मंगलवार, 11 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - दसवाँ दिन - चार

          " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " दसवें दिन के इस चौथे खंड में दृश्य कुछ इस तरह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा नामक गाँव में चम्बल नदी के किनारे टीले पर हम लोगों का कैम्प लगा है । दिन भर का काम समाप्त हो चुका है और शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की सैर करने और भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बुओं में घुस गये हैं और रज़ाई ओढ़े गपिया रहे हैं और मैं सुना रहा हूँ अपने मित्रों को अपनी अजंता एलोरा यात्रा की डायरी .. चलिये आप भी चलिये हमारे साथ
बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक ।“
26 मार्च , रविवार

उज्जैन का रेल्वे स्टेशन 

            प्रस्थान के लिए कल 25 मार्च का दिन तय हो चुका था । हालाँकि कल धुलैंडी थी लेकिन सब को पता था कि दोपहर तक होली के सारे रंग फीके पड़ जाएँगे । महेश और राममिलन जब मेरे रूम पर पहुँचे चार बज चुके थे और मैं मल्होत्रा के कमरे में उसके आईने के सामने खड़ा शेव कर रहा था । मेरे कमरे का आईना पिछले ही दिन टूट गया था ।
            “ क्यों चलना नहीं है क्या ? “ महेश ने पूछा । मैंने उत्तर में धीरे से उसकी ओर देखा और स्लो मोशन में अपनी गर्दन हिलाने लगा । महेश ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा “ तो लगता है मेरी तरह तुमने भी ठंडाई जम कर ली है आज । “ मैं भी यह सुनकर उसी की तरह मुस्कुराने लगा । हम दोनो के एक दूसरे की तरह मुस्कुराने का सिलसिला कुछ देर चलता रहा ,फिर महेश राममिलन भैया की ओर मुखातिब हुआ और उनसे कहा... “ राममिलन भैया तुम यहीं रुको , मैं रूम से अभी अपना सामान लेकर आता हूँ । “ इतना कह कर वह लक्ष्मीनगर स्थित अपने रूम के लिये प्रस्थान कर गया  ।
बाबा नागार्जुन 
             मैं कुछ ही देर में नहा - धोकर तैयार हो गया । नहाने के बाद काफी ताज़गी सी महसूस हो रही थी । “क्यों राममिलन भैया , नीचे चले ? “ मैंने राममिलन से पूछा । “ और क्या । “ उन्होने जवाब दिया ..” बस तो नीचे ही आयेगी ना । “फिर हम लोग अपने बैग लेकर विश्राम लॉज की सीढ़ियों से नीचे उतरे और उज्जैन के फ्रीगंज इलाके में स्थित शहीद पार्क के एक कोने में खड़े रहकर बस की प्रतीक्षा करने लगे । पेड़ों के साये पार्क से बाहर निकलकर सड़क तक पहुँच चुके थे और आती जाती गाड़ियाँ उन्हे रौंद रहीं थीं । मैं देखने लगा , गाड़ियाँ गुजर जाने के बाद भी वे साये ज्यों के त्यों दिखाई देते थे और वे उनका बाल बाँका नहीं कर पा रही थीं । इससे पहले कि कोई भाववादी टाइप का विचार मेरे मन में आता , मुझे बाबा नागार्जुन की कविता याद आ गई और मैंने नारे के अन्दाज़ में उसका पाठ करते हुए कहा ... “ जले ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक , बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक ।“
बस इसी तरह की बस थी हमारी 

“ का हो ? का हुई गवा ? बड़े खुस हो ? राममिलन भैया ने मुझे कविता का सस्वर पाठ करते देखा तो पूछा ।  मैंने कुछ नहीं कहा और मुस्कुराने लगा । यह बसन्त का मौसम था और विदा लेती हुई धूप मन में पुलक पैदा कर रही थी ।  वहाँ खड़े खड़े हम लोग काफी देर तक विक्रम विश्वविद्यालय के जियालॉजी डिपार्टमेंट की मिनी बस की प्रतीक्षा करते रहे ,लेकिन बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी  । रेल की बजाय बस से जाने का उद्देश्य यही था कि अपनी गाड़ी रहने से सुविधा रहेगी और साइट सीइंग का खर्चा भी बच जाएगा । ऐसा हमारे एच ओ डी जैन साहब का विचार था । आखिर प्रतीक्षा समाप्त हुई ।  कुछ ही देर में दूर से नीले रंग की वह ‘ डॉज ‘ आती दिखाई दी । महेश भी इस बीच पहुँच चुका था । उसने हाथ बढ़ाकर गाड़ी रोकी और पीछे से घुसने की कोशिश करने लगा । खिड़की से झाँकते मित्रों ने हँसते हुए कहा … भैया दरवाज़ा पीछे नहीं सामने है …” हमें तो बस महेश का अनुसरण करना था । देखा तो बस में हमारे एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन सबसे आगे की सीट पर बैठे थे । हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व के हॉस्टलपहले ही सामने की जगह कैप्चर कर ली थी । हम लोगों के में रहने वाले छात्रों ने  हिस्से में आईं पीछे की सीटें ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. शुरुआती कड़ियों पर जाने से ही तादात्म्य बनेगा , मौक़ा देखकर पहुंचता हूँ !

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  2. हम भी आपके साथ डाज़ में चढ़ बैठे हैं, अगली कडि़यों का इंतजार है।

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  3. काफी दिनों बाद विक्रम विश्वविद्यालय के जियालॉजी डिपार्टमेंट की चर्चा सुनी. अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी.

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