बुधवार, 24 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-दो



9 - वो सपनों का गाँव 

            हम लोग जब अपने शहर के किसी स्थान को देखते हैं तो अक्सर सोचते हैं कि आज से बरसों पहले वह स्थान कैसा रहा होगा ।  हमारे बचपन में यह शहर ऐसा नहीं था, न इतनी इमारतें थीं न इतनी गाड़ियाँ, न इतनी पक्की सड़कें थीं न ही इतने लोग थे । वर्तमान के अतीत की कल्पना करना वहीं तक संभव है जहाँ तक वह अतीत हमारा देखा हुआ होता है लेकिन हम उससे पहले की कल्पना नहीं कर पाते हैं इसलिए कि हमारे जन्म से पूर्व के दृश्य हमारे देखे हुए नहीं होते l फिर भी हम किताबों में पढ़कर और उस समय के चित्र देखकर कल्पना कर सकते हैं कि उस समय वहाँ का जीवन कैसा रहा होगा l

            दंगवाड़ा के इस टीले पर बैठकर मैं भी उस समय की कल्पना करने लगा जब यहाँ सचमुच की कोई बस्ती रही होगी हालाँकि मेरे पास न उस समय का कोई चित्र था न ही कोई किताब थी जिसमें मैं उस ताम्राश्म युगीन ग्राम्य जीवन की कोई झलक देख सकूँ । मेरे पास कल्पना करने के लिए बस यही कुछ टूटे -फूटे अवशेष थे जो सदियों पहले किसी बाढ़ या किसी आपदा के कारण मिटटी की इन सतहों के नीचे दब गए थे ।

            टीले पर खुदी हुई निखात की ओर देखते हुए अचानक मैं उस अतीत की कल्पना में खो गया और सोचने लगा ..यहाँ भी कभी कोई खूबसूरत बस्ती रही होगी जहाँ पेड़ों की घनी छाँव के नीचे खूबसूरत झोपड़ियाँ रही होंगी जिनमे गाँव के सीधे-सादे लोग रहा करते होंगे । गाँव की स्त्रियाँ चम्बल नदी से अपने मटकों में पानी भरकर लाया करती होंगी, किसान दिन भर अपने खेतों में हल चलाने के बाद शाम को जब थके-मांदे घर लौटते होंगे तो उनकी स्त्रियाँ ताम्बे की थाली में उन्हें खाना परोसती होंगी ..। सोचते हुए अचानक मेरे मुंह से बोल फूट पड़े .."वो अमुआ का झूलना वो पीपल की छाँव, घूँघट में जब चाँद था मेहंदी लगे थे पाँव .. आज उजड़ के रह गया वो सपनों का गाँव .. ।"  

            गीत गुनगुनाते हुए भी मेरे मन में कुछ और सवाल कौंध रहे थे ..लेकिन अच्छी खासी पनपती हुई यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती थीं ? ठीक है एक पीढ़ी ख़त्म हो जाती होगी लेकिन उसका स्थान दूसरी पीढ़ी को ले लेना चाहिए ,जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना, जीवन तो यहाँ फलना -फूलना चाहिए था जैसे कि हम आजकल देखते हैं ,कुछ दिन पहले जहाँ ख़ाली ज़मीन होती है कुछ दिनों बाद वहाँ इमारतें खड़ी हो जाती है, फिर वहाँ बस्ती बढ़ती ही जाती है ..लेकिन यहाँ ऐसा क्या हुआ होगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया ..?”

            वाकणकर सर मजदूरों को उस दिन के कार्य के लिए आवश्यक निर्देश देकर हम लोगों के पास आ गए थे । मैंने अपने मन में उठते सवाल को आख़िर उनसे पूछ ही लिया। सर ने कहना शुरू किया “ तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिए  ऐसा कह रहे हो । लेकिन पिछले हजारों बरसों में ऐसा कई बार हुआ है। जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कभी अचानक उस पर विराम भी लग जाता है । सभ्यताओं के समाप्त हो जाने के एक नहीं अनेक कारण हैं । अक्सर नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती हैं । भूकम्प, ज्वालामुखी, तूफान, अकाल, बाढ़  जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा बस्तियों के नष्ट होने के पीछे आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण, हिंसक प्राणियों के हमले, भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं ।

