बुधवार, 27 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन -तीन

पिछले  अंक में आपने पढ़ा विक्रम विश्वविद्यालय के युवा छात्र पुरातत्ववेत्ता शरद कोकास और उनके मित्र उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नामक स्थल पर डॉ. वाकणकर के निर्देशन में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन शिविर में पहुँच चुके हैं  । फरवरी का महीना है और जंगल में तम्बुओं के भीतर उन्हें पहली रात गुजारनी है । इस पहली रात की शुरुआत होती है उस दास्तान से जब इंसान ने पहली बार किसी को मरते देखा और फिर उसका पहली बार अंतिम संस्कार किया |

पहली बार मरने वाले इंसान की पहली कब्र कैसे बनी 

भोजन के पश्चात तुरंत सोने की आदत नहीं थी , वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके थे कि जब तक कमरों के दरवाज़े खटखटाकर मित्रों से उनका हालचाल न पूछ लें नींद आती ही नहीं थी । सो यहाँ भी किसीको नींद नहीं आ रही थी , सब चुपचाप लेटे हुए तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत देख रहे थे । फरवरी का यह दूसरा सप्ताह था और ठंड जैसे फिर लौटकर आ गई थी । वैसे भी हम शहर में रहने वाले लोग इस बात की कल्पना नहीं कर पाए थे कि जंगल में ठण्ड शहर से ज़्यादा होगी । मैं भी अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था और किसी घुसपैठिये की तरह रवीन्द्र की रज़ाई में घुसकर सोने की कोशिश कर रहा था ।  रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था । ‘ मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगा ‘ की तर्ज़ पर उसने कहा “ मैं अपनी रज़ाई नहीं दूंगा । “ मैंने उससे निवेदन किया..” भाई ,कड़ाके की ठण्ड है , क्यों इस अच्छे खासे उत्खनन कैम्प में एक दिन मेरे अंतिम संस्कार के लिए बर्बाद करना चाहते हो “  , अंततः एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया ।

            लेकिन नींद  का समय अभी कहाँ हुआ था ? अचानक डॉ.वाकणकर की शाम की बात याद करके हँसी आ गई । “ क्यों हँसे ? ” रवीन्द्र ने पूछा । मैंने रवीन्द्र से सवाल किया ” तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो रवीन्द्र ? “रवीन्द्र हँसने लगा..” अभी तो तेरे साथ सो रहा हूँ , कंकाल के साथ सोने के लिए  दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा । ” मैंने कहा “ सही कह रहे हो यार, हमारे यहाँ के डरपोक  लोग कंकाल तो क्या खोपडी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है ।” अंतिम संस्कार शब्द मेरे अवचेतन में अब भी विद्यमान था और मैं पहले मनुष्य के अंतिम संस्कार के विषय में सोच रहा था । मेरी बात सुनकर रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा .. “क्या ? ” मैंने कहा “ हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है । ” “ वो कैसे ? ” रवीन्द्र ने पूछा । मैंने बताया “ कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, गनीमत सभी जगह यह प्रथा नहीं है , दक्षिण अफ्रीका और योरोप में शव जलाने की प्रथा होती  तो हमें पृथ्वी के पहले पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।“


           
 अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था । उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेंका और धुएँ के केंद्र में अपनी निगाहें स्थिर करते हुए कहा ” मैं सोच रहा हूँ पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..। ” मैंने कहा “ ना गाडा गया था , ना जलाया गया था । पहली बार जब मनुष्य ने मनुष्य की मृत देह देखी होगी तो उसकी  समझ में आया ही नहीं होगा कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है । वह बहुत देर तक बैठा रहा होगा उसके पास कि शायद यह फिर से हिलने - डुलने लगे लेकिन जब कुछ नहीं हुआ होगा तो वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया होगा । लौटकर आने के बाद उसने देखा मृत देह को जानवर खा चुके हैं । उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा होगा । आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य जो उसके साथ रहता था । यहीं पर पहली बार मनुष्य को आत्मा का ख्याल आया होगा । अगली बार उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिए  उसके चारों ओर, और उसके ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये । इस तरह मनुष्य की पहली कब्र बनी  और इसी तरह मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार हुआ ।” “पहला और अंतिम का जवाब नहीं भाई । ” रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा ” लेकिन अब सो जाओ.. नहीं तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे । “ठीक है । ”  मैंने कहा  “ कोशिश करते हैं । ”

4 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्द्धक के साथ ही रोचक और रोमांचक बातें। पर वढकर अच्छा लगा।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  2. पुरातत्व में हमारा पाला कंकालों से ही तो पड़ता है.!
    Note: भैय्या इस नीले रंग के background में नीले ही अक्षरों का प्रयोग पद्श्ने वालों के लिए परेशानी का सबब बन रही है. कृपया कुछ करें जिससे ठीक से पढ़ा जा सके.

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  3. वाह,
    मैं अपनी रजाई नहीं दूँगा वाला हादसा हमारे साथ भी एक बार कैम्पिंग में हो चुका है। पहले आदिमानव की कब्र का बात भी ठीक लगी। थोडा लम्बा लम्बा लेख लिखिये, पढना शुरू करते ही समाप्त हो जाता है :-)

    खैर हम हमसफ़र बने रहेंगे।

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  4. सच मे विचारो तो शायद प्रथम म्रूत देह और कब्र आदि का यही इतिहास रहा होगा.

    अच्छा आलेख.

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