मंगलवार, 21 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-तीन


इसकी थीसिस पर ओनली फॉर एडल्ट्स लिखा होना चाहिये
शिविर में पहुंचते पहुंचते अन्धेरा हो गया था भूख तो लगी थी लेकिन यह लंच का समय था ना डिनर का । फिर भी भूख का इलाज तो करना था । हमने हमारे भोजन मंत्री भाटीजी को मस्का मारा तो उन्होने हमारे लिये गरमा गरम पोहा बना दिया जिसे हमने बतौर “लनर” ग्रहण कर लिया । लंच और डिनर के बीच के भोजन को हम लोगों ने यह नया शब्द दिया था वैसे ही ब्रेकफास्ट और लंच के बीच के भोजन को हम लोग ’ ब्रंच ‘ और डिनर व सुबह के ब्रेकफास्ट के बीच रात में भूख लगने पर खाये जाने वाले भोजन को हम लोग ’ डिफास्ट ‘ कहते थे । आज टीले पर जाना नहीं हुआ था और पिंजरे में कैद तोते में बसे राक्षस के प्राण की तरह हमारे प्राण भी वहीं अटके थे सो हमने सोचा चलो एक चक्कर लगा लिया जाये ताकि लनर भी हजम हो जाये और अगले “ओम सहना ववतु” तक अच्छी भूख लग आये । बारिश रूक गई थी और आसमान साफ हो चला था इसलिये ठंड भी काफी बढ़ गई थी । अजय गुमसुम सा बैठा था । रवीन्द्र ने कुरेदा तो बोला “क्या करूँ यार भाभी की याद आ रही है ।“ हम लोगों की देखा-देखी वह भी अपनी पत्नी के लिये भाभी का सम्बोधन इस्तेमाल करने लगा था । यहाँ तक कि रवीन्द्र उसे मज़ाक में “भाभी का भैया “कहने लगा था ।
इतने में डॉ. आर्य भी हम लोगों के पीछे पीछे टीले तक आ गये । हम लोगों को चुपचाप बैठा देख “शोले” के हंगल की तरह उन्होने पूछा “इतनी खामोशी क्यों है भाई ?” हमने कहा “कुछ नही सर आज थक गये है । “ “क्या मिला फुलान के टीले पर ?” उन्होने अगला सवाल किया । हमने उन्हे बता दिया । प्रत्युत्तर मे उन्होने बताया कि वे भी कल भाटीजी के साथ फुलान गये थे और वहाँ से 54 सिक्के,कुछ मणि और यक्ष की मृण्मूर्ति का एक साँचा लेकर आये थे । “सर ये यक्षों की पूजा क्यों नहीं होती ?” यक्ष की बात आई तो अशोक ने पूछा । डॉ.आर्य ने बताया कि “ जैसे जैसे हमारे यहाँ देवी- देवताओं की रचना होती गई उनकी संख्या भी बढ़ती गई इसलिये उन्हे पूर्ण देव और अर्ध देव की श्रेणि में विभाजित कर दिया गया ,यक्ष किन्नर ,कुबेर आदि अर्धदेव बन गये और उन्हे पूजा के अधिकार से वंचित कर दिया गया ।“ “ मतलब देवताओं में भी मनुष्यों की तरह वर्ग विभाजन ? “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । मैने कहा “ यार जब मनुष्य ने ही देवता बनाये तो वह अपने सारे गुण दोष भी उन पर आरोपित करेगा और अपने जैसी व्यवस्था भी उनके लिये बनायेगा ।“
रवीन्द्र ने मेरी ओर घूर कर देखा और कहा “तू चुप रह यार, तैने तो अपने लिये बढ़िया बढ़िया यक्षी चुन ली है ,रात दिन उनकी फोटुएं देखता रहता है ।“ डॉ.आर्य ने कहा “अच्छा तुम्हारी थीसिस की बात हो रही है क्या विषय है..”कुषाण शिल्प में नारी प्रतिमाएँ। ” “हाँ सर” रवीन्द्र मुझे छेड़ने के मूड में था “ ये कि नई सर मथुरा म्यूज़ियम से नंगी नंगी यक्षियों की फोटो लेकर आया है शोध-प्रबन्ध में लगाने के लिये ,इसकी थीसिस पर तो ऑनली फॉर एडल्ट्स लिख देना चाहिये ।“ सर हँसने लगे “ ये शरद तो लेकिन अठारह का हो गया है ना ?” “क्या पता सर “ रवीन्द्र ने कहा “ मै तो इसे मुन्ना ही कहता हूँ ।“फिर डॉ.आर्य ने मुझसे पूछा “अच्छा शरद बताओ तुमने इन यक्षी प्रतिमाओं में क्या विशेषता देखी ?” मैने कहा “ सर ये यक्षियाँ स्तम्भों के बाहरी भाग पर उत्कीर्ण है लेकिन शिल्पी ने इनकी माँसलता और उभारों को इस तरह उकेरा है कि ये पूर्णता का आभास देती हैं यद्यपि ये पूर्णतया नग्न हैं लेकिन घुटने तक जाती एक महीन सी रेखा से ऐसा लगता है जैसे वे कोई पारदर्शी वस्त्र पहने हैं।“ “ यही तो है कुषाण काल के शिल्प की विशेषता “ डॉ.आर्य ने कहा । इतने में भैया राम मिलन का ध्यान हमारी बातों की ओर चला गया बोले “ए सरदवा, ये यक्षी-फक्षी का फोटुआ हमे भी दिखाओ भई ।“ हम समझ गये अब कोई गम्भीर बात होने से रही ।(यक्षी की छवि गूगल से साभार)
डायरी में प्रस्तुत मुद्दों पर आपके विचार आमंत्रित हैं
शरद कोकास
शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. मतलब देवताओं में भी मनुष्यों की तरह वर्ग विभाजन-मनुष्यों ने वहीं से ज्ञान प्राप्त किया होगा!!

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  2. ये यक्षिणी हमें पसन्द नहीं आई। देहयष्टि में सही अनुपात का अभाव सा है। कोई और दिखाइए ;)

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