बुधवार, 3 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-पाँच

बेबीलोन यानि बेबी को लोन ?

ठंड के दिन हैं और अन्धेरा जल्दी घिरने लगा है । कितना अच्छा लगता है पेट भर कर भोजन करने के बाद रज़ाई में घुसकर गप्पें मारना आज की रात हम लोगों को मेसोपोटेमिया या प्राचीन सुमेरिया की सैर के लिये जाना था हम लोग रज़ाई ओढकर बैठ गये प्राचीन विश्व का एक नक्शा मैने अपने सामने फैला लिया नक्शे के साथ इतिहास पढ़ते हुए एक एक घटना और स्थान मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। रवीन्द्र से कहा मैने “देखो रवीन्द्र, यह है पश्चिम एशिया का क्षेत्र वर्तमान में जहाँ इराक और कुवैत है यहीं था मेसोपोटेमिया। यहीं दज़ला और फरात नदियाँ बहती हैं । इन नदियों का उद्गम तो काकेशिया के दक्षिण में स्थित पहाड़ों से हुआ है और अंत फारस की खाड़ी में होता है लेकिन इनके मध्य व निचले भागों में स्थित प्रदेश को प्राचीन निवासियों ने “मेसोपोटेमिया “ अर्थात नदियों के बीच का प्रदेश या दोआब कहा । यहीं फरात नदी के किनारे बेबीलोन नामक एक प्रसिद्ध शहर था जिसे बाबुल भी कहते हैं ।
भैया राममिलन काफी देर से चुप बैठे मेरी बातें सुन रहे थे अचानक मैने उनकी ओर देखा तो वे बोल उठे “ का हो , ई बेबीलोन में बैंक ने कौनो बेबी- वेबी को लोन दिया था का ? मैने हथेली से अपना माथा पीटते हुए कहा “भैया इस बेबीलोन का अंग्रेजी के बेबी और लोन से कोई सम्बन्ध नहीं है ।“ भैया राममिलनवा पर लेकिन कोई असर नहीं पड़ा वे अपनी रौ में बोले..”वैसे भी बैंक को का ज़रुरत पड़ी थी बेबी को लोन देने की अरे ई बड़े लोग बेबी क्या अपन कुत्ता बिल्ली के नाम से भी लोन ले लेते हैं ।“
मैने राममिलन को उंगली से चुप रहने का इशारा किया और आगे बात बढाई..”बेबीलोन के हैंगिंग गार्डन प्रसिद्ध हैं । यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन हुआ जिससे अनेक प्राचीन सभ्यताओं का पता चला । सातवीं-छठवीं सहस्त्राब्दी ईसापूर्व में यहाँ कुदाल से खेती का प्रारम्भ हो चुका था और यहाँ के निवासी भेड़ बकरियाँ व गाय पालने लग गये थे ।वे दलदल में उगने वाले सरकंडों से और मिट्टी से अपने घर बनाते थे।“ “ और खाना खाकर आराम से सो जाते थे “अजय जोशी ने एक लम्बी उबासी लते हुए कहा और गर्दन तक रज़ाई खींचकर लम्बा हो गया ।
“ नहीं भाई इतना सुख कहाँ था “ मैने कहा यहाँ की नदियों में हर साल भीषण बाढ़ आती थी और उनकी सारी मिहनत पर पानी फिर जाता था झोपड़ियाँ बह जाती थीं, आदमी और मवेशी नष्ट हो जाते थे,दलदली बुखार,बिच्छू कीड़े-मकोड़ों से लोग त्रस्त रहते थे,जंगली शेर और सुअर हमला कर देते थे ..” “एक मिनट भाईसाहब शेर तो जंगली ही होते हैं ना ?” राममिलन भैया ने बहुत देर बाद मुँह खोला था । “हाँ भाई उस समय तो जंगली ही होते थे “ मैने कहा और शेर तो आज भी जंगली ही हैं , सुअरों की बात मै नहीं कर रहा” राममिलन भैया ने एक्सपर्ट कमेंट किया “ सुअर तो सब शहर में बस गये हैं और अब चुनाव भी लड़ने लगे हैं ।“उसके बाद फिर सुअरों की ही बातें चलती रहीं मनुष्यों की बातें कुछ देर के लिये स्थगित कर दी गईं ।
आपका शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. "बाबुल" मोरा नैहर छूटो जाए.

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  2. क्या आप को नहीं लगता कि आप मुख्य कथ्य से भटक जाते हैं?

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  3. राव साहब पुरातत्ववेत्ताओं का काम और उनकी बातें आम लोगों के लिये बहुत उबाऊ होता है,मैने कोशिश की है इसे कुछ रोचक तरीके से आप लोगों तक पहुंचाऊँ.अत: इसे भटकाव ना समझें.

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