मंगलवार, 8 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –दो


  एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –दो
मिस्त्र की हसीना का कोई किस्सा सुनाओ यार
            आज रात बिस्तर में घुसते ही रवीन्द्र ने सवाल किया “ यार तैने बहुत दिनो से कोई किस्सा कहानी नहीं सुनाया है क्या बात है ? “ मैने कहा “ नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है ,हम लोग तो खुद ही नये किस्से गढ़ने में लगे थे सो छूट गया होगा ,खैर सुनाता हूँ ,बताओ अपने देश का किस्सा सुनोगे या फॉरेन का । अजय मिस्त्र मेसोपोटामिया यूनान आदि को फॉरेन कहता था ,तुरंत बोला “ मिस्त्र की हसीना का कोई किस्सा विस्सा सुनाओ यार ।“ मैने कहा ..” बेटा भाभी को पता चलेगा कि तू अभी भी हसीनाओं के किस्सों में दिलचस्पी लेता है तो तेरा किस्सा बना देगी ।“ अजय बोला “ तो क्या हुआ सिर्फ किस्से ही तो सुनता हूँ ।“
खैर चलो आज मैं तुम लोगों को हम्मूराबी की कहानी सुनाता हूँ ।“ इससे पहले कि अजय नाक भौं सिकोडे मैने बखान शुरू कर दिया “ यह तो तुम लोग जानते ही होगे कि चौथी शताब्दी ईसापूर्व के अंत तक मेसोपोटामिया में राज्यों की स्थापना हो चुकी थी और फरात व दज़ला नदियाँ जहाँ करीब आ जाती हैं वहाँ बेबीलोन नगर बस चुका था । यह एक बड़ा व्यापारिक नगर था जहाँ बड़ी बड़ी मंडियाँ और गोदाम थे । इस बेबीलोन नगर में 1792 ईसापूर्व में हम्मूराबी नामका एक शासक हुआ जिसने 1750 ईसापूर्व तक शासन किया ।
बेबीलोन में अपार सम्पदा थी और हम्मूराबी के पास विशाल सेना । हम्मूराबी एक एक कर आसपास के राज्य हस्तगत करता गया । अपने आप को वह देवता समझता था और इस बात का उसे बहत गर्व था । उसने अपनी प्रजा के लिये एक कानून सन्हिता बनाई थी जो इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है । “ अच्छा ऐसा क्या था इस संहिता में ? “  रवीन्द्र ने पूछा । मैने बताया “  इस संहिता में सरकारी अधिकारियों के पास असीमित अधिकारों की व्याख्या थी । वे इसी संहिता के अनुसार राज्य के नागरिकों के आपसी झगड़ों का निपटारा करते थे और राजाज्ञा का उलंघन करने वालों को कठोर दंड दिया करते थे ।
“ मतलब हमारे यहाँ के सरकारी अधिकारियों जैसे थे । “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । “ नहीं भाई हमारे सरकारी अधिकारी उनके आगे कहाँ लगते हैं ।“ मैने कहा “ हमारे यहाँ तो जनतंत्र है और उस समय राजतंत्र था । राजतंत्र में राजा की ताना शाही आम बात है । “ “ लेकिन हमारे यहाँ भी तो सत्ताप्रमुख एक तरह से राजा ही होता है ना । “ अशोक ने कहा । रवीन्द्र ने बहस के बीच प्रवेश किया “ यह तो छोड़ो , ज़िले में कलेक्टर और गाँव में पटवारी तक राजा होता है । “ “ हाँ होता तो है “ मैने कहा लेकिन सबके ऊपर न्यायपालिक होती है और संविधान से ऊपर कुछ नहीं हो सकता । “ अजय बार बार हम लोगों का मुँह देख रहा था ऊब कर बोला “ अरे यार तुम लोग भी कहाँ की असंवैधानिक बहस में उलझ  गये , शरद तुम हम्मूराबी का किस्सा सुना रहे थे ना ? “
            “ हाँ भई “ मैने कहा “ लो आगे सुनो ।“ 
( सॉरी मिस्त्र की हसीना का किस्सा तो रह ही गया ,फिर कभी सुनाउंगा । फिलहाल यह मैप देखें, नये और हम्मूराबी के वक़्त के दो गूगल से  साभार और दो मेरे पास से , मेरा मानना है इतिहास पढ़ने के लिये यदि सामने नक्शा हो तो इतिहास जल्दी समझ में आता है -शरद कोकास )

7 टिप्‍पणियां:

  1. हम्मुरब्बी का कोड जग प्रसिध्ध है आज भी उसी का संशोधित रूप विश्वभर के देशों में प्रचलित है
    आगे की कथा भी सुनाइएगा --
    आप मेरे पापा जी ( पण्डित नरेंद्र शर्मा ) से
    कहाँ मिले थे ?

    ये भी विस्तार से बतलाइयेगा
    सादर,
    - लावण्या

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  2. माफ करें .. आज गल्‍ती से आपके ब्‍लाग पर आ गयी .. इतिहास से दूर रहना ही पसंद है मुझे !!

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  3. अच्छा बनाया शरद भाई,किस्से का इंतज़ार रहेगा।

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  4. मिस्त्र की हसीना के किस्से के चक्कर में हम्मुरब्बी का किस्सा जान गये मगर एक उम्मीद है तो अगली बार फिर आवेंगे. :)

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  5. वाह ! वाह !
    बधाई !
    क्या बात है ............

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  6. भई हम्मुरब्बी के चक्कर में आपने खूब उल्लू बनाया....अगर न भी पढनी होती,तब भी इस चक्कर में सारी पोस्ट पढनी पडी:)

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