            "तो सर हमें पता कैसे चलता है कि कौनसी बस्ती का विनाश किस कारण से हुआ ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा " किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं । जैसे यदि वस्तुओं पर आग से जलने के चिन्ह मिलते हैं तो हम अनुमान लगाते हैं कि वह बस्ती किसी अग्निकांड में नष्ट हुई होगी । बाढ़ से नष्ट हुई बस्तियों में घर के भीतर की वस्तुओं पर सूखी हुई गाद दिखाई देती है, समुद्र के किनारे पर यदि किसी ऊंची दीवार पर रेत दिखाई दे तो समझो वहाँ सुनामी की वज़ह से विनाश हुआ होगा । भूकंप और ज्वालामुखी की वज़ह से नष्ट होने वाली बस्तियों में भी खुदाई में ऐसे ही सम्बंधित प्रमाण मिलते हैं ।“

            मेरे मन में उत्खनन के तकनीकी पक्ष का ज्ञान प्राप्त करने के साथ साथ उत्खनन के कारणों को जानने की जिज्ञासा अधिक थी । दंगवाडा की इस साईट पर विगत एक माह से उत्खनन चल रहा था । हम लोग उत्खनन प्रारंभ होने के कुछ समय बाद दंगवाड़ा पहुँचे थे इसलिए  पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था । हालाँकि  हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे और हमारी  कोई प्रत्यक्ष भूमिका उत्खनन में नहीं थी फिर भी भविष्य में पुरातत्ववेत्ता बनने के लिए प्रारंभिक आवश्यक जानकारी से लैस होने की अनिवार्यता तो थी ही । विद्यार्थी थे सो प्रश्न करने की भी हमें छूट थी । हम भी ज्ञान प्राप्ति का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे । बचपन से सुनते आ रहे थे कि पुरातत्ववेत्ताओं को जैसे ही पता चलता है कहीं कोई सभ्यता ज़मीन की परतों के नीचे दबी हुई है वे वहाँ पहुँच जाते हैं और खुदाई शुरू कर देते हैं । प्रश्न यह था कि उन्हें पता कैसे चलता है ? अब उन्हें सपना  तो नहीं आता होगा ।

            मैंने रवीन्द्र के सामने अपनी जिज्ञासा रखी तो रवीन्द्र ने कहा "चलो सर से ही पूछ लेते हैं  । "  फिर वह सर से मुखातिब हुआ .." अच्छा सर, यह बताइये , पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ? ”  “ तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमें यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है ? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । “ जी । “ रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई ।

            "चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं ।“ डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी “ दरअसल पुरातत्ववेत्ता विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन का कार्य कहाँ से प्रारम्भ करना है । अब हम देखते हैं कि उन्हें यह सूचनाएँ कहाँ से व कैसे प्राप्त होती हैं । यह तो हम देखते ही आ रहे हैं कि अधिकांश सभ्यताएँ बसाहट से दूर पाई जाती हैं । अक्सर जंगलों में या किसी नदी के किनारे किसी टीले पर इन बस्तियों के या सभ्यताओं के अवशेष ज़मीन के भीतर दबे होते हैं । लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि  तेज़ वर्षा के कारण, भूस्खलन से या किसी उथल - पुथल की वज़ह से कुछ चीज़ें सतह पर आ जाती हैं । कुछ अवशेष जंगलों के भीतर यूँ ही बिखरे हुए होते हैं जहाँ वर्षों से कोई गया नहीं होता है सो इसकी जानकारी किसी को नहीं होती ।

            "लेकिन सर इनकी जानकारी सरकार तक कैसे पहुँचती है ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा "पुरातत्व विभाग या प्रशासन तक प्रारंभिक सूचना पहुँचाने वाले होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग, किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले लोग , जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर उन्हें कोई प्रतिमा मिली है या कोई सिक्का या बर्तन, पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए ज़मीन के नीचे भी कुछ मिल जाता है । कभी मकान बनाने के लिए नींव खोदते हुए कुछ वस्तुएँ या कोई संरचना दिख जाती है ।  कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारे या शिकारी जो बहुत भीतर तक जाते हैं सतह पर पड़े किसी अवशेष को देखकर ऐसी सूचना देते हैं ।"

