बुधवार, 27 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन -तीन

कंकाल के साथ सोए हो क्या?

भोजन के पश्चात तुरंत सोने की आदत नहीं थी,वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके थे। सो नींद किसीको नहीं आ रही थी सब चुपचाप लेटे हुए तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत देख रहे थे। फरवरी का यह दूसरा सप्ताह था और ठंड जैसे लौटकर फिर आ गई थी। मै अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था और रवीन्द्र की रज़ाई में घुसकर सोने की कोशिश कर रहा था। रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था। मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगा की तर्ज़ पर उसने कहा “मैं अपनी रज़ाई नही दूंगा।“ मैने उससे निवेदन किया,अंततः एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया। लेकिन नींद का समय अभी कहाँ हुआ था? अचानक डॉ.वाकणकर की बात याद करके हँसी आ गई। “क्यों हंसे ?” रवीन्द्र ने पूछा। मैने रवीन्द्र से सवाल किया”तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो रवीन्द्र ? “रवीन्द्र हँसने लगा अभी तो तेरे साथ सो रहा हूँ कंकाल के साथ सोने के लिये दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा.” मैने कहा “सही कह रहे हो यार, हमारे यहाँ तो लोग कंकाल क्या खोपडी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है यार।” “क्या” रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा। “हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है” “वो कैसे” रवीन्द्र ने पूछा । मैने बताया “कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, गनीमत सभी जगह यह प्रथा नहीं है,दक्षिण अफ्रीका और योरोप में शव जलाने की प्रथा होती तो हमे पृथ्वी के पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।“
अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था। उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेका और कहा”मैं सोच रहा हूँ पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..”मैने कहा “ना गाडा गया ना जलाया गया। पहली बार जब मनुष्य ने मृत देह देखी तो उसकी समझ में आया ही नहीं कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है। वह बहुत देर बैठा रहा उसके पास कि शायद यह फिर से हिलने –डुलने लगे लेकिन जब कुछ नही हुआ तो वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया। लौटकर आया तो देखा मृत देह को जानवर खा चुके हैं। उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य जो उसके साथ रहता था । अगली बार उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिये उसके चारों ओर, और उसके ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये.। यह मनुष्य की पहली कब्र थी और यही मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार था ।”
“पहला और अंतिम का जवाब नहीं भाई”रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा”लेकिन अब सो जाओ.. नही तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे। “ठीक है” मैने कहा “ कोशिश करते हैं । ”
आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्द्धक के साथ ही रोचक और रोमांचक बातें। पर वढकर अच्छा लगा।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  2. पुरातत्व में हमारा पाला कंकालों से ही तो पड़ता है.!
    Note: भैय्या इस नीले रंग के background में नीले ही अक्षरों का प्रयोग पद्श्ने वालों के लिए परेशानी का सबब बन रही है. कृपया कुछ करें जिससे ठीक से पढ़ा जा सके.

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  3. वाह,
    मैं अपनी रजाई नहीं दूँगा वाला हादसा हमारे साथ भी एक बार कैम्पिंग में हो चुका है। पहले आदिमानव की कब्र का बात भी ठीक लगी। थोडा लम्बा लम्बा लेख लिखिये, पढना शुरू करते ही समाप्त हो जाता है :-)

    खैर हम हमसफ़र बने रहेंगे।

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  4. सच मे विचारो तो शायद प्रथम म्रूत देह और कब्र आदि का यही इतिहास रहा होगा.

    अच्छा आलेख.

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