सोमवार, 7 दिसंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवाँ -दिन एक

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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवाँ -दिन एक
जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी
            सुबह प्रक्षालन हेतु हम लोग नदी पर गये । लौटते हुए अशोक ने कहा “ यार ,कल बहुत ज़ोरों से नींद आ रही थी ..तेरी कहानी नहीं सुन पाया ..फिर क्या हुआ स्पर्टाकस का ? वह अखाड़े तक कैसे आया ? मैने कहा “ बस,लेण्टुलस बाटियाटस उसको खदान से खरीद लाया और अन्य गुलामों के साथ उसको लड़वाने के लिये तैयार करने लगा “ अजय ने पूछा ." तो उन्हे ग्लेडियेटर बनने के लिये कोई ट्रेनिंग-वेनिंग दी जाती थी क्या ?” “हाँ” मैने कहा “ न केवल ट्रेनिंग दी जाती थी बल्कि अच्छी तरह से खिलाया पिलाया भी जाता था ,गेहूँ ,जौ, माँस और पनीर ,और  तो और बाटियाटस उनके लिये स्त्रियों का प्रबन्ध भी करता था ।“ “ अरे वा , यह तो अद्भुत  है ग्लेडियेटर्स  के तो ऐश हो  जाते होंगे । “ अजय ने खुश होते हुए कहा ।
“ नहीं “ मैने कहा “ उसका यह मानना था कि ग्लेडियेटर खेतिहर मज़दूर तो होता नहीं उसके भीतर दम खम पैदा करने के लिये उसे स्त्री का संग ज़रूरी है ,तभी वह अच्छी तरह खाता है ,अच्छी तरह लड़ता है ...” “ और अच्छी तरह मरता भी है ..बड़ी अजीब थ्योरी है यह ..“ अशोक के बीच में  ही मेरी बात लोक कर कहा । “ हाँ ,मगर यह भी तो देखो कि वह बाटियाटस उन्हे स्त्रियाँ किस तरह परोसता था जैसे वह उन्हे खाना और अन्य सुविधायें दे रहा हो ..और उस पर तुर्रा यह कि वह उन्हे स्वस्थ्य,पुष्ट और अक्षत कुमारी स्त्रियाँ देता था इसलिये कि सबसे पहले वह उनकी आज़माइश करता था । यह दो हज़ार साल पहले का रोम का समाज था जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी और उन्हे मनुष्य न समझ कर एक जिंस समझा जाता था ।“
“ उसने स्पार्टाकस भी को एक स्त्री दी थी ना ?” रवीन्द्र ने मेरे स्त्री विमर्श के भाषण को बीच में रोककर पूछा । “हाँ “ मैने कहा “ उसका नाम वारीनिया था । बाटियाटस उससे चिढ़ता था इसलिये कि उसे हाथ लगाते ही उसने बाटियाटस को लात घूँसों से पीट डाला था और उसने सज़ा के तौर पर उसे स्पार्टाकस को सौंप दिया था इसलिये कि वह समझता था उसे पुरुष की ज़रूरत नहीं है और स्पार्टाकस को स्त्री की ..लेकिन आगे जाकर दोनो में प्रेम हुआ और यह स्त्री भी इतिहास में स्पार्टाकस की ऐसी प्रेमिका के रूप में प्रसिद्ध हुई जिसने स्पार्टाकस को रोम की इस क्रूर प्रथा और गुलामी के खिलाफ विद्रोह करने के लिये प्रेरित किया ।
“ ए भाई,ग्लेडियेटर्स की लड़ाई और रोमन सम्राटों के मनोरंजन के बारे में भी तो कुछ बता ।“ अजय ने कहा । इससे पहले कि मैं कुछ बोलता राममिलनवा बोल पड़े.. “ ऊ सब छोड़ो हियाँ हमरा पेट विद्रोह कर रहा है ..तनिक नास्ता वास्ता हुई जाये फिर सुनेंगे तोहार कहानी ।“ बात तो राममिलन भैया की सही थी । भूख तो हमे भी लग रही थी । और इससे पहले कि हम लोग अपने  ट्रेंच रूपी अखाड़े में कूद पड़ें पेट में कुछ डालना ज़रूरी था ..सो हम लोगों ने भोजनशाला की  ओर प्रस्थान किया ।
(स्पार्टाकस व वारीनिया का चित्र गूगल से साभार ) - आपका शरद कोकास   

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी चल रही है आपकी डायरी के पन्नों की ये यात्रा भी। आभी भी लोग कहते हैं कि नारी से अधिक पुरुष पीडित हैं नारी मुक्ति आन्दोलन सब बकवास है।
    बहुत मार्मिक दशा रही है नारी की।

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  2. बहुत अच्छी चल रही है आपकी डायरी के पन्नों की ये यात्रा भी। आभी भी लोग कहते हैं कि नारी से अधिक पुरुष पीडित हैं नारी मुक्ति आन्दोलन सब बकवास है।
    बहुत मार्मिक दशा रही है नारी की। धन्यवाद

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  3. गज़ब की शैली है शरद जी आपकी, रोचक कहानी को और भी रोचक बना देते हैं आप।

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  4. अच्छी जानकारी के साथ ......... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट.........

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  5. शरद जी, पुरातत्ववेत्ता की डायरी ने तो बहुत पुराने युग की बात दर्शाई है, हकीकत में यह सब पाकिस्तान इरान अरब और अफगानिस्तान के आदिवासी एरिया में आज भी यदा कदा देखने को मिल जाएगा !

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  6. आप ने इस प्रेरक कथा को बहुत रुचिकर बना दिया है। बधाई!

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  7. आज पता चला कि हर ग्लेडियेटर के पराक्रम में किसी नारी का हाथ होता है...

    जय हिंद...

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  8. sharad bhai, kahaN-kahaN ghumte rahte haiN aap. Bhai, har bar yahi soch kar rah jata huN ki is blog par fursat aur ekagrta se padhkar hi tippni karna thik hoga. pr wo to aaj bhi nahiN kar paya :-)

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  9. वाह वाह क्या बात है शरद जी! बढ़िया जानकारी के साथ साथ बहुत रोचक लगी ये कहानी!

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  10. ये तो आज भी हो रहा है - बदले हुए और अपेक्षाकृत अधिक 'सभ्य' तरीके से। शहरों में समान्तर अन्धेरी दुनिया में क्या क्या कारनामें नहीं होते !
    भोगवादी प्रवृत्ति जाने कितने अनर्थ साथ लिए चलती है !

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