बुधवार, 24 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-दो


बुझा हुआ चूल्हा
हम लोग उत्खनन के बीच में दंगवाड़ा पहुंचे थे इसलिये पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था . लेकिन हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे अत: प्रश्न करने की हमें छूट थी. “अच्छा सर, यह बताइये,पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ?” रवीन्द्र ने प्रश्न किया । “तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमे यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । “ जी “ रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई । “चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं “ डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी “ दरअसल पुरातत्ववेत्ता प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन काकर्य कहाँ प्रारम्भ करना है । इस सूचना के प्रारम्भिक वाहक होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग ,किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले,जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर कोई मूर्ती पाई गई है या कोई सिक्का या बर्तन ,पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए कुछ मिल जाता है , कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़ हारे या शिकारी ऐसी सूचना देते हैं । धीरे धीरे बात फैलती है, हाँलाकि हमारे यहाँ छुपाने की पृवृत्ति ज्यादा है लेकिन बात पहुंच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी है ,कहाँ ट्रेंच बनानी है, किस लेयर से शुरू करना है वगैरह ..।
“लेकिन सर यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती हैं जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना ?” मैने सवाल किया । तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिये ऐसा कह रहे हो “ सर ने कहा “इसके एक नहीं अनेक कारण हैं । नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती है । भूकम्प ,ज्वालामुखी, तूफान ,अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण ,भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं । किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं ।“
सर जैसे ही खामोश हुए मेरे भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया “ कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, बच्चे खेल रहे है, किसान हल चला रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाये और सुबह सब खलास ।“
“ हाँ” डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होने प्रतिक्रिया प्रकट की ..” लेकिन जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है उसका अतीते जानना ।“ अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सभ्यता का विनाश आपसी लड़ाई और आंतरिक विद्रोहों से नहीं होता

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  2. अतीत बहुत कुछ तय करता है!!

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  3. डा वाकणकर से सहमत हूं।

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  4. अच्छी जानकारी प्राप्त हुई आपके इस पोस्ट के दौरान!

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