शनिवार, 4 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-पाँच


कौनो नचनिया नहीं है नौटंकी मे ?
बिलकुल गाँव जैसा गाँव था दंगवाड़ा । पतली पतली गलियाँ,झोपड़ियों के छप्पर इतने आगे तक झुके हुए कि देखकर नहीं चलो तो सर टकरा जाये । गलियों में खेलते बच्चे हम लोगों को उचटती निगाह से देखते और फिर अपने खेल में लग जाते । एक बूढ़ा ओसारे में बीड़ी के कश खींचता हुआ आसमान में छाये बादलों की ओर देख रहा था । उससे हमने पूछा “कईं बासाब चाय की दुकान कठे हे ?” उसने गाँव के बाहर जाने वाली सड़क की ओर इशारा किया और फिर बीड़ी पीने में मग्न हो गया । बूढ़े के बताये रास्ते पर हम चलते गये लेकिन दुकान कहीं नहीं दिखी । हमे लगा बूढ़े ने कहीं बेवकूफ तो नहीं बना दिया फिर सोचा नहीं ऐसा तो शहर वाले लोग करते हैं यह बूढ़ा बेचारा क्यों करेगा । आखिर में गाँव के बाहर इंगोरिया वाली पक्की सड़क पर आ गये । गावों में अक्सर इस तरह की दुकानें गाँव के बाहर पक्की सड़क पर ही होती हैं ताकि आने जाने वालो से भी उनका व्यवसाय चल सके । नज़र घुमाई तो चाय-पान की एक गुमटी नज़र आई । हम लोगों ने पहुंचते ही ऑर्डर किया “भई जल्दी से चाय पिलाओ” और पटिये पर बैठ गये । चाय कम- पानवाले ने पान पर चूना लगाते हुए जवाब दिया “ दूध खतम हो गया है साहब” यह तो आसमान से गिरकर खजूर पर लटकने जैसी स्थिति थी । इतनी दूर से चाय की तलाश में आये और यहाँ दूध नदारद । अजय ने आगे बढ़कर कहा “ कोई बात नहीं ,दूध कहाँ मिलता है बताओ ,हम ले आते हैं ।“ “ अभी नहीं मिलेगा साब, अभी टेम नहीं हुआ है “ चाय वाले ने बेरुखी से जवाब दिया । “ऐसे कैसे नहीं मिलेगा तुम गंजी तो दो “ चाय वाला मुस्कुराया जैसे उसे हम पर विश्वास ना हो फिर गंजी पकड़ाते हुए कहा “ लो देख लो साब वो सामने वाले घर में मिलता है । “
चाय वाले के बताये घर में पहुंच कर हम लोगों ने पूछा “ दूध है ?” वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा “दूध तो कोनी “ वह समझने की कोशिश करे इससे पहले मैने उससे कहा “ वो सामने चाय वाले को चाहिये हमें चाय पीनी है लेकिन उसके पास दूध नहीं है । ”मुझे लगा शायद चायवाले के नाम से दूध मिल जायेगा । “ऐसे बोलो ना साहब, लेकिन दूध को तो अभी टेम है “ फिर इससे पहले कि हम समझ पाते उसने भीतर की ओर आवाज़ लगाई “बेटा जरा चा बनाना ।” हम लोगों की तो बाछें खिल गईं । हम लोगों ने उसके साथ साथ उसके गाँव की तारीफ भी करनी शुरू कर दी । हाँलाकि वह सब समझ रहा था कि ये शहर वाले सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये उसकी तारीफ कर रहे हैं । खैर बातचीत के बीच चाय भी आ गई और हमने पी भी ली और चाय लाने वाली उसकी बेटी के बारे में यह जानकर कि वो स्कूल नहीं जाती है उसके बाप को सलाह भी दे दी कि लड़कियों को पढ़ाना चाहिये, एक लड़की को पढ़ाने का अर्थ एक परिवार को पढ़ाना होता है, वगैरह वगैरह । उसके बाप ने सिर्फ इतना कहा कि” बेटी भी काम पर जाती है तभी घर चलता है साब गरीबी हमारी मजबूरी है ।“ अच्छा भाई चलें राम राम” राम मिलन भैया ने अपनी जेब से पर्स निकाला और दस का एक नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा “लो भैया ।” वह ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया “ अरे मालिक आप लोग तो पहुना हो आप से कैसे पैसे ले सकता हूँ “ राम मिलन उसकी गरीबी से काफी द्रवित हो गये थे “ कोई बात नहीं दूध के तो ले लो “ नई साब,” उसने कहा “ दूध तो घर का ही बचा था उसके काहे के पैसे ? “ हम लोग निरुत्तर थे और सोच रहे थे काहे हम अब तक इस गाँव को सिटी कहकर इसका अपमान कर रहे थे ।
गाँव की आत्मीयता और शहर की स्वार्थ से भरी ज़िन्दगी के बारे में अपना फलसफा बघारते हुए हम लोग बाहर निकले ।“अब क्या प्रोग्राम है ?” रवीन्द्र ने एक सार्वजनिक सवाल किया । बातचीत में हमें यह मालूम हुआ था कि गाँव में यू.पी. से कोई नौटंकी पार्टी आई है । “चलो वहाँ चलते हैं “ मैने कहा ।“ लेकिन अभी वहाँ क्या मिलेगा नौटंकी तो रात में होगी” अजय ने कहा । नौटंकी का नाम सुनकर राम मिलन भैया की आँखों में चमक आ गई थी ।“ चलो तो देखत हैं का खेला है आज । ”उन्होने कहा । “चलो जैसी पंचों की राय “ मैने कहा और हम लोग पूछते हुए उस दिशा में बढ़ गये ।
