बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – ग्यारहवाँ दिन – एक

अरे सब गुफायें कहाँ हैं ?
          सुबह आर्य साहब ने कहा “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर , कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है , लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजंता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । यह लेखक है ना , जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । “
            फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रही थीं और हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो बहुत लम्बी यात्रा करके आई हों । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है ।
            शाम देर तक काम करते रहे हम लोग । डॉ. वाकणकर ने आज हमें सिखाया कि किस तरह अवशेषों को साफ करके कपड़े की थैलियों में बन्द किया जाये और उन्हे टैग किया जाये । भोजन के पश्चात तम्बू में घुसे ही थे कि अजय ने फरमाइश की “ तो अब अजंता के लिए प्रस्थान किया जाए ? “ मैंने अपनी डायरी निकाल ली और जनता के बीच उसका वाचन प्रारम्भ कर दिया ।
            “ इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । जलगाँव से अजंता की दूरी 61 किलोमीटर है और इसमें लगभग एक घन्टा लगता है । मैं खिड़की के पास बैठा था और मील के पत्थरों को पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी , अजंता केव्ह्स 3 कि मी , अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे ,जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।
             मैं सोचने लगा समय के उस हिस्से के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा , यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे , यह बस, गाड़ियाँ और इस तरह के वाहन भी नहीं रहे होंगे । बस यहाँ रही होगी  यह निर्जन पहाड़ी , नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार , आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी । वातावरण  में गूंजते होंगे  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर …।
            अचानक बस ने आखरी मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में भटकता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों ,टूरिस्ट बसों , छोटी छोटी दुकानों और होटलों की भीड़ के बीच जा गिरा । मुझे लगा मैं जैसे किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौनसी जगह है । मैंने आश्चर्य व्यक्त किया …अरे सब गुफायें कहाँ हैं ? किसीने कुछ नहीं कहा । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।
(चित्र गूगल से साभार ) 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी , नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार , आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी । वातावरण में गूंजते होंगे ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर ..
    लगा जैसे उसी समय काल में पहुँच गए हम भी.

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  2. एलोरा दो बार हो आया और अजंता देखने की चाह है। यह वृत्तांत पढ़कर फिर से हुड़क चढ़ रही है....देखें, कब जाना होता है।

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  3. २००९ की दिवाली पर हम आखिरी क्षण में बनी योजना पर पुणे से अजंता-एलोरा निकल पड़े थे. बड़ी यादगार रही थी वो यात्रा. बड़े सुखद विचार आते हैं रास्ते में.

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  4. मुझे लग रहा है कि मैं पढ़ नहीं रहा बल्कि आपके साथ ही भ्रमण कर रहा हूँ!

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  5. बहुत दिनों से आगे की कहानी नहीं लिखी सोच रहा हूँ आगे बढाई जाए

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