सोमवार, 25 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-एक

हमारे दंगवाड़ा पहुँचने से पहले ही अन्धेरा अपने पाँव पसार रहा था । पता चला कि वह टीला जिस पर खुदाई हो रही है,गाँव से एक किलोमीटर भीतर जंगल में है। हम लोग जिस वाहन में थे, वह जीप नुमा एक पुरानी गाडी थी,युनिवर्सिटी की। हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जायेगी या नहीं वर्ना हमें अपना बिस्तरबन्द वहाँ तक लादकर जाना होगा । ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “भैया मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना लिया है । ‘चलो फिर ठीक है ”रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली ।पूर्णिमा का चान्द निकल रहा था और डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था। खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुंचा दी। तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी। गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मजदूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई थी और लोग उसे घेरे खड़े थे। पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आये थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बात कर रहे थे। हम सभी छात्रों ने उन्हे प्रणाम किया ।उन्होनें नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..”कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो,न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो,अणि लिये अणे चक्कर अईया,अबार होश में अई जांगा..” “नई बा साब ”ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे,ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..” डॉ.वाकणकर हँसने लगे “यदि ऐसा था तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था ,मैं तो ऐसे कई टीलों की कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा –वात्मा नहीं है. सब फालतू बात ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है .उन्होने कहा “देखो यह होश में आ गई है. इसे घर ले जाओ ठीक से खाना –वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जायेगा .इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।” मैं रवीन्द्र, अजय,और अशोक अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ चल दिये ।

शरद कोकास

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाकणकर जी के साथ आपको काम करने का मौका मिला. आप बड़े सौभाग्यशाली हैं.

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  2. अच्छा लगा पढ़ना....बस आगे के पन्ने भी मिलते रहे पढ़ने को.

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  3. बहुत आभार,
    सफ़र चालू रखें।

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  4. गांव के ओझाओं का धंधा तो इन्हीं अन्धविश्वासों पर चलता है. अच्छा लगा आपका संस्मरण सुनना.

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  5. आभार भईया । आदरणीय सुब्रम्‍हण्‍यम जी के साथ ही पुरातत्‍व पर आपके भी अनुभव व विचार से हिन्‍दी ब्‍लागजगत परिचित हो रहा है , आगे की कडियों का इंतजार रहेगा ...

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  6. अरे हम भी शामिल हैं भाई साहब आपके इतिहास में :-)

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