📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
*युवा पुरातत्ववेत्ताओं की टीम दौलताबाद पहुँच चुकी है शरारतें भी चल रही है महेश ने मशालची को बातों में उलझाकर नीचे ही रोक दिया और अब छात्रों की टीम किले के ऊपर आ चुकी है दौलताबाद के बाद अब एलोरा की बारी है एलोरा बहुत प्रसिद्ध जगह है यहाँ की यात्रा में आपको आनंद आएगा।*
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*भाग 32*
*एलोरा कहें या वेरुल एक ही बात है*
कुछ देर बाद अशोक को ख्याल आया... "भाया तूने अपनी डायरी क्यों बंद कर दी? अभी दौलताबाद का किस्सा तो बचा है ना ?" बचा तो है .." मैंने कहा "लेकिन मुझे लगा कि अब आप लोगों का सुनने का मूड नहीं है तो मैंने पढ़ना बंद कर दिया ।"
" अरे ! कौन कहता है कि हमारा मूड नहीं है हम तो आज रात भर यह किस्सा सुनने के मूड में हैं । " किशोर भैया जो काफी देर से खामोश थे उठकर बोले " तुम बता रहे थे कि महेश ने गाइड को मज़ा चखाने के लिए आधे लोगों को मशालची के साथ पहले दौलताबाद के किले के ऊपर ले जाने का प्लान बनाया था ।"
"सिर्फ गाइड को मज़ा चखाने वाली बात नहीं थी किशोर भैया ।" अशोक ने मेरी डायरी मुझे थमाते हुए कहा "वो अभी रंगीन परिधान वाली लड़कियों की बात की थी ना शरद ने ..हूँ.. मैं सब समझौ हूँ उन्ही के चक्कर में उसने यह प्लान बनाया था ।"
" भाई.." मुझे महेश का चरित्र प्रमाणपत्र जारी करना था .." अब बेचारे महेश ने इतनी मेहनत की थी तो उसका भी तो कुछ हक़ बनता था, और फिर स्त्रियों का सान्निध्य किसे अच्छा नहीं लगता ..हालाँकि महेश से ज़्यादा शर्मीला कौन होगा ..खैर आगे की कथा सुनो ।"
मैंने डायरी का पन्ना खोलकर अवचेतन में स्थित विराम चिन्ह को याद किया । " पहाड़ी पर बने दौलताबाद के उस किले में सीढ़ियाँ भी कम नहीं थीं, नीचे बेस से यहाँ तक आते आते अधिकांश महिलाएँ थक गईं थीं लेकिन उत्साह उनका कम नहीं हुआ था । इतनी देर में हम लोगों से उनकी जान पहचान हो चुकी थी और वे इस बात से बहुत प्रभावित थीं कि हम लोग इतिहास के छात्र हैं और एजुकेशन टूर के लिए यहाँ आए हैं ।
हमारे साथ मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक का होना हमें अतिरिक्त महत्व प्रदान कर रहा था । हम लोगों ने उनसे बातचीत करते हुए इस किले के इतिहास के साथ साथ सन बारह सौ से पंद्रह सौ छब्बीस तक के मध्यकालीन इतिहास दिल्ली सल्तनत,गुलाम वंश,खिलजी वंश, तुगलक वंश , सैय्यद वंश, लोदी वंश, तथा दक्षिण के अहोम राज्य, रेड्डी राज्य, विजयनगर साम्राज्य, गजपति राज्य और दक्खिन सल्तनत आदि विभिन्न वंशों के शासन और बाबर के आगमन के बाद के मुगलकालीन इतिहास से भी उनका परिचय कराया । "
"हमारे पास वह जानकारी थी जो अक्सर गाइडों के पास नहीं होती है, जैसे उस काल की सामाजिक आर्थिक स्थिति और अन्य समीपवर्ती राज्यों की स्थिति का विवरण आदि ।
गाइड प्रोफेशनल होते हैं और केवल उतनी ही जानकारी उनके पास होती है जिसे सीमित समय में वे पर्यटकों को बता सकें । आजकल तो वे इतिहास के बारे में जानकारी न देकर यह बताने लगे हैं कि पिछले दिनों कौन कौन से राजनेता अथवा फ़िल्मी लोग यह स्थान देखने आये अथवा कहाँ कहाँ फिल्मों की शूटिंग हुई ।