गाँव के बीचों बीच एक चौराहा था जहाँ एक मंच बना था और उस पर रंगबिरंगे पर्दे लगे थे किसी पर बडा सा मोर , किसी पर बडा सा पेड़ । हमने पता किया नौटंकी तो रात को होने वाली थी और फिलहाल शाम के लगभग सात बजे थे । हमने सोचा चलो बातचीत कर टाइमपास किया जाए । ‘’ कौन कौन से खेल करते हो आप लोग ‘’ मैनें नौटंकी वाले से पूछा .. “अरे भैया सब खेल करते है..”उसने कहा “ राजा हरिश्चंन्द्र , सुल्ताना डाकू , गुल बकावली , सब्जपरी और गुलफाम ।‘’ यहां कौन सा खेल लेकर आए हो । मैने फिर पूछा । उसने बताया ‘’यहाँ तो भैया, राजा हरिश्चंन्द्र खेल रहे हैं । गाँव में तो यही ज्यादा पसंद किया जाता है ।“ राममिलन भैया इतनी देर मे भीतर ग्रीन रुम में प्रवेश कर गए थे । वहीं से उन्होने चिल्लाकर पूछा । ‘’ कौनो नचकारिन नहीं है भैया नौटंकी में ? हम लोगों की भी आँखे चमक उठी और राममिलन जी के बहाने हम लोग भी भीतर प्रवेश कर गए । देखा, एक ओर हारमोनियम ,सारंगी , क्लेरेनेट , तबला ,नगाड़ा और बेंजो रखे हैं । कुछ पात्र बैठे हुए सुस्ता रहें है । एक दो कलाकार मेकअप की तैयारी कर रहें हैं, नचकारिन के बारे में पूछने पर पता चला कि इस नौटंकी में पुरुष ही महिला पात्र का अभिनय करते हैं । हम लोगों ने अपना परिचय दिया और बताया कि रात को हम लोग नौटंकी देखने ठहर नहीं सकते हैं,बाहर से आये हैं । राममिलन ने इतनी देर में कलाकारों से दोस्ती गांठ ली थी , बोले “कौनो बात नहीं भैया , एकाध डायलाग ही सुनादो ।“ कलाकार , हम शहर के लोगों को देखकर वैसे ही प्रभावित थे । एक कलाकार आगे आया और बोला साहब , एक सीन आपको दिखा देते हैं । उसने अपनी मुद्रा संभाली और कहा .. चलो राजकुमार गुलफाम का एक डायलाग बताते हैं । फिर एकदम नाटकीय अंदाज में कहा ...
“मैं खास हूँ – नहीं कोई आम हूँ .. मैं गुलफाम हूँ ...
मेरे बिना जहर में जहर नही हैं , मेरे बिना कहर मे कहर नही है” फिर अपनी तलवार उठाई और ज़मीन पर उसकी नोक टिकाते हुए
कहा .. “ज़मीं से लगा दूँ ज़मीं छेद डालूँ ..आसमाँ से लगा दूँ आसमाँ भेद डालूँ ..मैं खास हूँ नहीं कोई आम हूँ मैं गुलफाम हूँ .” उसके इस प्रदर्शन पर हम लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं और फिर आने का आश्वासन देते हुए बाहर निकल आये ।
लौटते समय अंधेरा हो चुका था । हवाएँ तेज़ तेज़ चल रही थीं और बूँदाबाँदी भी होने लगी थी । नाले तक का रास्ता तो समझ आ रहा था लेकिन नाले में कुछ नज़र नहीं आ रहा था । सेतु के वे पत्थर जिन पर राम मिलन जी ने खड़े होकर प्रार्थना की थी थोड़े बहुत समझ में आ रहे थे खैर जैसे तैसे हम लोगों ने नाला पार किया और इससे पहले कि बारिश शुरू हो जाती अपने तम्बुओं में लौट आये ।
(चित्र गूगल से साभार )
आपका शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. पुरातत्वेत्ता को कितना श्रम करना पड़ता है यह तो डॉ भगवतशरण उपाध्याय की पुस्तकों और संस्मरणों से ही पता चला था। आज सुबह ही उनकी पुस्तक 'पुरातत्व का रोमांस' मे हाईनरिख श्लीमान की ट्रॉय खोज का वर्मन पढ़ रहा था।
    आपके अनुभवों में उसके पीछे की बहुत सी बातें पता चल रही हैं जो डॉ उपाध्याय के लेखन का हिस्सा शायद नहीं बनी। जड़ों से जुड़ रहे हैं हम। पुरातत्व का ककहरा सीख रहे हैं।
    खिलंदड़े प्रसंग इसे रोचक बना रहे हैं। गुडजी।

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  2. अब ठीक है। हमको छोटा कैनवास अच्छा नहीं लगता। बड़ा कैनवास पकड़ो और ब्रश को बिन्दास चलाओ, सीधे आड़े तिरछे -
    छू छा छं।
    लोग रह जाएँ दंग।

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  3. मनोरंजक प्रस्तुति. अजित जी ने शायद पूछा था की दंगवाड़ा कहाँ है. क्या बताएँगे? हम भी उत्सुक हैं.

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