शुक्रवार, 12 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन -सात


डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो
“इतिहास भी यार बड़ी मज़ेदार चीज़ है “ अशोक त्रिवेदी ने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए कहा । “बचपन में ,स्कूल में गुरूजी कहा करते थे ,’हिस्ट्री जाग्रफी बड़ी बेवफा,रात को रटो और दिन को सफा ‘” “हाँ, इसलिये तो लोग मज़बूरी में पढ़ते हैं इसे ,हम लोग भी प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति और पुरातत्व में एम.ए. इसलिये नहीं कर रहे हैं कि इस डिग्री के बाद कहीं ठीक ठाक नौकरी मिल जाये? ‘ अजय ने प्रतिक्रिया व्यक्त की । “और नहीं तो क्या,”रवीन्द्र कहने लगा “कितना मुश्किल है यार लम्बी लम्बी वंशावलियाँ रटना ,वही राजा-महाराजाओं के किस्से,युद्धों की कहानियाँ,राजनैतिक षयंत्र ,नाच-गाने की महफिलें, हरम की ऐयाशियाँ,भूत-प्रेतों की तिलिस्मी कथायें..” “नहीं नहीं ऐसा नहीं है “ मैने उसे बीच में टोका “इतिहास तो हमारा अपना ही अतीत है । जैसे हम रोज़मर्रा के जीवन में अपनी पिछली सफलताओं और असफलताओं से सबक लेते हैं इतिहास से सबक लेने का अर्थ भी यही है । अपनी गलती से सबक लेना जैसे व्यक्तिगत हित में है वैसे ही मनुष्य जाति के इतिहास से सबक लेना सम्पूर्ण मनुष्यता के हित में है । “ ठीक है “ अजय ने कहा “ लेकिन इतिहास सही है या गलत यह कौन बतायेगा ? हम तो वही इतिहास जानेंगे ना जो हमे पढ़ाया जायेगा ? कुछ इतिहास हमे अंग्रेजों ने पढ़ाया कुछ उनके वंशज पढ़ा रहे हैं बचपन से अपनी किताबों में यही सब ऊल-जलूल चीजें तो पढ़ रहे हैं हम लोग इतिहास के नाम पर “ “ नहीं पूरी तरह ऐसा नहीं है “ मैने दलील दी “ गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने यहाँ का इतिहास लिखा जाहिर है उसमें उन्होने अपनी प्रशंसा की होगी उनके विरोध में हमारे यहाँ के लोगों द्वारा जो इतिहास लिखा गया उसमें अपनी संस्कृती का गौरव गान कुछ अतिशयोक्ती लिये अवश्य था क्योंकि उस समय अंग्रेजों से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना ही यहाँ के आम जन का उद्देश्य था और आज़ादी और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये यह अनुचित भी नहीं था ज़ाहिर है उस समय के इतिहासकार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लेखन कर रहे थे और केवल इतिहास में ही नहीं साहित्य में भी इसी तरह का लेखन हो रहा था स्वतंत्रता की चेतना के लिये आव्हान गीत लिखे जा रहे थे, अपने सुमन जी का ही गीत ले लो..”युगों की सड़ी रूढ़ियों को कुचलती /ज़हर की लहर सी लहरती मचलती /अन्धेरी निशा में मशालों सी जलती /चली जा रही है बढ़ी लाल सेना..’ अब इसे सुनकर तो ऐसा ही लगेगा जैसे आज़ादी की लड़ाई सिर्फ साम्यवादियों ने लड़ी हो जबकी उसमें और भी लोग शामिल थे “
“लेकिन पूर्वग्रह के साथ लिखे गये इतिहास में झूठ तो शामिल हो गया इस तरह “। अजय ने कहा “हाँ यह सच है “ मैने कहा “लेकिन फिर भी इसे पूरी तरह नकारा तो नहीं जा सकता और फिर इसके अलावा फिलहाल कुछ है भी तो नहीं हमारे पास ठीक है ,तुम ही लिखना नया इतिहास, डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो.. अपुन को तो कहीं मास्टर-वास्टर की नौकरी मिल जाये अपने लिये बहुत है “ अजय उबासी लेते हुए बोला “और बच्चों को वही इतिहास पढ़ाएंगे जो हमारे बाप –दादा पढ़ाते रहे “अशोक ने चुटकी ली “ठीक है,ठीक है हेरोडोटस,थूसीदीदस,इब्त खल्दून,मैकियावेली,ट्वायनबी,इवेल्यान,और मार्क्स के वंशजों रात बहुत हो गई है अब सो जाओ “ रवीन्द्र ने अपना अंतिम फरमान ज़ारी करते हुए कहा
आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. शरद जी
    इतनी अच्छी कविता हमारे ब्लाग में डालने के लिए हम आपके आभारी है। इस तरह का प्यार और स्नेह सदा बनाए रखें।

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  2. पंडित जी सही लिखा आप ने.
    धन्यवाद

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  3. गलती के लिये माफ़ी चाहूंगा पडित जी की जगह शरद कोकास पढिये

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