सोमवार, 13 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-एक


नहाये धोये सो बेईमान

बारिश का मौसम नहीं था फिर भी रात भर रुक रुक कर बारिश होती रही । सर्द हवाओं से तम्बू किसी बारिश में भीगे हुए बच्चे की तरह काँपता रहा । हम अपनी गर्म रज़ाइयों में ,माँ की गोद में दुबके बच्चे की तरह आराम से सोते रहे ।सुबह देखा तो रज़ाईयाँ का ऊपरी हिस्सा और गद्दों का बाहरी हिस्सा गीला हो चुका था । अजय ने चीख कर कहा “अरे वा ! मैं कह रहा था ना आज काम नहीं हो सकेगा । “ मैने कहा “ज़्यादा खुश मत हो वैसे भी यहाँ भाभी नहीं है जो तुम्हे भजिया तल तल कर दे ।“ पत्नी की याद आते ही बेचारा अजय उदास हो गया । इतने में दूर से छाता लगाये डॉ. वाकणकर आते दिखाई दिये । हमें पता था वे मुँह अन्धेरे ही ट्रेंच की स्थिति देखने निकल गये होंगे । एक पुरातत्ववेत्ता की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में प्राचीन अवशेषों को कैसे बचाया जाये । ज़्यादा बारिश हो तो टीले की मिट्टी गीली होकर ढह जाती है, निखातों में पानी भर जाता है फिर उसे पम्प से निकालना पड़ता है । वे लोग जो बार बार संस्कृति बचाने की दुहाई देते हैं ,बचाने की इस व्यावहारिक कठिनाई से नावाकिफ़ होते हैं । हमें जागा हुआ देखकर सर खुश हो गये “ अरे वा ! जाग गये सज्जनों, चलो आज पास में फुलान है वहाँ चलते हैं । आज तो वैसे भी काम तो नहीं हो सकेगा आज गुरुवार है ना गाँव में हाट लगने के कारण मज़दूरों की छुट्टी है ।“ अब हमें पता चला काम बन्द होने का असली कारण यह है ना कि बारिश । “ आलस क्या कर रहे हो चलो जल्दी नहाओ धो और तैयार हो जाओ नाश्ता करो फिर चलते हैं “ उन्होनें हमारी पलटन को आदेश दिया । अब असली समस्या यह थी के इतनी ठंड में नहाये कौन । अशोक त्रिवेदी ने कहा “भाई मै तो नहाने से रहा उसके बदले मैं नहाने के मंत्र का जाप कर लेता हूँ “ और वह पंडितों वाली स्टाइल में शुरू हो गया “ऊँऊँ..ओ ओम हाथ धोये हत्यारा ,पाँव धोये पापी, नहाये धोये सो बेईमान, पूजा-पाठ करे सो दुर्गुण की खान ओ ओम छोड़ पानी ... “ उसकी इस अदा पर हम लोग हँसते हँसते लोट-पोट हो गये । लेकिन हँसने से फायदा यह हुआ कि शरीर में थोड़ी गर्मी आ गई । अजय ने कहा “ भई अपना भी नहाना कैंसल उसके बदले अपन नहाने की गोली खा लेते हैं । स्नान पर्व पर यह दूसरा चुटकला था । बहर हाल रवीन्द्र ने कहा “ में तो भाई बिगेर नहाये नहीं रह सकता ।“रवीन्द्र का साथ तो मुझे देना ही था सो हम दोनों ने अपने वस्त्र लिये और चम्बल-स्नान करने चल दिये ।(चित्र गूगल से साभार)
आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. नहाने की गोली तो पता थी मगर मंत्र पहली बार पढ रहा हूं।सच है पुरातात्विक धरोहरो का संरक्षण आसान नही है।इसमे आदरणीय वाकणकर साब जैसे लोगो के मज़बूत इरादे ही काम आते है

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  2. "सर्द हवाओं से तम्बू किसी बारिश में भीगे हुए बच्चे की तरह काँपता रहा । हम अपनी गर्म रज़ाइयों में ,माँ की गोद में दुबके बच्चे की तरह आराम से सोते रहे ।"


    यह तो काव्य है। किसी उर्दूदाँ को दे दो तो ग़जल के दो शेर बना दे। कितनी ही ऐसी लाइनें हम ब्लॉगर यूँ ही ढकेल देते हैं;) और लोग कहते हैं कि ब्लॉग में साहित्य नहीं है।

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