मंगलवार, 2 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-चार



कैंप से निकलकर टीले की ओर जाते हुए हमें अहसास हुआ जैसे हम अपने हॉस्टल से क्लासरूम की  ओर जा रहे हों । वैसे यह सच भी था । टीले पर खुदी निखात पर ही हमारी क्लास लगनी थी सो वह एक तरह से हमारी कक्षा ही थी । जैसे ही हम आगे बढ़े टीला हमारे सामने था । दिन की रौशनी में हम दंगवाड़ा का यह टीला पहली बार देख रहे थे । रात के अँधेरे में जो टीला डरावना और रहस्यमय लग रहा था वही दिन में शांत और सुन्दर प्रतीत हो रहा था । वहाँ न रात का अँधेरा था ,न पेड़ों के साये । यह इस टीले से हमारा नया परिचय था । टीले की ओर देखते हुए मैं सोचने लगा ..रौशनी और अँधेरे का खेल भी कितना अजीब होता है ना । अँधेरे में जो कुछ छुपा छुपा होता है वह रौशनी में आते ही अनावृत हो जाता है । अँधेरा अगर रहस्य है तो रौशनी रहस्योद्घाटन । अँधेरा भय उत्पन्न करता है और प्रकाश उस भय से मुक्ति प्रदान करता है ।

दिन के इस उजाले में कल रात के अँधेरे के बारे में सोचते हुए मुझे मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' याद आने लगी .."ज़िन्दगी के / कमरों में अँधेरे / लगाता है चक्कर / कोई एक लगातार / आवाज़ पैरों की देती है सुनाई / बार- बार ...बार-बार / वह नहीं दीखता /नहीं ही दीखता / किन्तु वह रहा घूम / तिलिस्मी खोह में गिरफ़्तार / कोई एक / भीत- पार आती हुई पास से  / गहन रहस्यमय अंधकार - ध्वनि  सा / अस्तित्व जनाता / अनिवार कोई एक /और, मेरे हृदय की धक -धक / पूछती है - वह कौन / सुनाई जो देता , पर नहीं देता दिखाई ....." कितना डूबकर लिखा है मुक्तिबोध ने ..ऐसा लगता है जैसे एक कुदाल लेकर सदियों से निर्मित मनुष्य के अवचेतन को खोद डाला हो ।  

            सदियों से व्याप्त यह कैसी विडम्बना है कि बचपन में ही हमारे अवचेतन में अँधेरे और भय का यह सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता  है । हमें बताया जाता  है कि अँधेरे का अर्थ बुराई है, रहस्य है, अँधेरे में बुरे काम होते हैं, अँधेरे में बुरी आत्माएँ भटकती हैं आदि आदि और फिर हम जीवन भर अन्धेरे से डरते रहते हैं । अक्सर रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए हम कहते हैं  “ चुप ! रोना बुरी बात है, अब रोया तो अँधेरे में  फेंक देंगे ।‘’ इसकी मनोवैज्ञानिक परिणति अँधेरे और भय के सम्बन्ध में होती है । फिर वह वह बच्चा जीवन भर अँधेरे का सम्बन्ध  भय, पाप, बुराई, भूत-प्रेत और बुरी शक्तियों से जोड़ता है । वह यही समझता है कि सारे बुरे काम और अपराध अँधेरे में ही होते हैं । अफ़सोस उस बच्चे को यह नहीं बताया जाता कि अँधेरा सूर्य की अनुपस्थिति का दूसरा नाम है ।

            रात का वह अँधेरा कबका समाप्त हो चुका था और सुबह की धूप टीले को अपना दुलार दे रही थी । रात में आसमान से टपकी हुई ओस किसी बादल का हिस्सा बन चुकी थी और बादल का एक टुकड़ा आसमान में खड़ा खड़ा अपने अतीत की ओर निहार रहा था । हम भी दुनिया के अतीत में कदम रखने के लिए तैयार हो चुके थे । हमने सोचा आज पहला दिन है सो कुदाल हाथ में लेकर मज़दूर की भूमिका निभाई जाए । आखिर हर पुरातत्ववेत्ता को शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ती है । मैंने एक मज़दूर के हाथ से कुदाल ली और ज़मीन पर चलाने की मुद्रा में आया ही था कि आर्य सर ने मुझे रोक दिया " ऐसे नहीं भाई, निखात में कुदाल किस तरह चलाना है और उसके लिए क्या क्या सावधानी बरतनी है पहले यह आपको सीखना होगा ।" 

