा राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया था । नौ सौ बहत्तर ईस्वी में प्रतिहारों के पतन के पश्चात परमार वंश का स्वतन्त्र शासन प्रारंभ हुआ तथा सीयक द्वितीय इसका प्रथम शासक बना ।
इसका प्रमाण जयवर्मन द्वितीय से शुरू होने वाले परमार राजाओं के अभिलेखों में प्राप्त होता है । इनमे मांडू या मंडप दुर्गा को शाही निवास कहा गया है । परमार राजाओं के वंश में राजा मुंज के भतीजे राजा भोज परमार वंश के नवें राजा हुए जिनका शासन काल एक हज़ार दस से एक हज़ार पचपन तक था।"
"ये वही राजा भोज हैं ना जिन्होंने भोजपाल अर्थात भोपाल शहर बसाया था ? " अजय ने अपने सामान्य ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए कहा । "हाँ, बिलकुल ठीक कह रहे हो तुम ।" मैंने कहा "राजा भोज का नाम उनकी विद्वता, कलाप्रियता, स्थापत्य और निर्माण के लिए भी प्रसिद्ध है । राजा भोज
भोज के निधन के उपरान्त चालुक्य कर्ण और करणाटो ने यहाँ शासन किया परन्तु कुछ समय पश्चात भोज के ही एक वंशज उदयादित्य ने इसे फिर जीत लिया । फिर उदयादित्य का पुत्र जगद्देव यहाँ का शासक हुआ । इसके बाद *तेरह सौ पांच* में यहाँ अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण हुआ जिसने परमार वंश का अंत कर दिया और *तेरह सौ बीस* में यह फिर तुगलकों के शासन में आ गया । अलाउद्दीन खिलजी
मोहम्मद बिन तुगलक ने गोरी वंश के दिलावर खान को यहाँ का सूबेदार नियुक्त किया । सन चौदह सौ एक में जब तैमूर के आक्रमण की वजह से तुगलक सत्ता डांवाडोल हुई मांडव गढ़ तुगलकों के अधिपत्य से स्वतन्त्र हो गया और मालवा के सूबेदार दिलावर खान गोरी ने स्वतन्त्र सत्ता की घोषणा करते हुए मांडव को अपनी राजधानी बनाई और पठान वंश की स्थापना की ।
"मतलब तुमने सन *छह सौ से लेकर चौदह सौ तक का इतिहास* तो सुना दिया ..लेकिन यार इसमें रानी रूपमती का ज़िक्र नहीं आया ?" मैं समझ गया अजय रानी रूपमती का किस्सा सुनने को आतुर हो रहा है । *
"रुक ना भाई अपना इतिहास सुनाने का तरीका पैसेंजर ट्रेन की तरह है जो इतिहास के हर छोटे बड़े स्टेशन पर रूकती है अगर इतिहास की यात्रा सुपर फ़ास्ट एक्सप्रेस में करोगे तो बहुत कुछ छूट जायेगा ..इसलिए धीर धरो ।"*
तुम अपने तरीके से ही सुनाओ .."किशोर भाई ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा "यह तो बावला है इसे हर काम में जल्दी मची रहती है ..इसी चक्कर में इसने शादी भी जल्दी कर ली । ये रानी रूपमती का किस्सा भी इसीलिए सुनना चाहता है ।" "क्या किशोर भैया आप भी .." इतना कहकर अजय ने अपने मुँह पर उंगली रख ली ।रानी रूपमती का महल
"चलो कोई बात नहीं चौदह सौ से आगे का इतिहास ध्यान से सुनो .." मैंने अपनी बात फिर से शुरू की .."उसके बाद दिलावर खान गोरी के पुत्र होशंगशाह ने सत्ता सम्भाली जिसने सन *चौदह सौ एक से चौदह सौ पैंतीस* तक राज्य किया । चौदह सौ पैंतीस में पठान वंश को समाप्त कर यहाँ महमूद शाह प्रथम ने खिलजी वंश की स्थापना की ।