हमने इतिहास सम्बन्धी जो बातें उन्हें बताई वे उनके गाइड ने उन्हें नहीं बताई थीं सो हमारी बातों का उनपर बहुत प्रभाव पड़ा । महेश और भाई राममिलन बीच बीच में सबका मनोरंजन कर ही रहे थे । राममिलन भैया के बारे में हमने उन्हें बताया कि वे वातावरण को सहज बनाने के लिए इस तरह के हँसी मज़ाक ज़रूर करते हैं लेकिन वास्तव में वे बहुत गंभीर स्कॉलर हैं ।
राममिलन भैया वैसे भी उस दिन चुस्त पैंट और अपनी इलाहाबादी स्टाइल के साथ काले चश्मे में किसी स्कॉलर से कम नहीं लग रहे थे ।" इतना कहकर मैंने राममिलन भैया की ओर देखा अपनी प्रशंसा सुनकर वे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ..मैंने उनकी ओर देखकर हाथ जोड़े ,उन्होंने आशीर्वाद की मुद्रा में अपना हाथ ऊपर उठाया और आगे पढ़ने का संकेत किया ।
मैंने फिर अपनी नज़रें डायरी में गड़ा दीं । " महिलाओं का वह दल बहुत गौर से हम लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनके भावहीन चेहरे देखकर ऐसा भी लग रहा था कि देश के तमाम पढ़े लिखे सामान्य लोगों की तरह इतिहास में उनकी भी रूचि नहीं है । देश के सभी पढ़े लिखे नागरिक स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में इतिहास पढ़ते अवश्य है लेकिन वह अध्ययन केवल परीक्षा पास करने तक ही सीमित रहता है ।
कालांतर में वे उस इतिहास को भी भूल जाते हैं और पुराण कथाओं और किंवदंतियों को इतिहास समझने लगते हैं । इसी बात का फायदा उठाकर धर्म और राजनीती के मठाधीश उन्हें उस इतिहास को मानने के लिए बाध्य कर देते हैं जिससे उन्हें धार्मिक अथवा राजनीतिक लाभ पहुँचता है । हमें इस बात का अफ़सोस हो रहा था कि यदि देश के सामान्य नागरिक इतिहास में रूचि लेकर उसे भलीभांति पढ़ते तो आज इतिहास को लेकर सत्ता द्वारा जनता को बरगलाने की जो कोशिश की जा रही है उसकी नौबत ही नहीं आती ।"
"राममिलन भाई के कानों में उनकी प्रशंसा के शब्द पड़ चुके थे और वे काफी प्रसन्न थे । इतिहास के रूखे वर्णन के बीच हास्यबोध उत्पन्न करने के उद्देश्य से वे महेश की ओर मुख़ातिब हुए और उन्होंने एक सवाल पूछा " का हो महेस, ई तुगलक पगलवा ने इत्ती ऊँची मीनार काहे बनाई रही ?"
हमेशा की तरह महेश ने जवाब दिया ...“ अरे इतनी सी बात नहीं जानते, जैसे आज के जमाने में लोग प्रेम करते हैं वैसे उस जमाने में भी करते थे । उनमे से कुछ सफल होते थे और कुछ असफल । अब आज की तरह तो प्रेमी होते नहीं थे कि एक प्रेम ख़तम हो जाए तो दूसरी प्रेमिका ढूंढली सो कुछ प्रेमी आत्महत्या भी कर लेते थे । फिर उस समय आत्महत्या के लिए अधिक साधन भी नहीं थे ।
वैसे भी दिल टूटने के बाद आदमी मरने के लिए कहाँ जगह तलाश करता फिरे सो मुहम्मद बिन तुगलक ने उनके लिए यह व्यवस्था कर दी थी । बस इसी मीनार पर चढ़ते थे और अपनी प्रेमिका का नाम लेकर नीचे कूद जाते थे ।" हमने देखा महेश की इस गप्प पर कहकहे लगाने में इस बार महिलाओं का दल भी हमारे साथ था ।"
हँसी का ज़लज़ला हमारे तम्बू में भी आ चुका था । अबकी बार मेरी बात सुनकर राममिलन भैया भी सबके साथ पेट पकड़कर हँसने में शामिल हो गए .. उनकी हँसी रुकी तो उन्होंने कहा " हमका समझ में आ गया था कि ई महेस की बदमासी है लेकिन इतनी बढ़िया इस्टाइल से वो सुना रहा था जैसे बिलकुल सच्ची बात बता रहा हो .. खैर तुमने बहुतै बढ़िया लिखा है सरदवा ..सच्ची ..मजा आ गया ..। चलो आगे का लेखा सुनाओ ।"