            “मतलब हम मज़दूर बनने के लायक भी नहीं हैं ?"  अजय ने आश्चर्य पूर्वक सवाल किया । “नहीं भाई, ऐसा नहीं है ।" आर्य सर समझ गए थे कि उनका इस तरह टोकना हमें खल गया है । उन्होंने समझाते हुए कहा "कुदाल चलाना बड़ी बात नहीं है ,हम सभी जीवन में कभी न कभी कुदाल पकड़ चुके हैं  लेकिन पुरातात्विक स्थल पर कुदाल चलाने के  लिए  और अधिक कार्य कुशलता की आवश्यकता होती है । आपकी ज़रा सी असावधानी से भी ज़मीन के भीतर दबी कोई महत्वपूर्ण वस्तु टूट सकती है, इसलिए गड्ढा खोदने और निखात के निर्माण हेतु  कुदाल चलाने में अंतर है ।और कुदाल चलाने से पहले आप लोगों को कुछ प्रारम्भिक बातें जानना भी आवश्यक है ।“

            बात हमारे भेजे में ठीक तरह से प्रवेश कर गई थी सो हमने कुदाल चलाने का विचार त्याग दिया । कुदाल चलाने की बात पर मुझे फिर मुक्तिबोध याद आये । कविता लिखना भी  मनुष्य जाति  के सामूहिक अवचेतन में कलम रूपी कुदाल चलाने की तरह ही है लेकिन उसके लिए भी प्रशिक्षण और अभ्यास की आवश्यकता तो होती ही है । मुक्तिबोध ऐसे ही बड़े कवि नहीं बन गए ।

            वैसे भी उत्खनन का हमारा यह पहला दिन था और यह दिन हम लोगों की डायरी में ऑब्ज़रवेशन के लिए  तय था । इस दिन हमें सिर्फ यह देखना था कि ट्रेंच के लिए जगह कैसे तय की जाती है, किस तरह ट्रेंच का आकार तय किया जाता है, कैसे नाप लिया जाता है, मार्किंग कैसे की जाती है, टूल्स कैसे तैयार किये जाते है वगैरह वगैरह । आर्य सर हम लोगों को टीले के एक सिरे पर ले गए ,वहाँ एक चौकोर गड्ढा खुदा हुआ था । सर ने बताया कि यह टेस्ट पिट है । किसी भी पुरातात्विक स्थल का चयन करने के पश्चात सर्वप्रथम वहाँ पर एक टेस्ट पिट या टेस्ट ट्रेंच खोदी जाती है । इसे हम परीक्षण निखात भी कह सकते हैं । इस टेस्ट पिट द्वारा हमें ज्ञात होता है कि इस साईट पर अमूमन कितनी गहराई पर कितनी सतहें प्राप्त होंगी। इस आधार पर ही फिर उत्खनन प्रारंभ किया जाता है

            इसके बाद उन्होंने हमें निखात क्रमांक एक के पास बुलाया और कहा " देखिये यह निखात या ट्रेंच है । हम लोगों ने यहीं से उत्खनन कार्य प्रारंभ किया है ।  ट्रेंच एक प्रकार का वर्गाकार या आयताकार गड्ढा होता है जो सामान्यतः अपनी लम्बाई चौड़ाई के मुकाबले अधिक गहरा होता है । इसमें खुदाई करते हुए जो सबसे उपरी सतह होती है उसे फर्स्ट लेयर कहते हैं जिसमे सबसे बाद की सभ्यता के अवशेष मिलते हैं इसके नीचे जाने पर दूसरी लेयर या सतह मिलती हैं जहाँ उस समय से पूर्व के अवशेष प्राप्त होते हैं । दोनों सतहों के बीच का हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण होता है जिसके अवलोकन से हमें पिछली सभ्यता के नष्ट होने के प्रमाण मिलते हैं । यह हिस्सा भूस्खलन ,बाढ़ आदि की वज़ह से निर्मित होता है ।"