*कृपया कन्फ्यूज़ न हों
यह खिलजी वंश दिल्ली के खिलजी वंश से अलग था उसे तो तेरह सौ बीस में तुगलकों ने समाप्त कर दिया था* । इस तरह चौदह सौ पैंतीस में स्थापित मालवा के इस खिलजी वंश में महमूद प्रथम का बेटा गयासुद्दीन खिलजी हुआ फिर उसका बेटा नसीरुद्दीन और उसका बेटा मोहम्मद शाह खिलजी द्वितीय हुआ जो पंद्रह सौ इकतीस तक यहाँ रहा ।
"ठहरो ठहरो" अजय ने कहा "एक बार सूची बना लेने दो वर्ना भूल जायेंगे ..मांडू में राज्य करने वालों में पहले प्रतिहार वंश ,फिर परमार वंश ,फिर तुगलक वंश, फिर पठान वंश और फिर खिलजी वंश ओके ..यानि ' *प्रपतुपखि* ' । "
राममिलन भैया काफी देर से बहुत शांति के साथ डायरी सुन रहे थे.. अजय की बात सुनकर बोले .." प्रपतुपखि प्रपतुपखि ई बन्दर जैसा खी खी का कर रहे हो अजयवा ?" किशोर भैया राममिलन भैया की बात पर जोर से हँसे .."हमारे बजरंग बलि के भक्त को सब बन्दर ही नज़र आते हैं अरे पंडत यह रटने का तरीका है सब शब्दों के पहले अक्षर को लेकर एक नया शब्द बना लिया ..
प्रतिहार,परमार,तुगलक,पठान, खिलजी यानि *प्रपतुपखि* ,
हम लोग एग्जाम में ऐसे ही रटकर जाते हैं वर्ना लम्बी लम्बी वंशावलियाँ किसे याद रहती हैं ।"
"अच्छा तो ये बात है जौने के कारन नंबर मिलते हैं ,हमका नहीं बताई जे बात किसोरवा बड़े चुप्पे हौ " राममिलन भैया के स्वर में आश्चर्य मिश्रित क्रोध था । "चलो चलो कोई बात नहीं इस साल हम तुम्हारी तैयारी करवा देंगे " किशोर भैया ने राममिलन भैया का क्रोध शांत करते हुए कहा .."आगे बताओ शरद ..फिर पंद्रह सौ इकतीस के बाद क्या हुआ ?"
"ओके " मैंने इस विराम से आगे बढ़ते हुए कहा "फिर पंद्रह सौ इकतीस में गुजरात का सुलतान बहादुर शाह
मांडू तक आ गया और उसने खि यानि खिलजी वंश के महमूद खिलजी द्वितीय को बंदी बना लिया और मांडू पर राज करने लगा ।अब दिल्ली की बात सुनो ..इधर पंद्रह सौ तीस में बाबर के बाद हुमायूं दिल्ली की गद्दी पर बैठ चुका था सो तीन वर्ष बाद ही साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से बादशाह हुमायूं ने मालवा पर आक्रमण किया और बहादुर शाह को मालवा से वापस गुजरात भगा दिया यानि बैक टू पैवेलियन और फिर मलुखों को यहाँ का सूबेदार बनाया। "
"लेकिन हुमायूं के बारे में तो तुम जानते ही हो उसे पंद्रह सौ चालीस में शेरशाह सूरी ने जब परास्त कर दिया था तो वह ईरान चला गया था तब शेरशाह सूरी ने दिल्ली के साथ साथ यहाँ मालवा को भी अपने कब्ज़े में ले लिया और पंद्रह सौ बयालीस में शुजात खां को मालवा का सूबेदार बना दिया । "
"रुको रुको ..एक मिनट " अजय ने अपनी उंगली उठाई " मतलब मकान मालिक बदला तो उसने किरायेदार भी बदल दिया " अजय की बात सुनकर राममिलन भैया उठे और उन्होंने अजय की पीठ थपथपाई ।
"फिर क्या हुआ ?" अब रवींद्र ने अपना मुँह खोला । "फिर क्या होना था " मैंने कहा " इधर पंद्रह सौ पैंतालिस में शेरशाह सूरी की मृत्यु हुई और उधर शुजात खां ने मांडू में अपनी स्वतन्त्र सत्ता घोषित कर दी ।"