मैंने पुनः राममिलन भैया का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए हाथ जोड़े और आगे का डायरी वाचन प्रारम्भ किया " इस बीच पुणे मुंबई के उस पर्यटक दल का दूसरा हिस्सा और उनके साथ वह गाइड भी वहाँ पहुँच चुका था । उसने कोशिश की कि दोनों दलों को एक साथ ले आए लेकिन महिलाओं और बच्चों का दल हम लोगों के सानिध्य में प्रसन्न था और ऐसा आशय उन्होंने व्यक्त भी कर दिया ।
बहरहाल किले की ऊपरी सतह पर पड़ी कुछ तोपें और अन्य अवशेष देख कर हम लोग नीचे आ गए । बस के पास पहुँचकर सबसे पहले हम लोगों ने गन्ने का रस पिया और पसीने की वज़ह से जो उर्जा का क्षय हुआ था ग्लूकोज से उसे चार्ज किया । अन्य पर्यटन स्थलों की तरह वहाँ भी कुछ दुकानें सज गई थीं जिनमें कृत्रिम मोतियों की मालाएँ और ऐसी ही सामग्री बिक रही थी । मैंने छोटी बहन के सीमा के लिए एक माला और भाई शेखर के लिए एक चित्रों की किताब वहाँ से खरीदी ।
दौलताबाद फ़ोर्ट से जब हम लोगों ने एलोरा के लिए प्रस्थान किया तो सुबह के दस बज रहे थे । एलोरा का रास्ता महज़ एक घन्टे का था । मैं तमाम रास्ते चुपचाप पिछली सीट पर बैठा रहा और खिड़की से बाहर के दृश्य देखता रहा ।
मेरे मन में विचार आया कि उन दिनों जब यहाँ कुछ भी नहीं था न रास्ते थे, न बस्ती थी किन लोगों के मन में यह विचार आया होगा कि इस जगह पर किले बसाए जाएँ, गुफाएँ तलाशी जाएँ, चट्टानों में मूर्तियाँ और मन्दिर तराशे जाएँ । आखिर किस बात ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया होगा ।
मैंने महसूस किया कि सारे छात्र मस्ती में लगे हैं और इस बात से उन्हें कोई सरोकार नहीं है कि मैं क्या सोच रहा हूँ । अचानक रवीन्द्र की आवाज़ आई “ अरे शरद तुम यहीं हो हमें लगा तुम उस बस में एलोरा निकल गए । “मैं उसका आशय समझ गया था, मैंने कहा “ अरे भाई मुझसे कोई खतरा नहीं है, यह बात तुम महेश के बारे में कहते तो कुछ बात भी होती । “ उसने कहा “ क्या पता आखिर हो तो तुम महेश के दोस्त । चोर चोर ....।“ “ बस बस ..” मैंने कहा “ ..पुराना हो गया ।
“बेटा .. मुझे सब पता है ..।” रवींद्र ने डायरी पाठ के बीच व्यवधान उपस्थित करते हुए कहा । मैं समझ गया, एक ब्रेक का टाइम हो गया है । “ क्या पता है ? “ मैंने पूछा । “मैनू पता है यार तू उस पुणे वाली भाभी में बड़ा इंटेरेस्ट ले रहा था, जाने क्या क्या कह रहा था मराठी में .. अब हमें मराठी आती तो हम बताते ।“ रवींद्र ने कहा ।
“कुछ नहीं यार मैं उनसे देसी चने की मिसल बनाने की विधि पूछ रहा था ।“ मैंने रवीन्द्र की बात का जवाब दिया । रवीन्द्र हंसने लगा .... “ छोड़ यार, मैं तो मजाक कर रहा था , मुझे पता है, स्त्रियों का सम्मान करना तो पुरुषों को तुझसे सीखना चाहिए । तेरी कविताएँ पढ़कर कोई भी जान सकता है कि तू उनके दुःख - दर्द और सामाजिक स्थिति के बारे में कितनी गहराई से सोचता है । देखना तेरी कविता एक दिन इसी स्वर के लिए प्रसिद्ध होगी । “
“ठीक है ठीक है ...” मैंने कहा “मेरी कविताओं में नारीवादी स्वर पर चर्चा बाद में करेंगे ..आगे की डायरी सुनाऊं ?" " रुक जा भाई थोड़ा हल्के -भारी हो लें । ब्लेडर फुल्ल हो गया है ।" अजय ने कहा । हम सब उठे और तम्बू के पीछे मैदान में जाकर वातावरण में थोड़ी नमी उत्पन्न करने के पश्चात पुनः अपनी रजाइयों में घुस गए ।