            अजय ने कहा "सर यह किसी खाली डिब्बे को भरने के सामान ही है । जैसे किसी गहरे डिब्बे में हम लोग एक के बाद एक चार तरह की वस्तुएँ डालते हैं लेकिन जब निकालते हैं तो सबसे पहले वह वस्तु बाहर आती है जो सबसे बाद में डाली जाती है जो ऊपर होती है और सबसे अंत में वह वस्तु निकलती है जो सबसे पहले डाली जाती है ।  ठीक उसी तरह जो सभ्यता सबसे अंत में बसी होती है उसके अवशेष सबसे पहले मिलते हैं और जो सबसे पहले बसी हुई सभ्यता होती है उसके अवशेष सबसे नीचे अंत में मिलते हैं । अजय ने इतने सरल ढंग से आर्य सर की बात समझा दी थी कि उसके लिए हमारा तालियाँ बजाना अनिवार्य हो गया था ।

            डॉ.आर्य बहुत रूचि के साथ हमें निखात के उत्खनन सम्बन्धी तकनीकी जानकारी प्रदान कर रहे थे लेकिन पहले दिन स्कूल आये बच्चों की तरह हमारा मन भी क्लास में नहीं लग रहा था । सर समझ गए कि इन लोगों को एक जगह बिठाकर सारा तकनीकी ज्ञान एक दिन में इनके दिमागों में उंडेल  देना उचित नहीं है सो उन्होंने एक नया आइडिया लगाया । सर ने कहा " अच्छा यह बताओ तुम लोगों में से कितने लोगों ने ज़मीन पर पड़े पैसे इकठ्ठे किये हैं ?" मैंने झट से हाथ उठाया " सर हमारे बचपन में बैतूल में हमारे घर के सामने इतवार और गुरूवार को बाज़ार लगता था । शाम को बाज़ार उठ जाने के बाद हम बच्चे निकलते थे और सिक्के ढूँढा करते थे ,हमें बहुत से सिक्के मिल जाया करते थे ।" मेरी बात खत्म होते ही अजय ने कहा .." सर हम लोगों के घर के सामने से जब शवयात्रा निकलती थी तो उसमे लाई के साथ चिल्लर पैसे भी लोग मुर्दे के ऊपर से फेंकते थे , उनके जाने के बाद हम लोग दौड़कर वे पैसे उठा लेते थे ।

            अजय की बात सुनते ही राममिलन भैया ने अपने कानों पर हाथ रखे .." शिव शिव शिव .. कितना घ्रणित काम करते थे भाई तुम लोग ..मुर्दे पर फेके हुए पैसे नहीं उठाना चाहिए ..कहीं भूत-वूत पीछे लग जाता तो ?" अशोक ने हँस कर  कहा .." अरे ये लोग खुद ही इतने बड़े भूत हैं इनके पीछे क्योंकर भूत लगता ,सर हम लोग तो शादी में दुल्हे के ऊपर फेंके हुए सिक्के बीन लेते थे ,और पैसे बीनने से ज़्यादा मजा तो सत्यनारायण कि कथा में पंडित जी की आरती की थाली से पैसे चुराने में आता था ।" " बस बस काफी है " आर्य सर ने कहा तुम लोगों के पास सिक्के बीनने का काफी अनुभव है सो आज यही काम करो देखो इस टीले के पास काफी सारे ताम्बे के पंचमार्क सिक्के हजारों साल से पड़े हुए हैं ,देखते हैं तुममे से कौन कितने सिक्के बीन कर लाता है ।"  

            इस तरह हमें आज दिन भर के लिए काम मिल गया था । मिटटी के भीतर प्रवेश करने से पहले मिटटी की उपरी सतह से परिचय करना ज़्यादा ज़रूरी था सो हम लोग टीले के आसपास के क्षेत्र में घूम घूम कर ताम्बे के पंचमार्क या आहत सिक्के एकत्रित करने निकल पड़े  । लेकिन यहाँ हमें सिक्के बहुत मुश्किल से मिल रहे थे । बरसों पहले ढाले गये यह सिक्के आंधी ,तूफ़ान,बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक विपदाओं से आँख मिचौली खेलते हुए कहीं किसी पत्ते, पेड़ की जड़ ,पत्थर या मिटटी की सतह के नीचे छुप गए थे । हमने देखा कि यह सिक्के ठीक उसी तरह के थे जैसे कभी ताम्बे का एक पैसे का सिक्का चला करता था । लेकिन यह  सिक्के उनसे भी  पुराने थे, ताम्बे के  हवा के संपर्क में आ जाने के कारण उन पर आक्साइड की परत चढ़ी हुई थी और वे कुछ हरे से रंग के हो गए  थे और इसी वज़ह से उन पर मार्क की हुई सील भी पढी नहीं जा रही थी ।

