गुरुवार, 23 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-चार


कुबेर की भी कहीं पूजा होती है ?
खाना खाकर जब हम लोग अपने तम्बू में पहुंचे तो पता चला कि बिस्तर अभी तक नम हैं । हाँलाकि फुलान जाने से पहले हम उन्हे डंडा-वंडा लगाकर टांग गये थे ताकि रात मे सोने तक वे सूख जायें । “ चलो कोई बात नहीं शरीर की गर्मी से सूख जायेंगे” मैने कहा । लेकिन बिस्तर में घुसने पर पता चला कि नमीं के अलावा यहाँ ठंड का भी सामना करना है गनीमत की थकान हम पर हावी थी और मेहनत से थके हुए शरीर को नींद में जाने से वह नहीं रोक सकती थी ।
सोने से पहले एक बार दिन भर की गतिविधियों की चर्चा भी ज़रूरी थी सो हमने आज प्राप्त प्रतिमाओं अपनी बात शुरू की । “क्यों यार कुषाण पीरियड से पहले अपने यहाँ मूर्तिशिल्प का कोई कंसेप्ट नहीं था क्या ? “ अजय ने पूछा । रवीन्द्र ने बताया “ था तो लेकिन उसका कोई संगठित रूप नहीं था अगर ऐसा होता तो बुद्ध के जीवन काल में ही उनकी मूर्तियाँ बन जाती , वह तो बुद्ध के दो-तीन सौ साल बाद पश्चिमोत्तर से कलाकार आये और उन्होने जनता की श्रुति के आधार पर मूर्तियाँ गढ़ीं ।“ “ श्रुति के आधार पर मतलब ?” अजय ने पूछा । “मतलब उन्होनें लोगों से पूछा बुद्ध कैसे दिखते थे तो लोगों ने बताया विशाल,भव्य, जैसे उनके पीछे कोई प्रभामंडल हो । बस वैसी ही मूर्तियाँ उन्होने गढ़ीं जबकी वास्तव में बुद्ध तो तपस्या के कारण कृशकाय हो गये थे ।“ रवीन्द्र ने कहा । “
भाई हमारे देश में तो लोगों को पूजा से मतलब है , मूर्ति की सुन्दरता कौन देखता है “ मैने कहा । “और क्या “ रवीन्द्र बोला ” तुम्हे याद नहीं अपन भानपुरा गये थे जहाँ कुबेर की पूजा अन्नपूर्णा माता के रूप में हो रही थी। “ “ ये क्या किस्सा है ? ” अजय ने सवाल किया । “अरे वो बड़ा मज़ेदार किस्सा है “ मैने कहा “ आज से दो माह पूर्व मैं रवीन्द्र के साथ उसके गाँव भानपुरा गया था , सुबह सुबह जब हम लोग घूमने निकले तो देखा एक चौक पर बहुत भीड़ लगी है ,मैने रवीन्द्र से पूछा यहाँ क्या हो रहा है तो उसने बताया कि यहाँ अन्नपूर्णा माता की पूजा हो रही है । करीब जाकर मैने देखा तो वहाँ कुबेर की मूर्ति रखी थी तुन्दिल काया ,कानों मे बड़े बड़े कुंडल ,हाथ में धन की थैली । मैने रवीन्द्र से कहा “ रवीन्द्र यह तो कुबेर है , इसकी तो पूजा नहीं होती है ” तो रवीन्द्र बोला “ धीरे बोल अगर कोई सुन लेगा तो बहुत मार पड़ेगी । अब लोगों ने इसे अन्नपूर्णा माता मान लिया है तो मान लिया ,तू इसे कुबेर बतायेगा तो फालतू का बवाल खड़ा हो जायेगा ।“
मैने कहा “ लानत है हमारे प्रतिमा विज्ञान पढ़ने पर, यहाँ तो पत्थर पर सिन्दूर पोतकर उसे हनुमानजी बना दिया जाता है ।“ “ और यह हनुमानजी सरकारी जमीन पर बेजा कब्जा करने के काम आते हैं। “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया और तानकर सो गया । हम लोगों ने भी अपने रज़ाई कम्बल ताने और बजरंग बली की जय कहकर सो गये (चित्र गूगल से साभार )

5 टिप्‍पणियां:

  1. कथा का पहला पड़ाव? शंख ध्वनि करें? बजरंग बली की जय।

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  2. vaise to yam ki pooja kahin nahee hoti hai par kisi purush ko mata ke roop men poojne ka pahla maamla dekha hai. Dilchsap

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