            "लेकिन सर क्या लोग इमानदारी से ऐसी सूचना देते हैं ? " रवीन्द्र ने प्रश्न किया । सर ने कहा .." अरे नहीं.. उन लोगों को यह पता थोड़े ही होता है कि सरकार का कोई पुरातत्व विभाग है । वे लोग अक्सर अपने ग्रामीण साथियों को यह बात बताते हैं । फिर भी अगर हम तक सीधे सूचना न भी पहुँचे  तो कहीं कुछ मिला है यह बात धीरे धीरे फैलती ही है ।  हालाँकि  हमारे यहाँ छुपाने की प्रवृत्ति ज्यादा है, सिक्के वगैरह मिलते हैं तो लोग बताते ही नहीं, मूर्तियाँ मिलती हैं तो लोग घरों में रख लेते हैं या गाँव के बीच कहीं स्थापित कर पूजा शुरू कर देते हैं । तस्कर या चोर लोग तो वैसे भी बात गुप्त रखते हैं । लेकिन ग्राम सहायक, पटवारी, पुलिस या पत्रकारों  के माध्यम से बात हम तक यानि पुरातत्व विभाग तक पहुँच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और उन सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करते हैं, फिर प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जाता है, मंजूरी मिलने के बाद पूरी कार्य योजना बनाई जाती है, खर्च की राशि  तय की जाती है । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व कार्यस्थल पर जाकर यह  तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी होगी, कहाँ ट्रेंच बनानी होगी, किस लेयर से शुरूआत  करना है, कहाँ तक खुदाई करना है आदि आदि  ..।

            "हाँ, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया ।" सर ने कहा । "आजकल किसी साईट के बारे में हवाई जहाज के माध्यम से भी सूचना प्राप्त होती है इस हवाई सर्वेक्षण को एरोग्राफ़ी कहते हैं एक बार सेकण्ड वर्ल्ड वार के समय ऐसा ही हुआ था । युद्ध के दौरान जब सैनिक हवा में उड़ान भर रहे थे फिलिस्तीन और इज़राइल के पास सैनिकों को एक लुप्त बस्ती होने का आभास हुआ ।" "लेकिन सर इतनी ऊपर से कोई अवशेष कैसे दिखाई देता होगा?" रवीन्द्र ने सवाल किया ।

            " ऐसे डायरेक्ट थोड़े ही दिखता है भाई ।" सर ने कहा " उन्हें तो जंगल और वहाँ के पेड़-पौधे ही दिखाई दिए लेकिन सब ओर जहाँ हरे भरे जंगल थे बीच में एक हिस्सा ऐसा था जो अविकसित था और जहाँ के पेड़ पौधे स्वस्थ्य नहीं थे, उनके पत्ते अन्य पेड़ों के पत्तों की तुलना में कुछ पीले थे सो उन्हें संदेह हुआ कि यहाँ नीचे कोई बस्ती दबी होगी तभी पेड़ पौधों को ठीक से ख़ुराक नहीं मिल पाई है । उसके बाद उनकी सूचना के आधार पर वहाँ खुदाई की गई, और वहाँ पूरा एक शहर निकल आया तुम लोगों ने शायद जेरोम शहर का नाम सुना होगा यह वही शहर है । इसके अलावा अब मरीन आर्क्यालोजी नाम की एक ब्रांच भी है जिसमे समुद्र के भीतर डूबी हुई सभ्यताओं की खोज गोताखोरों द्वारा की जाती है । पुरातत्ववेत्ताओं को बाक़ायदा इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है । "

            सर ने एक बार में ही हमें संक्षेप में पुरातात्विक साइट्स सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त होने से लेकर उन पर क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया बता दी थी । हालाँकि यह प्रारंभिक जानकारी थी और यह हम क्लास में भी पढ़ चुके थे लेकिन किसी साईट पर पहुँचकर प्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी प्राप्त करने का यह पहला अवसर था । आखिर थ्योरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क तो होता ही है ।