“चल भाई आगे सुना इंटरवल ख़तम ।“ अशोक ने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा । मैंने आगे पढ़ना शुरू किया ... "इतनी देर में हमारी बस एलोरा पहुँच गई । प्रवेश द्वार के बाहर ढेर सारी दुकानें थीं जहाँ किसिम किसिम की सामग्री बिक रही थी । हम लोगों ने एलोरा की जानकारी देने वाली चित्रमय पुस्तकें वहाँ से खरीदी । फिर हम लोगों ने एक ओर से गुफाएँ देखना प्रारम्भ किया । जैसे जैसे हम लोग यह गुफाएँ देखते गए इसकी भव्यता का अहसास हमें होता गया । छत पर सिंह इस तस्वीर में भी हैं
एलोरा का मूल नाम ‘वेरुल‘ है और मराठी में इसे ‘वेरुल च्या लेण्या‘ कहते हैं । यह बौद्ध, हिन्दू व जैन स्थापत्य का बेहतरीन नमूना है । यहाँ बारह बौद्ध गुफाएँ, सत्रह हिन्दू गुफाएँ और पाँच जैन गुफाएं हैं । इनमें से अधिकांश गुफाएँ राष्ट्रकूट वंश के शासकों द्वारा बनाई गईं है और इनका निर्माण काल छह सौ से एक हज़ार ईसवी माना जाता है । गुफा क्रमांक पंद्रह में राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग का एक अभिलेख भी मिला है जो 757 ईसवी का है । ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म की गुफाएँ राष्ट्रकूटों के समय ही बनीं लेकिन जैन गुफाओं का निर्माण काल राष्ट्रकूटों के बाद का है । 
1958 की इस तस्वीर में मेरे पिता जगमोहन कोकास
एलोरा क्षेत्र प्रारंभ से ही व्यापारी मार्ग से जुड़ा था इसलिए यह गुफाएँ अजंता की गुफाओं की तरह लुप्त नहीं हुईं । मुगलों के समय और अंग्रेज़ों के समय भी लोग इन्हें देखने आते रहे । उन्नीसवीं शताब्दी में ये होलकरों के नियंत्रण में थी, फिर हैदराबाद के निज़ाम के और स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंडर में आ गईं । सह्याद्री पर्वतमाला
इनकी विशेषता यह है कि यह गुफाएँ बेसाल्ट की चट्टानों को काटकर बनाई गईं है जो कि सह्याद्री पर्वतमाला का एक हिस्सा है । यह चट्टानें करोड़ों साल पहले ज्वालामुखी का लावा बहने से बनी थीं । इन्हें डेक्कन ट्रैप भी कहा जाता है । ट्रैप शब्द स्केंडिनेविया से आया है जिसका सम्बन्ध ज्वालामुखीय निक्षेपों की सीढ़ीनुमा संरचना से है । अपक्षय होने पर चट्टानों के शिखर सपाट हो जाते हैं और सीढ़ीनुमा बन जाते हैं । डेक्कन ट्रैप
“ ए भाई, यह सब कोर्स में हमने भी पढ़ा है कुछ नई बात हो तो बताओ “ अजय ने ऊब कर कहा । “वह टूरिस्ट बस वहाँ पहुँची या नहीं ?“ अजय की बात सुनकर मैंने एक ज़ोर का ठहाका लगाया …”अरे हाँ यह बताना तो मैं भूल ही गया । इस बीच वे लोग भी वहाँ पहुँच चुके थे और लगभग अलग अलग समूहों में हम लोगों के साथ ही एलोरा की गुफायें देख रहे थे ।
उनका गाइड उन्हें हम लोगों के भरोसे छोड़कर जाने कहाँ गायब हो जाता था और फिर कुछ देर बाद प्रकट हो जाता था । हम लोगों की उन लोगों से इस बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी और हमारे आइक्नोग्राफ़ी के ज्ञान से वे लोग काफ़ी प्रभावित दिखाई दे रहे थे । जब हम लोग किसी मूर्ति के सामने खड़े होकर उसके लक्षणों पर बात करते वे लोग इसे बहुत ध्यान से सुनते । इतनी अच्छी और तकनीकी जानकारी तो कोई गाइड उन्हें नहीं दे सकता था ।
एक चट्टान से बना है कैलाश मंदिर
“और वो तेरा त्रिवेदी जी वाला किस्सा तो सुना ।“ रवीन्द्र ने कहा । “अरे हाँ, वह वाकया तो बहुत ही मज़ेदार था । हम लोग गुफा क्रमांक सोलह में कैलाश मंदिर के परिसर में थे । इस मंदिर के बारे में यह बात उल्लेखनीय है कि यह बेसाल्ट पत्थर की एक ही पहाड़ी को तराश कर बनाया गया है । “
