मंगलवार, 2 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-चार


एक पैसे में कितनी सिगरेट आती थीं?
दिन की रोशनी में हम टीले को पहली बार देख रहे थे। रात में जो टीला डरावना और रहस्यमय लग रहा था दिन में वह शांत और सुन्दर प्रतीत हो रहा था।मैं सोचने लगा अन्धेरे और डर के सम्बन्ध के बारे में। बचपन से ही हमारे अवचेतन में यह सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता है और फिर हम जीवन भर अन्धेरे से डरते रहते हैं। सुबह की धूप टीले को अपना दुलार दे चुकी थी। हमने सोचा आज कुदाल हाथ में लेकर मज़दूर की भूमिका निभाई जाये अखिर शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ेगी लेकिन आर्य सर ने ज्ञान दिया कि निखात में कुदाल कितनी सावधानी से चलाना है वह हमें सीखना होगा। “मतलब हम मज़दूर बनने के लायक भी नहीं हैं? अजय ने सवाल किया। “नहीं भाई, ऐसा नहीं है लेकिन इसके लिये भी कुशलता की आवश्यकता होती है ज़रा सी असावधानी से कोई महत्वपूर्ण वस्तु टूट सकती है,गड्ढा खोदने और निखात में कुदाल चलाने में अंतर है ।“
वैसे भी उत्खनन का यह पहला दिन हम लोगों की डायरी मे ऑब्ज़रवेशन के लिये तय था। इस दिन हमे सिर्फ यह देखना था कि ट्रेंच के लिये जगह कैसे तय की जाती है,किस तरह ट्रेंच का आकार तय किया जाता है,कैसे नाप लिया जाता है मार्किंग कैसे की जाती है और टूल्स कैसे तैय्यार किये जाते है वगैरह ।डॉ.आर्य के सान्निध्य में आज का यह दिन अच्छा बीता। हाँ मज़दूरों से भी हमने दोस्ती कर ली क्योंकि वे निरक्षर ही सही कुदाल चलाना तो हमसे बेहतर जानते थे।हाँ अक्षर उनके लिये उसी तरह अनचीन्हे थे जिस तरह इतिहासकारों के लिये सिन्धु घाटी की लिपि जिसे तमाम कोशिशों के बावज़ूद अब तक ठीक ठाक पढा नही जा सका है।
इस तरह सारा दिन विषय के साथ परिचय में ही बीत गया । इस बीच हम लोगों ने टीले के आसपास के क्षेत्र में घूम घूम कर ताम्बे के पंचमार्क या आहत सिक्के भी एकत्रित किये। ये सिक्के ठीक उसी तरह थे जैसे कभी ताम्बे का एक पैसे का सिक्का चला करता था। ये सिक्के पुराने होने के कारण तथा उस पर आक्साइड की परत चढ जाने के कारण हरे से हो गये थे और उन पर मार्क की हुई सील भी पढी नहीं जा रही थी.। सिक्कों को इकठ्ठा करते हुए मै सोचने लगा क्या इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिये गुड़िया खरीद कर लाया था,या कोई किसान अपने खेत के लिये बैल? अशोक ने पुछा “यार उस ज़माने में इस एक सिक्के में कितनी सिगरेट आती होंगी?” “चुप “ मैने कहा”उस ज़माने के लोग सिगरेट नहीं पीते थे “ “तो फिर सुबह उनका मामला कैसे पिघलता था?” अशोक बोला। अबकी बार मैने उसे जो घूरकर देखा तो वह चुप हो गया।
आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत. आप लोगों को टीले के चारों तरफ सतह से ही आहात सिक्के मिल गए!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वृतांत अब पूरे रौ में बह चला है। आनन्द आ रहा है।

    चूँकि आप उम्दा दर्जे के 'गड्ढेबाज' हैं, इसलिए आप से गड्ढे पर एक अदद पोस्ट की दरकार है। यह एक प्रतियोगिता है और पुरातत्त्ववेत्ता का गड्ढा इसमें भाग न ले तो अच्छा नहीं लगता। अधिक जानकारी के लिए यहाँ जाएँ। http://girijeshrao.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुब्रमनियन जी यह २५ साल पहले की बात है जब मूर्तियाँ सिक्के सब यूहीं सतह पर पड़े मिल जाते थे .(सतह से इसलिए भी की बारिश से मिटटी धसकती है टीले की कुछ antiquities सतह पर आ जाती हैं हाँलाकि पुरातत्ववेत्ता के लिये यह भी परेशानी है मतलब चन्द्रगुप्त की अंगूठी शाहजहाँ की उंगली मे पहुंच सकती है ) ईमानदारी तो खैर थी ही आज तो लोग ज़मीन खोदकर सब कुछ निकाल लेते है

    उत्तर देंहटाएं