            सर जैसे ही खामोश हुए मेरे  भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया “ लेकिन कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक  लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, माताएँ  खाना पका रही हैं, बच्चे खेल रहे है, लड़कियाँ पेड़ों पर झूला डालकर झूल रही हैं, कोई चरवाहा जंगल में किसी पेड़ के नीचे बैठा बंसी बजा रहा है , खेतों में किसान हल चला रहे हैं, रात में चौपाल पर गाना-बजाना चल रहा है, शादी-ब्याह में नाच-गाना चल रहा है, मंदिर में भजन चल रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाए  या नदी में बाढ़ आ जाए या बस्ती में आग लग जाए और सुबह सब खल्लास  ।“

            डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " लेकिन सभ्यता के विनाश से पूर्व का चित्र इतना भी रूमानी नहीं है भाई । मनुष्य के  जीवन में दुखों की कोई कमी तो है नहीं, सामान्य मनुष्य सदा से शोषित ही रहा है, कभी प्राकृतिक विपदा की वज़ह से तो कभी खुद की वज़ह से उसका विनाश हुआ है । चारागाह या खेतों के लिए, धन -संपत्ति के लिए मनुष्य ही मनुष्य पर आक्रमण करता रहा है । कई बार रोजी-रोटी की कशमकश भी उसे बस्ती छोड़ने को विवश कर देती है, गाँव के गाँव खाली हो जाते हैं  ऐसा तो अब भी होता है । लेकिन मनुष्य फिर भी हिम्मत नहीं हारता, वह नई जगह पर अपनी बस्ती बसाता है, हालाँकि अगली बार वह इतना सावधान तो रहता है कि फिर हादसे की पुनरावृत्ति न हो ।

            "सचमुच यह मनुष्य महान है सर ।" मैंने कहा । "हाँ यह मनुष्य ही है.." सर ने कहा "जिसने प्रकृति से युद्ध करके जीना सीखा है और जीवन को बेहतर बनाया है । जैसे कि आजकल आपदा प्रबंधन शब्द तुमने सुना होगा बाढ़, सुनामी, अकाल इन सब स्थितियों से निपटना अब मनुष्य पहले की अपेक्षा बेहतर जानता है और यह उसने पिछले अनुभवों से ही सीखा है । इसीलिए  जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है जीवन का अतीत जानना इसलिए कि अतीत ही जीवन के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है । इस पर हमारे भविष्य की नीव टिकी है, हर नया आविष्कार या खोज पहले की गई खोज के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाता है ।“ सर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी ..अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।

            हमारा आज का दिन भी ऐसे ही अपनी जिज्ञासाओं को सर के सामने रखकर उनका समाधान पाने में बीत गया । हम लोग मजदूरों को खुदाई करते हुए देखते रहे और सोचते रहे क्या इस सभ्यता में निवास करने वाले इन्ही मजदूरों के पूर्वज रहे होंगे या वे कोई और थे जो कहीं और से आये थे और न जाने कहाँ चले गए । शाम तक आज का हमारा प्रशिक्षण समाप्त हो चुका था और हम लोग अपने तम्बुओं में लौट आये थे । भाटीजी के हाथों की गर्मागर्म चाय पीने के बाद हम लोग टहलने निकल गए और लगभग एक घंटे में लौट आये । सच कहें तो हम लोगों में से किसी का मन यहाँ नहीं लग रहा था ऐसा लग रहा था कि जल्द से जल्द यह प्रशिक्षण समाप्त हो और हम लोग अपने हॉस्टल लौट जाएँ हालाँकि हम लोग अपने मन को यह कहकर दिलासा दे रहे थे कि इससे क्या फ़र्क पड़ता है वहाँ रहें या यहाँ रहें घर से तो दूर हैं ही । देर रात तक हम लोग बात करते रहे । हम लोगों की बातों में घर की याद , माँ के हाथों का बना खाना ,अपने बचपन की शरारतें जैसे विषय शामिल रहे ।

शरद कोकास 


7 टिप्‍पणियां:

  1. सभ्यता का विनाश आपसी लड़ाई और आंतरिक विद्रोहों से नहीं होता

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  2. अतीत बहुत कुछ तय करता है!!

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  3. डा वाकणकर से सहमत हूं।

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  4. अच्छी जानकारी प्राप्त हुई आपके इस पोस्ट के दौरान!

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