“ अरे वाह, कितनी अद्भुत बात है ।“ अजय ने कहा “मतलब एक मज़दूर पहाड़ी की चोटी पर बैठा होगा, उसने वहाँ से चट्टान को काटना प्रारंभ किया होगा और काटते काटते उसे मंदिर की शक्ल दे डाली ।“ मैंने कहा “ सिर्फ़ इतना ही नहीं फिर उसके भीतर मूर्तियों को भी तराशा और गलियारे बनाए उसमें विभिन्न पैनल बनाए ।
यह कम मेहनत का काम नहीं है, हथौड़े की एक ग़लत चोट से सब कुछ बिगड़ सकता था और पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता था । इसके निर्माता के रूप में नाम भले ही राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम का हो का हो लेकिन असली मेहनत तो उन शिल्पकारों की है जिन्होंने इसे बनाया ।"
"लेकिन यार तुम कह रहे हो एक मजदूर चट्टान पर बैठा और उसे काटना शुरू किया ..आखिर एक मजदूर ने यह सब अकेले कैसे बनाया होगा? अजय ने बहुत गंभीरता से कहा । रवींद्र ने अपने माथे पर हाथ पटका और कहा " तू रहेगा भाभी का भैया ..अरे उसने लाक्षणिक अर्थ में ऐसा कहा इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इतना बड़ा मंदिर एक मजदूर ने बनाया होगा इसमें तो सैकड़ों मजदूर लगे ओंगे जाने कितने बरसों तक यह काम चला होगा ता जाकर इतना सुन्दर मंदिर बन पाया है .. चल बाहर टहल कर आते हैं तेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा ।
हम लोग उठकर बाहर आ गए ।बाहर मौसम बहुत ही सुहावना था। अँधेरा काफी था लेकिन चाँद अभी निकला नही था या शायद डूब गया था ।बहुत दिनों से हम लोगों ने चाँद को ठीक से देखा नहीं था न ही चाँद के बहाने टीले पर गए थे ।दरअसल आज से शुक्ल पक्ष दोबारा शुरू हुआ था और यह चाँद प्रतिपदा या दूज का चाँद था जो न जाने कब आता है और कब जाता है पता ही नहीं चलता ।हम लोग चाँद को नदारद पाकर फिर वापस अपने तम्बू में लौट आये ।
*शरद कोकास*
- ऊपर से नीचे का निर्माण: अधिकांश मंदिर नीचे से ऊपर बनाए जाते हैं, लेकिन यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे एक विशाल पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर तराशा गया है। [1, 2]
- एक ही चट्टान: इसे अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर नहीं बनाया गया, बल्कि पूरी संरचना को एक ही कठोर बेसाल्ट चट्टान से तराश कर बाहर निकाला गया है। [1, 2]
- इंजीनियरिंग का चमत्कार: इसे बनाने में बिना किसी आधुनिक मशीन के केवल छेनी और हथौड़े की मदद से लगभग \(400,000\) टन पत्थर बाहर निकाला गया था। [1, 2, 3, 4]
- निर्माण का समय: इस भव्य मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम (757-783 ईस्वी) के शासनकाल में हुआ था। [1, 2]
- आकार: यह मंदिर करीब \(100\) फीट ऊँचा, \(195\) फीट लंबा और \(145\) फीट चौड़ा है। [1]
- कलाकारी: इसके प्रांगण, मुख्य गर्भगृह और दीवारों पर रामायण, महाभारत और भगवान शिव के कई प्रसंगों को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। [1, 2]
- मलबा कहाँ गया?: निर्माण के दौरान चट्टान काटकर निकाले गए लगभग \(4,000\) लाख किलो (4 लाख टन) पत्थर का कोई मलबा आज आस-पास मौजूद नहीं है, जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा रहस्य है। [1, 2]
- वास्तु संतुलन: इसे इतनी सटीक ज्यामितीय गणना (Geometric calculations) के साथ बनाया गया है कि यह 1200 से अधिक वर्षों से भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए सुरक्षित खड़ा है। [1]

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