            कुछ देर सिक्के इकठ्ठा करने के बाद हम लोग ट्रेंच पर लौट आये । अपने पास इकठ्ठा चार-छह सिक्के  सर को सौंपते हुए रवीन्द्र ने आर्य सर से सवाल किया " सर इन्हें पंचमार्क सिक्के क्यों कहा जाता है ? सर ने जवाब दिया " भारत में सबसे पहले लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आहत करके, चोट करके या पंच  करके बनाये गए । यह सिक्के ईसा पूर्व छठी शताब्दी से चलन में आये जो ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक चलन में रहे । सबसे पहले यह सिक्के चांदी के बनते थे । इनके निर्माण के लिए एक पतली चांदी की चादर को बराबर बराबर टुकड़ों में काटा जाता, फिर इन टुकड़ों के  कोने काटकर इन्हें एक जैसे वज़न का बनाया जाता, फिर  एक वज़न के इन टुकड़ों पर कोई एक मुहर या ठप्पा रखा जाता और उस पर हथौड़े से प्रहार किया जाता या पंच किया जाता, इसीलिए अंग्रेजों ने इन्हें पंचमार्क सिक्के नाम दिया । इस तरह प्रहार करने की वज़ह से ही यह अलग अलग आकार के हो गए हालाँकि इनकी पहचान इन पर अंकित चिन्ह से ही होती थी ।"

            "लेकिन सर हमें तो जो सिक्के यहाँ मिल रहे हैं वे चांदी के नहीं बल्कि ताम्बे के हैं ?" अजय ने सवाल किया । आर्य सर ने जवाब दिया "हाँ पहले यह सिक्के चांदी के ही बनते थे, ताम्बे के सिक्कों का चलन मौर्यकाल में माना जाता है । चांदी के सिक्के ज़्यादातर गंगा किनारे के जनपदों में पाए जाते हैं, इन पर उस राज्य की मोहर अंकित होती थी । " तो क्या सर यह सिक्के अन्य जनपदों में नहीं चलते थे ? "अजय ने सवाल किया ।

            "क्यों नहीं चलते थे ।" आर्य सर ने कहा । "जब व्यापार या अन्य माध्यमों से यह सिक्के अन्य जनपदों में पहुँचते थे तो उस राज्य की मुद्रा या चिन्ह उस पर अंकित कर दिया जाता, अधिकतर पीछे की  ओर । इसके अलावा कई छोटे छोटे जनपद थे जिनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी तो उन्होंने ताम्बे के सिक्के बनाये । इसलिए इन्हें जनपदीय सिक्के भी कहा जाता है । जैसे मालव, यौधेय आदि जनपदों ने अपने सिक्के बनाये । अनेक स्थानों पर चांदी और ताम्बे के सिक्के एक साथ भी पाए गए ।"

            राममिलन भैया भी हम लोगों के साथ कुछ पंचमार्क सिक्के खोजकर लाये थे और अपना चश्मा उतारकर उसके मोटे से लेंस को मैग्निफाइंग ग्लास की तरह इस्तेमाल करते हुए उन सिक्कों पर अंकित आकृतियों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे "सर हमें तो इन सिक्कन में कछु नाय दिख रहा है हाथी है कि घोड़ा है ?" सर हँसने लगे .." भाई, अब तक तो इतना क्षरण इन सिक्कों में हो चुका है कि ठीक से कुछ दिखना मुश्किल है लेकिन कई साइट्स में यह सिक्के अच्छी अवस्था में प्राप्त हुए हैं । अब तक पांच सौ से अधिक चिन्ह इनमें पहचाने जा चुके हैं जिनमे शेर, हाथी, घोड़े जैसी पशुओं की आकृतियाँ, विभिन्न मानव आकृतियाँ, रथ के चक्के, सूर्य, चन्द्रमा, तीर-कमान, पहाड़, नदियाँ और विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ अंकित हैं ।

            "सर, तो क्या हर राज्य अपना अलग सिक्का बनाता था और उस पर अपनी आकृतियाँ अंकित करता था ? रिजर्व बैंक टाइप कौनो बैंक, कौनो नियम फियम नहीं था क्या ? " राममिलन की बात सुनकर  सर हँसने लगे  "भाई कैसा बैंक और कैसा नियम, हर राज्य की अपनी टकसाल होती थी और ज़रूरत के अनुसार वे अपने लिए सिक्के बनाते थे, एक राज्य का सिक्का जब दूसरे राज्य में पहुँच जाता तो वे उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे अपना सिक्का बना लेते, इसीलिए एक सिक्के पर कई कई छाप मिलती हैं । " सर, फिर तो बहुत अराजकता होती होगी, इतने शिथिल नियमों की वज़ह से तो लोग अपने अपने सिक्के बना लेते होंगे ?" अशोक ने पूछा ।

