सोमवार, 25 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-एक

फरवरी माह की बस शुरुआत ही हुई थी । सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं इसलिए बसंती हवाओं के लिए उन्होंने अपने दरवाज़े पर सख्त़ मुमानियत की तख्ती लगा दी थी । फिर भी सूर्य अपनी समय सारिणी के अनुसार ही चल रहा था । हमारे दंगवाड़ा पहुँचते पहुँचते दरख्तों के लम्बे सायों के पीछे से अँधेरा झांकने लगा था । दंगवाड़ा ग्राम की मुख्य सड़क पर एक चाय की टपरी वाले से पूछने पर पता चला कि वह टीला जिस पर विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में खुदाई हो रही है , गाँव से एक किलोमीटर भीतर जंगल में है । हम लोग जिस वाहन में थे, वह युनिवर्सिटी की एक पुरानी जीप थी । हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जाएगी या नहीं या फिर हमें अपना बिस्तरबन्द लादकर वहाँ तक पैदल ही जाना होगा ।

ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “ भैया, मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैंने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना ही लिया है । आपको किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है । चलो फिर ठीक है । ” रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली । उस दिन पूर्णिमा थी और फरवरी की उस धुंधलाती हुई शाम के विदा लेने की प्रतीक्षा करता हुआ बड़ा सा चांद बस निकलने ही वाला था । डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था । खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुँचा दी ।

            अद्भुत द्रश्य था वहां । जाने कितने बरगद अपना आंचल फैलाये खड़े थे और उनके नीचे सफ़ेद तम्बुओं की एक कतार थी । तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी । गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मज़दूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई है और लोग उसे घेरे खड़े हैं । पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आ गए थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बातें  कर रहे थे । हम सभी छात्रों ने उन्हें प्रणाम किया । उन्होंने नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..” कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो, न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो, अणि लिए  अणे चक्कर अईया, अबार होश में अई जांगा..” “ नई बा साब ” ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “ अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे, ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..”


डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ यदि ऐसा होता तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था , मैं तो ऐसे कई टीलों की , कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ , और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा - वात्मा नहीं होती  , सब फालतू बात है ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है । उन्होंने  कहा “ देखो , यह होश में आ गई है , इसे घर ले जाओ ठीक से खाना - वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जाएगा । और आइन्दा से फालतू उपवास करने की कोई ज़रूरत नहीं । “ इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए… “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।”  मैं रवीन्द्र, अजय,अशोक और राममिलन  अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ तम्बुओं की ओर चल दिये ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाकणकर जी के साथ आपको काम करने का मौका मिला. आप बड़े सौभाग्यशाली हैं.

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  2. अच्छा लगा पढ़ना....बस आगे के पन्ने भी मिलते रहे पढ़ने को.

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  3. बहुत आभार,
    सफ़र चालू रखें।

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  4. गांव के ओझाओं का धंधा तो इन्हीं अन्धविश्वासों पर चलता है. अच्छा लगा आपका संस्मरण सुनना.

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  5. आभार भईया । आदरणीय सुब्रम्‍हण्‍यम जी के साथ ही पुरातत्‍व पर आपके भी अनुभव व विचार से हिन्‍दी ब्‍लागजगत परिचित हो रहा है , आगे की कडियों का इंतजार रहेगा ...

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  6. अरे हम भी शामिल हैं भाई साहब आपके इतिहास में :-)

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