"हो हो हो " अजय इस तरह के अट्टहास के बाद हमेशा कुछ काम की बात कहता है .." मतलब मकान मालिक मर गया तो किरायेदार ने ही मकान हड़प लिया ।"
राममिलन भैया फिर उठे और उन्होंने अजय की पीठ थपथपाई । मैं समझ रहा था यह सब शारीरिक हलचल के प्रयास नींद को भगाने के लिए किये जा रहे थे । "
बिलकुल सही " मैंने कहा " लो अब तुम्हारी रानी का ज़िक्र आने ही वाला है । फिर पंद्रह सौ चौवन से पंद्रह सौ पैंसठ तक शुजात खां के बेटे मलिक बाज़िद उर्फ़ बाज बहादुर का यहाँ शासन रहा ।
उस समय दिल्ली में अकबर का शासन था जो पंद्रह सौ छप्पन में गद्दी पर बैठा था उसने अपने सेनापति आदम खां को यहाँ भेजा जिसने बाज बहादुर को परास्त कर मांडू पर कब्ज़ा कर लिया और अब्दुल्ला खान को मालवा के मुग़ल साम्राज्य का पहला गवर्नर बना दिया ।
उसके बाद यहाँ का कोई शासक नहीं हुआ बस विभिन्न मुगल शासकों के गवर्नर ही यहाँ नियुक्त होते रहे ।
"अच्छा भाई अजय तुम बताओ अब तुम्हारी मकान मालिक किरायेदार वाली थ्योरी क्या कहती है ? मुझे पानी पीने के लिए एक विराम चाहिए था मैंने पानी के बर्तन की और हाथ बढ़ाते हुए कहा ।
" मतलब यह हुआ "अजय ने छत की ओर देखते हुए कहा " कि अबकी बार मकान मालिक के वंशज ने मकान हड़पने वाले किरायेदार को निकाल बाहर किया और फिर किसी को मकान किराए पर नहीं दिया बस वहाँ केयर टेकर यानि चौकीदार नियुक्त करता रहा ।"
अबकी बार तो राममिलन भैया की खुशी की सीमा नहीं थी वे उठे और उन्होंने अजय को गले से लगा लिया । अजय ने उन्हें झुककर प्रणाम किया और मेरी तरफ मुख़ातिब होकर कहा " लेकिन हमारी रानी रूपमती का क्या हुआ ?"
" अरे बावले यही तो वह बाज बहादुर था जिसकी रानी का नाम रूपमती था और जिस पर आदम खां की बुरी नज़र थी लेकिन उससे बचने के लिए रानी ने हीरा निगल लिया था ।" रवींद्र ने अजय की बात पर हँसते हुए कहा ।
1561 में, आदम खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने मालवा पर आक्रमण किया। 29 मार्च 1561 को सारंगपुर के युद्ध में उन्होंने मालवा के सुल्तान ईशान की सेना को पराजित किया। विजयी सेना ने ईशान के सभी खजाने, हाथी और हरम पर कब्जा कर लिया। सेना की मुखिया रानी रूपमती ने विष खाकर आत्महत्या कर ली। विजय के बाद, आदम खान ने सम्राट अकबर को विजय की सूचना भेजी, जिसमें केवल कुछ हाथी थे, और शेष सारा माल स्वयं अपने पास रख लिया।
अकबर को यह धृष्टता बुरी लगी और वह स्वयं सारंगपुर की ओर अग्रसर हुआ। उसने आदम खान को अचानक घेर लिया, जिसने अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और लूट का माल भी अपने नाम कर लिया। बाद में, उसे मालवा से वापस बुला लिया गया और कमान पीर मोहम्मद खान को सौंप दी गई। आदम खान को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया । [ 2 ]
"बिलकुल ।" मैंने कहा "उसके बाद की कथा तो सबको पता है । " अजय ने खुश होकर कहा .." मुझे तो पता है मैंने रानी रूपमती पिक्चर बहुत पहले देखी थी .."
