बुधवार, 15 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन -दो

पुरातत्ववेत्ता बनना है या पुलिसवाला

नदी के घाट से हम लोग लौट कर आये तो देखा डॉ.वाकणकर , किशोर ,अशोक,राममिलन और अजय तैया
र खड़े थे।आकाश में बादल ज़रूर थे लेकिन बारिश थम गई थी । हम लोग पैदल पैदल दंगवाड़ा के लिये रवाना हो गये और वहाँ पहुंचकर सड़क पर बस की राह देखने लगे । थोड़ी देर में बस आई जिसमें सवार होकर हम लोग नरसिंगा तक गये । नरसिंगा ,दंगवाड़ा से सात किलोमीटर दूर इंगोरिया गौतमपुरा मार्ग पर स्थित है । वहाँ से पूर्व में लगभग एक किलोमीटर पर है फुलान का टीला ।फुलान के टीले पर एक्स्प्लोरेशन करते हुए हमे अनेक महत्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त हुईं जिसमे दो टेराकोटा बुल ,स्वास्तिक चिन्हों से युक्त सिक्के,आहत सिक्के मिट्टी के बाँट,तथा कुषाण कालीन मिट्टी के मृद्भांडप्राप्त हुए
सब लोग तन्मयता से टीले पर बिखरे पड़े अवशेष ढूँढने में लगे थे कि अचानक अजय ने सवाल किया “ यार ये मृद्भांड मिट्टी के ही क्यों होते हैं, ताम्बे के या सोने चान्दी के क्यों नहीं होते ? “ रवीन्द्र ने ज़ोरदार ठहाका लगायाऔर कहा “ अरे बेवकूफ मृद्भांड हैं तो मिट्टी के ही होंगे ना , मृदा का अर्थ ही मिट्टी होता है ,तेरे से इसलिये कहा थाकि सुबह सुबह नहा लिया कर , नहाने की गोली खाने से ऐसा ही होता है ।“ अजय बेचारा बगलें झाँकने लगा ।चलो रे सज्जनों “ इतने में डॉ. वाकणकर की आवाज़ आई “ यह सब अवशेष झोले में रख लो ,चलो अब गाँव चलतेहैं “ गाँव जाकर क्या करेंगे सर ? “ अशोक इतनी ही देर में ऊब गया था । “ अरे चलो तो यहाँ बहुत सुन्दर मन्दिरऔर मूर्तियाँ हैं ।“ सर ने कहा । मै समझ गया था अशोक को सिगरेट की तलब लगी है मैने धीरे से कहा “ चल तो तेरे लिये भी वहाँ इंतज़ाम है किसी भी मन्दिर के पिछ्वाड़े जाकर... “ इतना सुनना था कि अशोक फट से तैयार होगया । हमारी कानाफूसी सर की कुछ समझ में नहीं आई ।
गाँव में प्रवेश से पहले ही बाहर एक चबूतरे पर हमें गणेश की एक दक्षिणावर्त प्रतिमा के दर्शन हुए । “अरे वाह “ डॉ.वाकणकर ने कहा “ श्री गणेश तो अच्छा हुआ है “ आगे बढ़ते ही हमे एक और चबूतरे पर नन्दी पर आसीन शिव-पार्वती की प्रतिमा, गरुड़ पर आसीन लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा,जटाधारी शिव और भैरव की प्रतिमा भी मिली । सर ने बताया “ध्यान से देखो यह सब नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी की परमार कालीन शिल्प की प्रतिमायें हैं “ मतलब यहाँ परमारों का शासन रहा है ?” अशोक ने पूछा । “और क्या “ सर ने कहा “उनके बहुत से अभिलेख भी यहाँ मिलते हैं ।“ इतने में पास के ही एक चबूतरे से अजय ने आवाज़ दी “ सर मेरी समझ में नहीं आ रहा यह किसकी प्रतिमा है ।“ सर के साथ हम लोग भी वहाँ पहुंचे । अजय एक टूटी-फूटी प्रतिमा को लेकर अपना सिर खपा रहा था । “ देखो “सर ने कहा “ किसी भी प्रतिमा को पहचानने के लिये उसके लक्षण देखना ज़रूरी है ,जैसे विष्णु के चार हाथ जिनमें शंख,चक्र,गदा और पद्म याने कमल का होना अनिवार्य है । अब इसमें हाथ तो सब टूट गये हैं लेकिन अन्य लक्षण जैसे मुकुट है और इस टूटे हुए हाथ की बनावट नीचे की ओर है जिसके नीचे गदा साफ दिखाई दे रही है मतलब यह विष्णु की प्रतिमा हो सकती है । “ सर अगर यह गदा भी टूट जाती तो “अशोक ने पूछा तो हम शंख चक्र पद्म को ढूंढते “सर ने कहा । “ और सर ये शंख चक्र भी नही होते तो ? “ अशोक ने फिर पूछा । “ तो हम आभूषणों से या मुकुट से या वस्त्रों से पहचान करते “ सर ने कहा । “ और सर आभूषण भी नहीं होते तो ? “ अशोक ने फिर सवाल दागा ।“ डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ तुम ये बताओ यार तुम्हे पुरातत्ववेत्ता बनना है कि पुलिसवाला , अरे कुछ भी नहीं रहता तो फिर पत्थर और प्रतिमा में फर्क ही क्या रह जाता । शिल्पकार की उंगलियों से उकेरे प्रतिमा के ये लक्षण ही तो पत्थर को भगवान बनाते हैं । चलो आज का काम खतम ,भूख लग रहीहै वापस चलें ।
हम लोगों ने घड़ी देखी शाम के चार बजने वाले थे और हम लोगों ने लंच भी नहीं लिया था इसलिये वापस जाना तो ज़रूरी था । लौटते हुए मैने भूख से ध्यान हटाने के लिये एक पहेली बुझवाई “ मानलो आज से हज़ार साल बाद का दृश्य है जब डॉ. वाकणकर की ऐसी ही भग्न प्रतिमा मिलती है और एक जन कहता है कि “ यह तो विष्णु की प्रतिमा है “ बताओ वह सच कहता है कि झूठ ? किशोर बोला “ वह झूठ बोलता है “ मैने कहा
“ “ "नहीं वह सच बोलता है जानते नहीं डॉ. वाकणकर का पूरा नाम विष्णु श्रीधर वाकणकर है “( चित्र गूगल से साभार)

(यह 25 वर्ष पुरानी बात है जो मैने विनोद में कही थी लेकिन आज आप उज्जैन के फ्रीगंज मे भारती कला भवन में डॉ.वाकणकर की प्रतिमा देख सकते हैं)

आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. शरद जी,
    सादर वन्दे !
    मै सरस्वती नदी के तीर्थों पर शोध कर रहा हूँ, और मेरे शोध के आधार स्तम्भ डॉ श्री विष्णुधर वाकणकर जी है, आपके पोस्ट से विद्वता कि झलक मिली और आपने डॉ श्री विष्णुधर वाकणकर जी का उल्लेख किया है , इसलिए आप से क्या मेरे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है ?
    उत्तर कि प्रतीक्षा में
    रत्नेश त्रिपाठी

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  2. ज्ञानवर्धक जानकारियाँ।

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  3. दंगवाड़ा, इंगोरिया,नरसिगा,गौतमपुरा आदि जगहें कहाँ हैं महोदय? एक बात और बताइए कि प्रतिमाओं के सौन्दर्यशास्त्र पर भी पुरातत्त्ववेत्ता लोग कुछ काम करते हैं क्या? पुरानी मूर्तियों का सौन्दर्य आज कल की प्रतिमाओं में क्यों नहीं मिलता?

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