सोमवार, 20 दिसंबर 2010

फिर शुरु कर रहे हैं " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी "

बीच में डॉ. कैलाशचन्द्र जैन  पुरातत्व विभाग वि वि के विभागाध्यक्ष
                   " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " ब्लॉग पर लिखते हुए मैंने ऐसी कोई घोषणा तो नहीं की थी कि कुछ दिनों का ब्रेक लूंगा । लेकिन आज यह ब्लॉग देखा तो पता चला कि यह ब्रेक पूरे एक साल का हो गया है । अब इतना लम्बा ब्रेक तो होना नहीं चाहिये था , लेकिन हो गया ।फिल्म आंधी के संजीव कुमार के उस सम्वाद की तरह " इस बार यह अमावस कुछ ज़्यादा ही लम्बी हो गई । " इस तरह् पिछली सर्दियाँ समाप्त हो गईं ,उसके बाद ग्रीष्म और वर्षा ऋतु का भी समापन हो गया और फिरसे ठंड आ गई ।
उत्खनन परिसर बरगद की छाँव 
                    मुझे लगता है सर्दियों का और इस पुरातत्ववेत्ता की डायरी का कुछ सम्बन्ध है । हम लोग उज्जैन के निकट दंगवाडा के पुरातात्विक उत्खनन शिविर में ठंड के दिनों में ही गये थे और हम लोगों की ज़्यादातर गपशप रज़ाइयों में दुबककर ही होती रही थी ।  विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. वि श्री वाकणकर के निर्देशन में आयोजित इस उत्खनन शिविर में स्नातकोत्तर कक्षा के हम छह- सात  विद्यार्थी थे  मैं , रवीन्द्र भारद्वाज , अशोक त्रिवेदी , किशोर त्रिवेदी , अजय  जोशी , महेश शर्मा और राममिलन शर्मा । हमारे साथ थे हमारे प्रोफेसर डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्य और प्रो. जे एन दुबे । भोजन शाला के प्रभारी भाटी जी और अन्य कई कर्मी ।
रविन्द्र ,डॉ.वाकणकर .डॉ.आर्य , शरद व अशोक
                       सर्दियों के दिन ठंडी हवाएँ , चम्बल का किनारा , बरगदों की छाँव में लगे तम्बू , और उत्खनन के लिये नदी किनारे का वह टीला । एक माह का वह समय कैसे बीत गया ,पता ही नहीं चला । मजदूर पास के गाँव से आते थे और शाम ढलने के बाद वापस चले जाते थे । इसके बाद प्रारम्भ होती थी हम लोगों की सायँकालीन कक्षा जिसमें विचारों के आदान प्रदान से लेकर किस्से कहानियाँ और मौज -मस्ती भी शामिल होती थी । पढना -लिखना भी ज़रूरी था इसलिये कि यह कैम्प हम लोगों के पाठ्यक्रम का ही एक हिस्सा था ।
                     अगर आपने पिछली पोस्ट पढी होंगी तो यह बात अवश्य जान  गये होंगे कि पढने लिखने के अलावा भी हम लोग बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर रहे थे । बस इसी ज्ञान को आप लोगों के साथ बाँटने का प्रयास है यह " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " ।
                     तो शीघ्र ही प्रारम्भ करते हैं " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - दसवें दिन के दूसरे भाग से आगे का किस्सा । निवेदन यह है कि यदि आपने पिछले भाग न पढें हों तो कृपया एक निगाह उस पर डाल लें , और न भी डाल सकें तो कोई बात नहीं इस शिविर में जिस दिन से शामिल हों उसी दिन से आपको आनन्द आयेगा  - आपका - शरद कोकास

7 टिप्‍पणियां:

  1. हां, शरद जी, इसकी कमी महसूस हो रही थी।
    दोबारा जल्दी शुरू कीजिये।

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  2. स्‍वागत के लिए तैयार हैं हम.

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  3. ग़ज़ब का एवेंचर है यहॉं....अच्‍छा अंतराल है...पि‍छली सभी पोस्‍ट पढ़कर अद्यतन होना है...---स्‍वागतम् !

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  4. शुभकामनायें...कुछ स्थिर हुआ तो कुछ् अवश्य गतिमान होगा..यही नियति है!

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