" भैया .." मैंने अजय को चुप किया .." मैं फ़िल्मी कथा की नहीं इतिहास कथा की बात कर रहा हूँ । उसके बाद की कथा संक्षेप में यह है कि फिर मालवा में अकबर और उसके बेटों जहाँगीर, शाहजहाँ आदि का शासन रहा और उन्होंने मांडू की जगह उज्जैन को मालवा की राजधानी बना दिया ।
सत्रह सौ सात में औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात जैसे ही उत्तर में मुग़ल साम्राज्य का विघटन प्रारंभ हुआ यह क्षेत्र मराठों के कब्जे में आ गया। सत्रह सौ बत्तीस में मल्हार राव होलकर के नेतृत्व में मराठों ने यहाँ के मुगल गवर्नर को हटाकर अपनी सत्ता कायम कर ली । फिर मांडू इंदौर रियासत के अधीन रहा और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यह भारतीय पुरातत्व विभाग के अंडर में आ गया ।"
"ओके ।" अजय ने कहा " बात बिलकुल क्लियर हो गई मतलब सब पुराने मकान मालिक चौकीदार आदि सब मर गए लेकिन मांडू नहीं मरा । खैर और बताओ तुम लोगों ने वहाँ और क्या क्या देखा ?" जहाज महल
" देखने के लिए तो वहाँ बहुत कुछ था भाई ।" मैंने कहा " जहाज महल जिसे गयासुद्दीन खिलजी ने बनवाया था और जो दो झीलों के बीच किसी लंगर डाले जहाज की तरह दिखाई देता है ,
हिंडोला महल जो अपनी झुकी हुई दीवारों के कारण किसी झूले की तरह लगता है ,
अशर्फी महल जिसके बारे में कहा जाता है कि जहाँगीर अपनी गर्भवती बेगम नूरजहाँ को लेकर यहाँ आया था और उसे ऊपर तक चढाने के लिए उसने प्रोत्साहन स्वरूप हर सीढ़ी पर एक अशर्फी रखी थी ।SIDE VIEW
FRONT VIEW
फिर हमने देखा रानी रूपमती का महल ( रानी पर क्लिक कर ड्रोन से इस महल का विडिओ देखें ) जिसके ऊँचे बुर्ज से रानी रोज नर्मदा के दर्शन करती थी और उसके बाद ही भोजन ग्रहण करती थी । रानी रूपमती का महल
फिर बाज बहादुर का महल
| बाज बहादुर का महल |
,होशंगशाह का मकबरा
और जामी मस्जिद ।
| जामी मस्जिद |
| रीवा कुण्ड |
इतनी सारी इमारतें देखते हुए मुझे महसूस हुआ कि मांडू का इतिहास भले ही युद्धों का इतिहास रहा हो लेकिन मांडू के सभी शासकों में कला के प्रति प्रेम एक सामान्य गुण रहा । सभी शासकों ने इसे सुंदर बनाने के लिए विभिन्न इमारतों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया । इन्ही के प्रयत्नों का जीता जागता उदाहरण है आज का मांडू ।
मांडू के भव्य महल आज उजाड़ पड़े हैं । इन महलों को देखते हुए मैं सोचता रहा किसी ज़माने में यहाँ कितनी रौनक रही होगी । राग रंग की महफिलें, रंगबिरगे वस्त्रों में सजी रानियाँ, उनकी परिचारिकाएँ, और भी तमाम लोग, हर दिन उत्सव के समान लगता होगा । आज इन खाली पड़ी इमारतों को देखकर उस समय की गहमागहमी की कल्पना भी असंभव है ।
“ तुमने देखा था ना शरद, सारे महलों में सिर्फ दीवारें थीं और छत नहीं थी, समय के साथ वे महल खँडहर बनते गए .. शायद कुछ सालों बाद समाप्त भी हो जाएँगे , लेकिन सचमुच जब इन इमारतों में लोग रहते होंगे, कितना भव्य लगता होगा सब कुछ । इस शहर में जाने कितने तालाब , कुँए ,बावड़ियाँ ,सड़कें , आवासीय भवन ,हमाम ,मंदिर- मस्जिद ,और अतिथि गृह रहे होंगे । “ रवींद्र ने अतीत का एक चित्र खींचते हुए सबके सामने रखा ।
