रविवार, 24 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी

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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी
जिन दिनो मैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था, भारत के विख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के सान्निध्य में मुझे उज्जैन के निकट चम्बल के किनारे दंगवाडा नामक स्थान पर उत्खनन का प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ हमें फाईनल ईयर के कोर्स के अंतर्गत एक माह कैम्पिंग करनी थी। मेरे साथ मेरे सहपाठी रवीन्द्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी, अजय जोशी और राम मिलन शर्मा थे। वह एक माह का समय मेरे लिये अविस्मरणीय है। वहाँ मैने पुरातत्ववेत्ताओं (एक उत्खनन स्थल का दृश्य)
के जीवन को बहुत करीब से देखा,उनकी जीवन चर्या, कार्यप्रणाली, लगन,धैर्य,मेहनत और इतिहास सम्बधी ज्ञान देखकर मैने बहुत कुछ सीखा।दरअसल मेरी लम्बी कविता पुरातत्ववेत्ता का बीजारोपण वहीं पर हुआ।इतिहास क्या है?इतिहासबोध क्या है? इतिहास का अध्ययन क्यों आवश्यक है?अतीतग्रस्तता और इतिहासबोध में क्या अंतर है? जैसे ढेरों प्रश्नों के उत्तर मुझे वहाँ मिले।उन दिनों के अनुभवों को मैने अपनी डायरी में लिखा है जिसे मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ।यह रोचक तो है ही साथ ही ज्ञानवर्धक भी। इसमें आपको कहानी, कविता, यात्रा-विवरण,व्यंग,सभी का आनन्द आयेगा ।छात्र जीवन की मस्तियाँ हैं सो अलग।हाँ जिस तरह पुरातत्ववेत्ता का काम होता है,अर्थात शाम को सूरज ढलने पर निखात की खुदाई बन्द उसी तरह पोस्ट के बीच में कहाँ विराम लूंगा मैं नही जानता फिर भी मेरी कोशिश रहेगी कि ऐसे स्थान पर रुकूँ जहाँअगले दिन पढने की उत्सुकता बनी रहे। ऐसा ही हम जीवन में भी तो करते हैं,यदि अगले दिन के लिये कोई सवाल न हो तो ऐसे जीवन का उद्देश्य क्या और ऐसे जीवन में सुख क्या और ऐसा जीवन जीने का अर्थ क्या?
बहरहाल दर्शन की बातें बहुत हो गईं..तो कल से शुरुआत करते हैं.. हाँ बीच बीच में कुछ और जानकारी अपेक्षित हो जैसे इतिहास और कहानी मे क्या फर्क है?क्या पुराणकथायें इतिहास हैं?आदि तो ट्रेक चेंज भी किया जा सकता है।वैसे पुरातत्व के इस छात्र की डायरी मे आपको बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर तो मिल ही जायेंगे ।यह पुस्तक के रूप मे आने से पूर्व आपका मार्गदर्शन और टिप्पणियाँ मेरे लिये महत्वपूर्ण होंगी।
आपका
शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

  1. समझ नहीं आया कि हम कैसे चूक गए. पुरा शब्द से ही हमारा प्रेम पुराना रहा है. चलिए हमें भी एक और साथी मिल गया. आज हमने आपकी सभी प्रविष्टियों को पढ़ लिया. अच्छा लगा. हाँ हम उलझे हुए थे किसी आलेख के चक्कर में. आभार.

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  2. प्रारम्भ करें, हम नयन पसारे बैठे हैं. .
    प्रयास यह रहे कि काल और आम जन जिन्हें जानते हैं, उन इतिहास पुरुषों का सन्दर्भ देते चलें. इससे ब्लॊग से अपनापन बढ जाएगा और समझने में सुविधा भेए रहेगी.
    http://girijeshrao.blogspot.com

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  3. शीर्ष चित्र के सामने आप के उद्गार पढने में नहीं आ रहे हैं. कुछ करें.

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  4. are vaah,
    aapki posts ka besabri se intzaar rahega.
    Yeh blog bookmark kar liya hai.

    Aap, likhna shuru karen, dheere dheere aur log bhi judte jaayenge.

    Neeraj Rohilla

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  5. ...ओह तो शरदजी आप पहले कमिंग अप देते हैं...ब्लॉग क्या हुआ टीवी की टीज है..ब्रेक पर जाने से पहले बता देते हैं कि इसके बाद क्या है...और दर्शक कहीं नहीं जाता...हम भी नहीं जाएंगे मालिक...ब्रेक चाहे तीन मिनट (यहां तीस दिन मानें उसे)...बहुत खूब और सराहनीय..आपके सरोकार। लिखिए और छात्र बन जाइए...शुभकामनाएं

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