गुरुवार, 10 सितंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –तीन

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –तीन
मतलब बैल और आदमी की कीमत एक बराबर ?
“हुआ यह कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पुरातत्ववेत्ताओं को काले पत्थर का ढाई मीटर ऊँचा एक स्तम्भ मिला जिस पर हम्मूराबी की यह कानून संहिता खुदी हुई थी । “ मैने बताया । “ अच्छा क्या लिखा था उस पर “ अजय ने पूछा । “ ऐसा है “ मैने कहा “ अब उसका पूरा पाठ तो मुझे याद नहीं है ,अपन लौटेंगे तो लायब्रेरी में देख लेंगे फिर भी उसकी मुख्य बातें जो मैने पढी हैं कुछ इस प्रकार हैं । जैसे,, मै हम्मूराबी ,देवताओं द्वारा नियुक्त शासक ,सभी राजाओं में प्रथम और फरात के तटीय क्षेत्रों का विजेता हूँ । मैने सम्पूर्ण राष्ट्र को सत्य एवं न्याय की शिक्षा प्रदान की है तथा लोगों को समृद्धता प्रदान की है ।“
मतलब हम्मूराबी की हिन्दी बहुत बढ़िया थी “ अजय ने तपाक से रियेक्ट किया । रवीन्द्र ने तत्काल अपने माथे पर हाथ पटका और कहा “ रहे ना तुम कोल्हू के बैल , अरे हम्मूराबी की विधि संहिता का यह हिन्दी अनुवाद है । हाँ शरद सुनाओ आगे क्या लिखा था । “ मैं तुरंत बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया और हम्मूराबी की मुद्रा बनाकर साभिनय कहना शुरू किया “ सुनो प्रजाजन .. आज से जो भी राजा की या मन्दिर की सम्पत्ति चुरायेगा उसे मृत्युदंड मिलेगा और जो चोरी का माल रखेगा उसे भी । मैने देखा सब को मज़ा आ रहा था । मैने आगे कहना शुरू किया “ जो दास या दासी चुरायेगा ,जो भागे हुए दास को शरण देगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा । जो दास के शरीर पर लगा निशान मिटायेगा उसकी उंगलियाँ काट दी जायेंगी ।“
“ यह निशान वाला क्या चक्कर है यार “ अजय ने फिर बीच में टोक दिया । रवीन्द्र ने उसे जवाब दिया “ उस ज़माने में हर दास दासी के शरीर पर जलाकर या दागकर ऐसा निशान बना दिया जाता था जिससे उसके मालिक का पता चल जाता था । “ बाप रे.. बहुत यातनादायक होता होगा यह तो “ अजय ने कहा । “ हाँ “ मैने आगे बताना शुरू किया “ यही नहीं उस विधि संहिता में इससे भी कठोर दंडों का प्रावधान था ,जैसे जो पराये दास की हत्या करेगा उसे बदले में दास देना होगा और इसी तरह बैल के बदले में बैल । “मतलब बैल और आदमी की कीमत एक बराबर ? “ अजय ने सवाल किया । “अरे वा ! ” रवीन्द्र ने खुश होकर कहा “ यह किया तुमने आदमियों जैसा सवाल । “ हाँ “ मैने कहा “लेकिन सिर्फ दास ही थे जिन्हे मनुष्य नहीं माना जाता था । यह वर्गभेद इतन अधिक था कि जो अपने से उच्च वर्ग के या सभ्रांत वर्ग के या पुरोहित वर्ग के किसी व्यक्ति को गलती से भी थप्पड़ मार दे तो उसे बैल के चमड़े से बने हंटर से साठ कोड़े लगाये जाते थे । इसी वज़ह से लोग अपने पत्नी बच्चों सहित सभ्रांत वर्ग की गुलामी किया करते थे ।
“ बड़ी भयानक बात बताई यार तुमने” रवीन्द्र ने कहा । “ मुझे तो आज नीन्द नहीं आनेवाली । “ “ चुपचाप सो जाओ “ मैने कहा “ हमारे देश में इस से भी भयानक बातें घटित होती हैं नींद उड़ाने वाली ।


( हमारे देश में आज भी श्रम कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं । आपको होटलों , पंचर की दुकानों, मिस्त्रियों आदि की दुकानों से लेकर बड़े बड़े संस्थानों ,कारखानों में लगे नोटिस के बावज़ूद 14 साल से कम उम्र के बच्चे काम करते मिल जायेंगे , यह शोषण कहाँ कहाँ है आप खुद जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी इसके खिलाफ आवाज़ उठाने के बारे में सोचा है ?- शरद कोकास )

9 टिप्‍पणियां:

  1. शरद जी, वैसे दुर्भाग्य से सदा से होता तो यही आया है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  2. शरद जी कुछ दिनों से इतिहास का अध्ययन पीछे छूट रहा था..आज कल आपके रोचक पोस्ट पढ़ कर फिर से इतिहास मे रूचि आ गयी.
    बढ़िया लगती है आपकी पुरातत्व वाली हर बात..
    बधाई स्वीकारे..

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  3. हर युग में गरीब तो शोषण के लिए ही पैदा होते हैं .. कोई उनके लिए लडने को तैयार नहीं .. उनकी व्‍यथा कब समाप्‍त होगी .. कहना मुश्किल है !!

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  4. अजी शरद जी,
    अच्छे खासे हम्मूराबी के किस्से से अपने देश में आ गए.

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  5. इस पोस्ट को पढ़ कर रमेश रंजक का गीत याद आ गया। बैल भई रे करतार उमरिया बैल भई! .....

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  6. ्कहानी बहुत सुंदर लगी, लेकिन लगता है यह आज की ही है.... आज के भारत की फ़र्क बस इतना है पहले निशान लगाये जाते थे लाल लाल अब नही.
    धन्यवाद

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  7. बराबर तो बड़ी बात हो गई..वैसे बाजार में आदमी की कम ही है.

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  8. न्याय कमजोर के साथ नहीं होता। नारी, दास, बालक, पशु, गरीब ... सबको देख लिया जाये!
    पर हम्मूराबी ने कुछ शानदार भी किया होगा आज के पैमाने से?!

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  9. अब आप सेवानिवृत्त हो गए हैं इसलिए आवाज़ उठाने की जिम्मेदारी आप को दी जाती है। पीछे से हल्ला काटने को हम हैं ही :)
    हम्मूराबी की संहिता का पूरा अनुवाद दे दें ताकि लोगों को पता चले कि लोकतंत्र कितना मूल्यवान है !
    यह प्रसंग अति रुचिकर रहा।

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