मैंने कहा ..” लेकिन मेरा मन उस प्रजा को देखने का हो रहा था जो उस दौरान उपस्थित रही होगी । उनकी क्या स्थिति रही होगी । रवीन्द्र ने कहा .. "उनकी स्थिति किसको पता, अब तक जो इतिहास लिखा गया है वह तो केवल राजाओं का इतिहास है, प्रजा के इतिहास से किसीको क्या लेना देना।"
अशोक ने अचानक ट्रैक चेंज किया " तुमने रानी रूपमती फिल्म देखी है ? " नहीं तो। " मैंने कहा " अरे वही जिसमें गाना है... आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं । इस फिल्म की कहानी इसी रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कथा पर आधारित है । कहते हैं कि रूपमती एक ब्राह्मण की बेटी थी जिस पर बाज बहादुर का दिल आ गया था और फिर उन दोनों के बीच प्रेम हो गया और उसे बाज बहादुर ने अपनी रानी बना लिया । रानी रूपमती केवल सुन्दर ही नहीं थी बल्कि वह विदूषी भी थी । उसने कई गीत रचे थे जो आज भी मालवा आंचल में गाये जाते हैं ।"
" बिलकुल सही" मैंने कहा "लेकिन रानी रूपमती का बहुत दर्दनाक अंत हुआ । पंद्रह सौ बासठ में जब अकबर के सिपहसालार आदम खान ने मांडू पर हमला किया बाजबहादुर को प्राण बचाकर चित्तौड़ भागना पड़ा । रानी रूपमती अकेली रह गई और उस पर आदम खां की बुरी नज़र पड़ गई । उसने उससे शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन इससे पहले की उसकी आबरू पर हमला हो रानी रूपमती ने अपनी अंगूठी में जड़ा हीरा निगल लिया और आदम खां के हाथ नहीं आई ।
"लेकिन यार इसका कोई प्रमाण नहीं है यह कहानी सच है या नहीं ।" रवींद्र ने कहा ।" भाई पुरातात्विक प्रमाण तो ऐसा कुछ नहीं है ।" अशोक ने कहा "लेकिन पंद्रह सौ निन्यानबे के एक लेखक अहमद-उल-उमरी तुर्कमान द्वारा लिखित एक विवरण के अंतर्गत यह कथा मिलती है ।"
"ठीक है भाई , रानी रूपमती का किस्सा छोड़ो अब हमारा आगे का किस्सा सुनो । " मैंने कहा । “ मांडू से निकलकर हम लोग धार पहुँचे । राजा भोज की नगरी धार । विद्या की देवी सरस्वती की नगरी धार । नगर प्रवेश करने से पूर्व ही जैन साहब हमें एक शिल्पकार से मिलवाने ले गए। यह देश के महान शिल्पकार फड़के जी की कार्यशाला थी ।
इमारत के बरामदे में ही अनेक शिल्पकार छेनी हथौड़े से पत्थरों को प्रतिमाओं का रूप दे रहे थे । उन्हें देखते ही मुझे अजंता एलोरा के शिल्पकारों की याद आई । आज फड़के जी नहीं हैं लेकिन उनके शिष्य उस कार्य को अन्जाम दे रहे हैं जिसकी वज़ह से हम अपने अतीत की कलाकृतियों पर गर्व करते हैं । फड़के जी द्वारा बनाई हुई कुछ मूर्तियाँ भी हमने देखीं ।
इसके पश्चात हम लोगों ने धार का म्यूज़ियम और भोजशाला देखी । इस स्थान पर वर्तमान में एक इस्लामिक धर्मस्थल है । कहते हैं पहले यहाँ सरस्वती की प्रतिमा थी जिसे मुस्लिम शासकों ने यहाँ से हटा दिया । रवींद्र ने कहा .. "वहाँ एक निशान भी था न ,जिसके बारे में कहते हैं कि वहाँ से सरस्वती प्रतिमा को उखाड़ दिया गया था ..हम लोगों को सुनने में यह बात बुरी लगी लेकिन इस देश का इतिहास ऐसा ही है ।
