सोमवार, 24 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – छह

            उज्जैन के पास दंगवाडा में उत्खनन शिविर चल रहा है । ठंड के दिन हैं । हम सभी मित्र तम्बू में रज़ाई ओढ़े बैठे है और मैं अपनी डायरी से पढ़ रहा हूँ अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ... 

 एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – छह
चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा
इस तरह उदर की मांग पूर्ण होते ही मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । उस दिन हमे समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग क्यों आगे की सीटों की मांग करते हैं ।
             सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसीमें हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ् देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले की अन्य लोगों किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती कर चुके थे ।
            सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी बस हम दोनो वहाँ कचरे के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । नींद से बोझिल पलकें , सूखे होंठ , बिखरे बाल लिये मैंले कपड़ों में हम लोग , अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच पिछली सदी के कोई पात्र लग रहे थे ।
            पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमे क्यों नहीं जगाया तो एक मित्र ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है । “ बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।
            “ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जायेंगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  
(चित्र गूगल से साभार ) 

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ये बढ़िया रहा बस स्टैंड पर ही बिस्तर, सोने को बराबर समय देना चाहिये :) जलगाँव हम भी गये थे पर मिसल के साथ पोहे नहीं खा पाये :) अजंता और एलोरा तो हमारे भी सर्वप्रिय जगहों में से एक हैं।

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  2. बहुत खूब।

    इस सार्थक प्रव़ष्टि से गुजरना अच्‍छा लगा।

    मेल द्वारा सूचना के लिए आभार।
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    सचमुच मुकर्रर है कयामत?
    कमेंट करें, आशातीत लाभ पाएं।

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  3. बस स्टेंड की रात और पोहा ..काफी रोचक वर्णन पढ़ने को मिला.

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