मंगलवार, 26 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-दो

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इस जंगल में हमारे लिये यह पहला मनोरंजन कार्यक्रम था। बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर। पास ही चम्बल नदी बहती थी। हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने। लौटकर आये तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई। चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुंच गये। यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही।
अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में। बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव । शांत वेग से बह रही थी चम्बल । हवा चलती तो चाँन्द का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता।वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे।
डॉ.वाकणकर ने जिस ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश मे थी,उसे जगाना उचित नहीं समझा हमने और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे। उसके भीतर अन्धेरा था ,सदियों पुराना अन्धेरा। ऐसा लगा उसकी गहराई में कोई रंगमंच है,जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है। “सुन सुन”अजय ने कहा “घोडों की टापों की आवाज़ आ रही है” “बस कर यार” रवीन्द्र बोला,”जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं,यह बलगम की आवाज़ होगी।“
कल दिन में निखात के उस अन्धेरे से साक्षात्कार करेंगे यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गये। मैने कमर सीधी करनी चाही। पूरा आसमान मेरी आंखों के सामने था और उसमे चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद। बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद,संघर्षों का ये दिया चांन्द.चन्दा ने कभी रातें पी थीं, रातों ने कभी पी लिया चाँन्द “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल मे अध्ययन के दौरान कवि रमेश दवे से यह गीत सुना था।
“बस कर यार”शीत ऋतु में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है?रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया। और वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई, पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चान्दनी कैसी॥ चांदनी चांदनी चांदनी....।
आपका शरद कोकास

1 टिप्पणी:

  1. भैय्या जल्दी बताईये की टीले के अन्दर से क्या क्या मिला. भूमिका बहुत हो गयी

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