शनिवार, 15 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – पाँच


         " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " दसवें दिन के इस पाँचवें खंड में दृश्य कुछ इस तरह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा नामक गाँव में चम्बल नदी के किनारे टीले पर हम लोगों का कैम्प लगा है । दिन भर का काम समाप्त हो चुका है और शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की सैर करने और भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बुओं में घुस गये हैं और रज़ाई ओढ़े गपिया रहे हैं और मैं सुना रहा हूँ अपने मित्रों को अपनी अजंता एलोरा यात्रा की डायरी .. चलिये आप भी चलिये हमारे साथ
           

            उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर बस इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी । अशोक समझ गया मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । बहुत देर तक खामोश बैठा रहा मैं । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. सुनो भैया सरद.. अंत: मेरा मूड ठीक हो गया , उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा ।
इन्दौर का प्रसिद्ध राजवाडा 
            हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिये रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग इंदौर पहुँचते ही हम लोगों ने महसूस किया कि तीव्र भूख के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी सुबह से कुछ खाया नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ उठाई और पेट दिखाकर कहा .. लो ,देखो कान लगाकर .. खाना दो खाना दो की आवाज़ आ रही है कि नहीं । “ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था ..। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है , इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिये उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है । “
हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से पैकेट निकाल लिये थे । यह सभी हॉस्टल के छात्र थे जो मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आये थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी कीं लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया वैसे भी इन्दौर शहर में आयें और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हे आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।
            मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” आमाशय ही लिखा है , गर्भाशय नहीं लिखा जो तुम इतनी अश्लील हँसी हँस रहे हो ।“ अजय हँसते हँसते बोला … “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे , इसलिये बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे  हमे सब पता चल गया था । “ ठीक है , ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “ लो आगे भी तो सुनो । और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी ।

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