सोमवार, 8 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -दूसरा दिन-छः


प्रलय की कथा
कुछ विराम के पश्चात मैने फिर बात शुरू की “ लेकिन तीसरी शताब्दी ईसापूर्व तक इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली ।दलदल सुखाने और सिंचाई के लिये यहाँ नहरें खोदी गईं,खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । बाढ की वज़ह से गाद युक्त मिट्टी बहुत उपजाऊ हो गई थी । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैय्यार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें थीं । नगरों मे शिल्पी थे और ऊन खजूर अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “
“मतलब यह कि मेसोपोटमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गये?”रवीन्द्र ने कहा । “हाँ” मैने बताया ,लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गये,और शेष वैसे ही विपन्न रहे।“ इस बीच अजय ने सवाल किया “ कहते हैं प्रलय की मूल कथा भी यहीं की है? “ हाँ” मैने बताया “ उस समय यहाँ बाढ़ बहुत आती थी शायद उसीके चलते यहाँ इस कथा ने जन्म लिया । कहते हैं कि शुरुआत में यह पृथ्वी जल से ढंकी हुई थी । देवताओं का प्रयास था कि इसे जल से अलग किया जाये लेकिन एक दैत्य ऐसा होने से रोक रहा था । तब देवाधिपति ने उसे मार दिया और उसके शरीर के एक भाग से आकाश व तारों का निर्माण किया और दूसरे भाग से ज़मीन का । फिर ज़मीन पर पेड़ पौधे उगाये और इंसान बसाये। “
“लेकिन बृह्मांड ,तारे ,पृथ्वी इस तरह तो नहीं बने थे यह तो कोरी कल्पना है ।“अजय ने कहा ।“तो मैने पहले ही कहा कि यह कहानी है, हमारे यहाँ भी इस तरह की कितनी ही कहानियाँ हैं ।“ मैने कहा “ अरे उस समय मनुष्य के पास जितना ज्ञान था उस आधार पर उसने यह कथायें रचीं कुछ कल्पनायें आगे जाकर सत्य हो गईं और कुछ कल्पनाएँ ही रह गईं ।“ “ जैसे कि आज से चार सौ साल पहले तक यही सत्य था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है । अगर गेलेलियो और ब्रूनो जैसे वैज्ञानिक नही होते तो यही सत्य माना जाता “ रवीन्द्र ने कहा । “ हाँ ये लोग नहीं होते तो कोई और होता लेकिन सच तो एक न एक दिन सामने आता ही है ।खैर आगे की कहानी सुनो ..तो हुआ यह कि एक बार देवता मनुष्य से नाराज़ हो गये,उन्होनें तय किया कि पृथ्वी को पानी में डुबो दिया जाये । लेकिन जल देवता ने यह खबर लीक कर दी उसने यह बात सरकंडो को बता दी ,और सरकंडो ने झोपडी के मालिक को क्योंकि झोपडी सरकंडों से बनी थी। फिर क्या था इससे पहले कि प्रलय हो उसने एक बड़ी नाव बनाई उसमे अपने परिवार को,कुछ शिल्पकारों को व पशु पक्षियों को बिठा लिया। फिर तयशुदा दिन बरसात हुई ,नाव में बैठे लोगों के अलावा सारे डूब गये । बारिश थमने पर सबसे पहले कौवा उड़ा उसने ज़मीन का पता लगाया और फिर दुनिया आगे बढ़ी । “ ‘यार यह कहानी तो हर धर्म में है “ अजय ने कहा । ‘ बिलकुल “ मैने जवाब दिया ।“ मेसोपोटामिया से यह कथा पूरी दुनिया में पहुंची ,देवी-देवताओं का भय दिखाकर पुरोहितों ने लोगों को डराया धमकाया ,यदि वे देवताओं की बात नहीं मानेंगे तो फिर एक दिन प्रलय होगा ।“
“लेकिन मै फिर कह रहा हूँ यह इतिहास नहीं है ।“ अजय तर्क के मूड में था ।“ हाँ ठीक है तुम्हारा कहना” मैने कहा “ यह इतिहास नहीं है , लेकिन अफसोस यही है कि पढ़े-लिखे लोग भी पुराणकथाओं को इतिहास मान लेते हैं । इसिलिये इतिहासकारों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे आम लोगों को इतिहास की वास्तविकता बतायें और बतायें कि इतिहास और कहानी में क्या फर्क है.वरना लोग झूठ को ही हमेशा सच समझते रहेंगे । गोयबल्स की मशहूर उक्ति है झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है ।”
आपका शरद कोकास

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिलचस्प शरद भाई। मेरा प्रिय विषय है और इसे ही मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं। याद रखें, मोरपंख से बुकमार्क किया है इसे मैने:)
    कल कई दिनों बाद शायद साप्ताहिक अवकाश मिले। प्रिंट निकाल कर पढ़ता हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुझे तो हजारी प्रसाद द्विवेदी की शैली का आभास हो रहा है। बहुत बढ़िया । कथा की धीमी प्रगति के कारण उतावलापन जरूर छ्लक रहा है।

    उत्तर देंहटाएं