            "नहीं ऐसा भी नहीं था ।" सर ने कहा "हालाँकि कई बड़े बड़े नगरों जैसे उज्जयिनी, तक्षशिला, कौशाम्बी आदि के वणिक संघों ने अपने अपने सिक्के भी बनाए थे ।" राममिलन से फिर सवाल किया "तो सर अभी जैसे गांधीजी हर नोट पर दिखाई देते हैं वैसा नहीं था, लेकिन उस समय भी आना, दो आना, जैसी कोई मुद्रा तो चलती होगी ? " " हाँ चलती थी ना " सर ने कहा "कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इनका उल्लेख है । उस समय एक आने को पण कहा जाता था, आधे आने को अर्ध पण, चौथाई आना पद कहलाता था और आने के आठवें हिस्से को अर्शपादिका कहते थे । सम्पूर्णता में सभी पंचमार्क सिक्कों के लिए कर्षपण शब्द प्रचलित था ।"   

            मैंने ज़मीन पर पड़ा एक सिक्का उठाकर अपनी हथेली पर रखा और उसे देखते हुए सोचने लगा … आज यह सिक्का मेरी हथेली पर रखा है लेकिन हजारों साल पहले हो सकता है ऐसा हुआ हो कि इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिए  गुड़िया खरीद कर लाया होगा, हो सकता है किसी किसान ने खेती  के लिए  बैल खरीदे होंगे ? हो सकता है किसी गृहणी ने इस सिक्के से अपने परिवार के लिए दाल -आटा खरीदा होगा । जाने कितने हाथों में यह सिक्का गया होगा । अशोक ने पता नहीं कैसे ताड़ लिया कि मैं ऐसा ही कुछ सोच रहा हूँ । उसने पूछा “ यार उस ज़माने में इस एक सिक्के में कितनी सिगरेट आती होंगी ? ” “चुप । “ मैंने कहा ” उस ज़माने के लोग सिगरेट नहीं पीते थे ।“ “तो फिर सुबह उनका मामला कैसे पिघलता था ?” अशोक बोला । अबकी बार मैंने उसे ऐसे घूरकर देखा कि वह बिलकुल चुप हो गया ।


इस तरह डॉ.आर्य के सान्निध्य में आज का यह दिन अच्छा बीता । हाँ सिक्के बीनने के अलावा वहाँ कार्यरत मज़दूरों से भी हमने दोस्ती कर ली क्योंकि वे निरक्षर ही सही कुदाल चलाना तो हमसे बेहतर जानते थे । हाँ हिंदी भाषा के अक्षर उनके लिए उसी तरह अनचीन्हे थे जिस तरह इतिहासकारों के लिए सिन्धु घाटी की लिपि, जिसे तमाम कोशिशों के बावज़ूद अब तक ठीक ठाक पढा नहीं जा सका था ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत. आप लोगों को टीले के चारों तरफ सतह से ही आहात सिक्के मिल गए!

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  2. वृतांत अब पूरे रौ में बह चला है। आनन्द आ रहा है।

    चूँकि आप उम्दा दर्जे के 'गड्ढेबाज' हैं, इसलिए आप से गड्ढे पर एक अदद पोस्ट की दरकार है। यह एक प्रतियोगिता है और पुरातत्त्ववेत्ता का गड्ढा इसमें भाग न ले तो अच्छा नहीं लगता। अधिक जानकारी के लिए यहाँ जाएँ। http://girijeshrao.blogspot.com

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  3. सुब्रमनियन जी यह २५ साल पहले की बात है जब मूर्तियाँ सिक्के सब यूहीं सतह पर पड़े मिल जाते थे .(सतह से इसलिए भी की बारिश से मिटटी धसकती है टीले की कुछ antiquities सतह पर आ जाती हैं हाँलाकि पुरातत्ववेत्ता के लिये यह भी परेशानी है मतलब चन्द्रगुप्त की अंगूठी शाहजहाँ की उंगली मे पहुंच सकती है ) ईमानदारी तो खैर थी ही आज तो लोग ज़मीन खोदकर सब कुछ निकाल लेते है

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