सोमवार, 29 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन -तीन

चलो सिटी चलते हैं
“अच्छा चलो आज अपने को नदी के उस पार वाले टीले पर एक्सप्लोरेशन के लिये चलना है । ” डॉ. वाकणकर ने घोषणा की । दरअसल आज सुबह सात बजे ही उन्होने हम लोगों को जगाकर आज का प्रोग्राम बता दिया था । नदी के उस किनारे वाला वह टीला यहाँ से कुछ दूरी पर ही स्थित है । हम लोग इसी तरह गपियाते हुए घूम कर नदी के उस किनारे पर पहुंचे । वहाँ ज़्यादा कुछ नहीं था । बड़ी मुश्किल से कहीं कोई अवशेष दिखाई देता था । एक जगह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता के कुछ चित्रित मृद्भांड प्राप्त हुए, ऐतिहासिक काल के दो सिक्के और दो बीड मिले बस । मुझे मेरा बचपन याद आ गया जब इसी तरह भंडारा में वैनगंगा नदी के किनारे मैं रेत में शंख और सीपियाँ ढूंढा करता था । दोपहर के भोजन से पूर्व हम लोग वहाँ से लौट आये ।
भोजन के पश्चात हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक दो पर अपना कार्य प्रारम्भ किया । हमने 1.90 मीटर के बाद 20 सेंटीमीटर खुदाई की । हमें लग रहा था कि हमने खुदाई शुरू की है तो अवशेषों के ढेर मिलना शुरू हो जायेंगे . हम लोग बार बार आंखें फाड़कर ट्रेंच के भीतर झाँकते और कोशिश करते कोई दीवार नज़र आ जाये, या कोई मटका या कोई और महत्वपूर्ण वस्तु मिल जाये लेकिन कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई । हाँ, ट्रेंच की दक्षिण दिशा (south extension) की ओर विस्तृत ट्रेंच में एक टूटा हुआ टेराकोटा ऑब्जेक्ट यानि बैल प्राप्त हुआ ।(गूगल छवि में देखें terracotta bull) हमने उसका नाम शर्मा जी के नाम पर ‘राममिलनवा’ रख दिया ।
हमारा कार्य अभी प्रारम्भ ही हुआ था कि हमे ऐसा लगा जैसे प्रकृति को हमारा आगमन उचित नहीं लगा है । आकाश में बादल छाने लगे और ठंडी हवाएँ तेज़ हो गईं । मौसम भले ही सर्दियों का था लेकिन धूप में काम करते हुए हम लोगों का पसीना निकल गया था । अब वह धूप की वज़ह से था या काम की वज़ह से यह अलग बात है । लेकिन ऐसे में वे ठंडी हवाएँ बहुत भली लगीं । मैने आसमान की ओर देखा और गुनगुनाना शुरू कर दिया “ठन्डी हवाएँ ..लहरा के आयें ,रुत है जवाँ, उनको यहाँ कैसे बुलायें..” रवीन्द्र ने घूर कर मेरी ओर देखा ..”लो छोरा शुरू हो गया ..अबे, उनको यहाँ बुलाकर करेगा भी क्या ,और वो यहाँ आकर करेगी भी क्या .हमने ही यहाँ पत्थरों से अपना माथा फोड़ना है ।“ वाकणकर सर कहीं और चले गये थे और हम लोगों को ऐसा लग रहा था जैसे कॉलेज का आज पहला दिन है ,कब क्लास की छुट्टी हो और कब घर जायें । इतने में आर्य सर आये और कहा ‘भाई सर का आदेश हुआ है मौसम को देखते हुए ट्रेंच को ढाँकना ज़रूरी है इसलिये आज काम यहीं पर समाप्त किया जाये । “ अजय ने बच्चों की तरह खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा “ होहोहो मज़ा आ गया.. चलो सिटी चलते हैं ।“ “सिटी ?” मुझे आश्चर्य हुआ “अरे भैया अभी उज्जैन कहाँ जा सकते हैं ? “ “उज्जेन जाने की कोन केहवे हे “ अजय ने कहा “ में तो दंगवाड़ा गाँव जाने की के रहा था यहाँ से डेढ़ किलोमीटर दूर “ रवीन्द्र ने कहा “ ठीक तो कह रहा है । हम यहाँ जंगल में पड़े हैं हमारे लिये तो दंगवाड़ा ही सिटी है ।‘ “चलो चाय पी लें फिर चलते है “ मैने कहा और हम लोग तम्बुओं की ओर चल पड़े ।
आपका- शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह काम मस्ती से किया जाये तो ओर भी अच्छा लगता है, चलिये आप की अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिलचस्प। आपको बताऊं, मैं बचपन से पुरातत्व और इतिहास का शौक रखता हूं। बचपन में राजगढ़ के वीरानों में खण्डहरों में भटकता था और पुरानी सभ्यता की कल्पना में वक्त गुजार देता था।
    भाषा विज्ञान के जरिये अब भी वहीं मजा पा रहा हूं...
    गुड गुड जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यार, ये बतायें कि आप करते क्या हैं?? हमेशा जंगल? शाहर में कोई काम नहीं बचा क्या?? हा हा...चलो, जो है सो है..अगली कड़ी लाईये, इन्तजार करते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. लगे रहो शरद भाई।इंतज़ार रहेगा अगली कड़ी का।सिटी से ज़रा जल्दी आना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह बहुत बढ़िया! आपकी लेखनी को सलाम!

    उत्तर देंहटाएं