बुधवार, 1 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन -चार

रामसेतु की तलाश में
तम्बू में लौटकर हम लोगों ने टॉवेल साबुन वगैरह लिया और घाट पर हाथ मुँह धोने पहुंच गये । वहाँ से आकर कंघी- वंघी की और सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने के लिये पैदल पैदल निकल पड़े। “देखो भाई ज़रा जल्दी आना “ आर्य साहब ने हिदायत दी ।“वरना अन्धेरे में रास्ता भटक जाओगे ।“ “नहीं भटकेंगे सर “ अजय ने कहा ।“हम लोग रास्ते के चिन्हो को याद कर लेंगे ।“
कैम्प से निकलकर हम लोगों ने कच्चा रास्ता पकड़ा और शिविर परिसर के अंतिम किनारे का बरगद पारकर नदी के घाट को बायपास करते हुए आगे बढ़ गये । आगे एक नाला था जो आगे जाकर चम्बल में मिल जाता था उसमें पानी नहीं के बराबर था इसलिये नाला पार करने में हमे कोई दिक्कत नहीं हुई , लेकिन अपने जूतों को बचाने के ख्याल से हमने बीच बीच में दिखाई देते पत्थरों पर पाँव रखकर पार जाना ही उचित समझा । राममिलन भैया निकले तो हमारे साथ ही थे लेकिन नाला पार करने के बाद वे हमें कहीं दिखाई नहीं दिये । हमें लगा शायद मोड़ की वज़ह से वे नज़रों से ओझल हो गये हैं । किशोर ने आवाज़ लगाई “ कहाँ हो राममिलनवा .? “ मोड़ के पीछे से आवाज़ आई “ आईत हैं भैया । ” वहाँ क्या कर रहे हो ? किशोर ने चिल्लाकर पूछा । हमे लगा कहीं राममिलन किसी शंका के निवारण में ना लगे हों । हम उन्हे देखने के लिये चन्द कदम पीछे लौटकर फिर नाले तक पहुंच गये । देखा राम मिलन एक बड़े से पत्थर पर आंखे बन्द किये हाथ जोड़े खड़े हैं , जूते बगल में दबे हैं और वे श्लोक जैसा कुछ बुदबुदा रहे हैं । “क्या हुआ “ किशोर ने पूछा । “कुछ नहीं राम मिलन ने जवाब दिया “ हमे याद आ गया कि बजरंग बली ने रामेश्वर से लंका जाने के लिये ऐसा ही पत्थरों का पुल बनाया था, सो हम उनका स्मरण कर उनकी स्तुति कर रहे थे । “ धन्य हो प्रभु ।” किशोर ने कहा “कहाँ वो विशाल समुद्र, कहाँ ये पिद्दी सा नाला । चलो ठीक है ,जाकी रही भावना जैसी । लेकिन इतना तो बता दो ,तुम लंका से आ रहे हो या लंका जा रहे हो ? “अरे वाह “ राम मिलन समझ नही पाये कि उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है “ हम कोई राच्छस –वाच्छस हैं जौन लंका में रहेंगे । जहाँ हम रहत हैं , ऊ है अयोध्या और जहाँ हम जाइत हैं ,का कहत हो दंग्वाड़ा-फंगवाड़ा ऊ है, लंका ।“ “ तो देखना भाई वहाँ अपनी पूंछ बचाकर रखना ।“ किशोर ने कहा । भैया राम मिलन ने तुरंत अपने कटि प्रदेश के नीचे हाथ लगाया और फिर मज़ाक में कही गई किशोर की बात का अर्थ समझते हुए कहा “काहे किशोरवा काहे मजाक करत हो ।“
हम लोग अपनी हँसी के साथ किशोर के मज़ाक में शामिल हो गये । दर असल हम लोगों मे किशोर त्रिवेदी सबसे बड़े थे और राम मिलन की उम्र के ज़्यादा करीब थे इसलिये ऐसे अवसरों पर उन्हे आगे कर हम लोग चुप हो जाते थे और राम मिलन भी उनकी बात का बुरा नहीं मानते थे । हम लोग आगे बढ़े ही थे कि अजय ने सेतु प्रसंग छेड़ दिया । “ ये बताओ यार रामायण में जिस पुल का वर्णन है वह सचमुच में बना था क्या ?” “ कर दी ना तुमने नॉन टेक्निकल जैसी बात “ रवीन्द्र ने कहा । यदि पुल होता तो अब तक क्या पुरातत्ववेत्ताओं को मिल नहीं जाता ? और पुल क्या पुष्पक विमान भी मिल जाता और हाथी घोड़े रथ सिन्हासन सब कुछ मिल जाता । “ मतलब साफ है रामायण की कथा पूरी तरह काल्पनिक है “ अजय ने कहा “ तो फिर हम काल की गणना करते समय रामायण काल क्यों कहते हैं ?” “भई रामायण् काल या महाभारत काल उस समय को कहते है जब ये महाकाव्य रचे गये ये । घटनायें कब घटित हुईं ,कहाँ घटित हुईं ,हुई भी या नहीं जब तक इसके पर्याप्त पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलते तब तक तो इन्हें काल्पनिक ही माना जायेगा ना ।“ मैने कहा .हमें पता नहीं था पन्डित राम मिलन हमारी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे । मेरी बात सुनकर वे अचानक उखड़ गये ..”तुम सब अधर्मी लोग हो, पापी हो ,राम नहीं हुए थे कृष्ण नही हुए थे ,भगवानो का मजाक उड़ाते हो, तुम लोगों को नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी । हम समझ गये कि राम मिलन भैया के पूर्वज उनके भीतर जागृत हो गये हैं और अब वे शास्त्रार्थ करने पर उतर आये हैं । मैने धीर से अजय को चुप रहने का इशारा किया । वैसे भी हम लोग इस बीच दंगवाड़ा तक पहुंच गये थे और चाय की तलब अपने शबाब पर थी । किसी भी अप्रिय वार्तलाप में संलग्न होकर हम लोग अपनी शाम बर्बाद नही करना चाहते थे । अशोक हम सभी का आशय समझ गया और उसने वाकयुद्ध का पटाक्षेप करते हुए कहा “राम हुए हों या ना हुए हों, लेकिन हमारे बाल बच्चे बड़े होकर यह ज़रूर कहेंगे कि एक राममिलन ताउ ज़रूर हुए थे जो राम जी के बहुत बड़े भक्त थे ।“ अपनी प्रशंसा सुनकर राम मिलन भैया प्रसन्न हो गये और उनका आक्रोश हम लोगो के ठहाकों में गुम हो गया ।
(छवि गूगल से साभार)
आपका -शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी गजब रामभक्ति नाले पार करने के लिए..धन्य हुए.

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  2. नाले और सेतुबन्ध की चर्चा अच्छी रही। अब हमारे धैर्य की परीक्षा बहुत हो चुकी। असली बात पर आइए।

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  3. दिलचस्प संवाद। ये बताएं दंगवाड़ा में चम्बल कहां से आ गई? ये कौन सा इलाका है?

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