गुरुवार, 18 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-एक

नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा
अगला दिन हम लोगों के लिये काम की शुरुआत का पहला दिन था । डॉ.वाकणकर अपना चोगा नुमा लम्बा सा कोट पहने ट्रेंच पर उपस्थित थे । उनके दोनों हाथ उस कोट की लम्बी जेबों के भीतर थे । मैं उन हाथों को देखना चाहता था जो हाथ इतिहास में गहराई तक उतरने का हौसला रखते थे । सर के कोट को हम लोग बहुत ध्यान से देख रहे थे कि अचानक रवीन्द्र ने मेरे कान में बताना शुरू किया “सर जब भीम बैठका की गुफाओं में शैलचित्रों की खोज करने गये थे ना तब इसी कोट की जेब में कच्चे आलू लेकर गये थे। वे महीने भर उस जंगल में रहे किसी साधु की कुटिया मे उन्होनें डेरा जमा लिया था । वे दिन दिन भर जंगल में भटककर रॉक पेंटिंग्स खोजते थे और भूख लगने पर आलू भूनकर खा लिया करते थे । बढ़ी दाढ़ी ,अजीब सा हुलिया, यहाँ तक कि लोग उन्हे ‘आलू वाले बाबा ‘ कहकर पुकारने लगे थे । ऐसी होती है काम की लगन । “ “क्या खुसुर-पुसुर चल रही है रे दुष्टों..? “डॉ.वाकणकर ने हम लोगों को वार्तालाप में मग्न देख कर पूछा । उनके दो प्रिय सम्बोधन थे,सज्जनों और दुष्टों जिनका अभिप्राय हम उनके बुलाने के तरीके से समझ जाते थे । हमारे दिमाग में कोई शरारत कुलबुला रही है यह सोचकर उन्होने हमें दुष्टों सम्बोधित किया था । “कुछ नहीं सर” रवीन्द्र ने कहा “ हम लोग आपका कोट देख रहे थे ।” “ऐसा क्या है इस कोट में “उन्होनें ध्यान से अपना कोट देखा और कहा “ चलो आज तुम लोगों का परिचय उत्खनन में काम आनेवाले औज़ारों से करवाते हैं । किताबों मे चित्र तो तुम लोग देख ही चुके हो ।देखो यह कुदाल है , खुदाई की शुरुआत इसीसे होती है और यह खुरपी , प्रारम्भिक खुदाई के पश्चात इसका प्रयोग समय समय पर किया जाता है ताकि कुदाल के आघात से कोई वस्तु टूट ना जाये । फावड़ों से मिट्टी हटाई जाती है घमेलों में भरकर और यह ब्रश है उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं को इससे साफ किया जाता है । किसी परत में किसी अवशेष का ऊपरी हिस्सा दिखाई देने पर उसे बाहर निकालने के लिये भी ब्रश का उपयोग किया जाता है । यह ब्लोअर है गाड़ी के भोंपू जैसा ,इसे दबाने से हवा निकलती है ,जहाँ ब्रश से भी नुकसान की सम्भावना हो वहाँ इसका उपयोग करते हैं । और भी बहुत से टूल्स हैं नापने के लिये टेप ,कपड़े की थैलियाँ ,मार्क करने के लिये पेन ,चित्र के लिये कैमरा ।“ हम लोग सोच रहे थे इतने साधारण से औज़ार ? पुरातत्ववेत्ता क्या इन्ही से ज़मीन के नीचे दबा इतिहास खोज कर निकालते हैं? “बाकी सब टूल्स का उपयोग तो तुम लोग देख देख कर समझ जाओगे ।“ सर ने हम लोगों के विचार जैसे पढ़ लिये थे । फिर जालियों की ओर इशारा करते हुए कहा “जैसे वो देखो अलग अलग मोटी –पतली जालियों वाली छन्नियाँ । निखात से निकली मिट्टी फेंकने से पहले इनमें छानना ज़रूरी होता है ।“ “और सर अगर बगैर छाने फैंक दे तो ?” राममिलन ने अपनी सहजता में सवाल किया । “ अरे दुष्ट! और कहीं उसके साथ नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा भी फिका गया तो ? डॉ. वाकणकर ने कहा । राममिलन ने कहा “ तब तो साहब ऊ शाहजहाँ की आत्मा हमें माफ नहीं करेगी ।“ ” अरे पंडित जी.. शाहजहाँ की नहीं जहाँगीर की “ किशोर त्रिवेदी ने राममिलन के स्टेटमेंट को सुधारते हुए कहा कहा । किशोर उसी दिन सुबह सुबह दंगवाड़ा पहुंचा था । राममिलन किशोर का इशारा समझ गया और ज़ोर का अट्टहास करते हुए कहा “ऐसन है भैया,ऊ जमाने में नहीं चलता होगा ई जमाने में तो सबै चलता है किसीकी लुगाई का नाम किसी के भी साथ जोड़ दो ।“ हम लोगों ने देखा सर मज़दूरों के साथ बातचीत में मशगूल थे और हमारी बकवास पर उनका ध्यान नहीं था ।
आपका शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाकणकरजी का केवल नाम सुन रखा है क्योंकि मैं उज्जैन से हूँ और वे भी, बस अब उनके नाम का एक भवन और म्य़ूजियम उज्जैन में है और हमें यह पता है कि वे बहुत ही बड़े पुरात्त्ववेत्ता थे। कुछ जानकारी आपके चिठ्ठे के माध्यम से मिली और भी देते रहिये।

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  2. बहुत सुंदर लेख ओर जानकारी दी आप ने इस नुरजहां के हवाले से

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  3. Facebook khul nahin raha aajkal. Aapne jis chitra ke bare mein pucha hai, vo Jhadkhand ka hai. Geological fieldwork mein gaya tha is jagah.

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  4. Facebook khul nahin raha aajkal. Aapne jis chitra ke bare mein pucha hai, vo Jhadkhand ka hai. Geological fieldwork mein gaya tha is jagah.

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