जिस धर्म का वर्चस्व रहा उसने अपने धर्म के अलावा अन्य धर्मों के विनाश का ही प्रयास किया । सत्ताधीशों की भी यही कोशिश रही कि सत्ता का जो धर्म है वही राज्य का भी धर्म हो । फिर भी राज्य हमेशा धर्म से ऊपर रहा है .. जिसका राज उसका धर्म, यही नीति रही है
लेकिन जनता हमेशा धर्म थोंपे जाने का विरोध करती है ।
जनता राज्य के धर्म या उसके आतंक को सीधे सीधे स्वीकार कर ले ऐसा न कभी हुआ है न कभी होगा इसलिए कि जनता हमेशा दमन का विरोध करती है और सत्ता के खिलाफ़ विद्रोह करती है । चल ठीक है आगे की कथा सुना ।"
मैंने रवींद्र की और प्रशंसा के भाव से देखा .. "हाँ तो इस तरह शाम हो चुकी थी । धार से निकल कर हमें इन्दौर जाना था । सुबह खाए पोहे और जलेबी के साम्राज्य का पतन हो चुका था, सो भूख इन्कलाब ज़िन्दाबाद के नारे लगा रही थी । बस स्टैन्ड पर बस रुकवाकर हम लोगों ने भोजन किया हालाँकि लन्च का समय बीत चुका था लेकिन इन्दौर पहुँचने तक भूख का मुकाबला करने का हम में साहस नहीं था ।
इंदौर पहुँचकर त्रिवेदी सर को उनके निवास पर छोड़ा और उज्जैन के लिए रवाना हो गए । रात के दस बज रहे थे , मैंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा उज्जैन के टॉवर की लाल बत्ती दूर से ही दिखाई दे रही थी । अचानक ऐसा लगा जैसे यह बस बहुत शोर मचा रही है । दिमाग़ जैसे सुन्न हो चला था । बस ने बस्ती में प्रवेश किया, स्कूटर, कारें, बस, साइकिलें, टैक्सियाँ अगल बगल से निकल रही थीं । राममिलन भाई ने आवाज़ लगाई, गाड़ी रोको, टॉवर आ गया । अगला स्टॉप था बस सौ मीटर पर शहीद पार्क । मैंने सभी साथियों को अभिवादन किया और अपना बैग लेकर नीचे उतर गया ।"
"विश्राम लॉज की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जाने क्यों लगा मुझे कि मैं अजंता या एलोरा की गुफाओं तक जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ । मुझे हँसी आई । मासिक किराये पर लिया हुआ मेरा कमरा भी तो एक गुफा की तरह ही है । समय के इस कालखंड में मैं इसमें रह रहा हूँ ।
मुझे नहीं पता कि मुझसे पहले इस कमरे में कौन रहता था और यह भी नहीं पता कि आनेवाले बरसों में कौन रहेगा ? हो सकता है भविष्य में यह कमरा भी नहीं रहे । एक दिन विश्राम लॉज की यह इमारत भी जर्जर होकर गिर जाए या गिरा दी जाए और इसकी जगह कोई दफ्तर या बाज़ार बन जाए । आखिर यह इमारतें यह सड़कें सब मनुष्यों ने ही तो बनाई हैं ..मनुष्यों की भांति एक न एक दिन इन्हें भी नष्ट होना ही है ।"
मेरी यात्रा कथा समाप्त हो चुकी थी । मैंने अपनी डायरी बंद कर दी और एक नज़र अपने साथियों पर डाली ... सारे लोग ऊंघ रहे थे । इतनी भी शक्ति नहीं थी किसी में कि शुभरात्रि कह सकें ।
*शरद कोकास*
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