रविवार, 9 अगस्त 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छठवाँ दिन-एक


ताम्राश्मयुगीन ब्यूटी पार्लर की तलाश में
“अरे यह तो सूरमा लगाने की सीं है । “ ट्रेंच से प्राप्त सुरमा शलाका उठाते हुए रवीन्द्र ने कहा । उसकी आँखों में चमक आ गई थी ,बोला “ ज़रूर उस ज़माने में यहाँ कोब्यूटी पार्लर रहा होगा ।“ “चुप “ अजय ने उसे डाँटते हुए कहा “ फिर तो मै भी कह सकता हूँ यह पैर घिसने का पत्थर देख कर कि यहाँ उस ज़माने का हम्माम रहा होगा ।“ राम मिलनवा दूर बैठे हम लोगों की बातें सुन रहे थे । वहीं से चिल्लाकर बोले “भैया अभी से काहे आसमान सर पर उठाये हो जब कौनो चड्डी बनियान मिल जाये तब बताना ।“ किशोर ने राम मिलन को छेड़ना शुरू किया “राममिलन तुम खुद तो कुछ करते नहीं हो बस बैठे –बैठे कमेंट करते रहते हो ।“ डॉ.आर्य हम लोगों की गूटर-गूँ सुन रहे थे ,बोले “ठीक तो कह रहा है राम मिलन ,इतनी जल्दी किसी परिणाम पर नहीं पहुँचना चाहिये,जब तक अन्य पूरक सामग्री न प्राप्त हो जाये हम कोई धारणा नहीं बना सकते ।
आज सुबह से हमने पुन: ट्रेंच क्रमांक चार पर कार्य करना प्रारम्भ किया था और दोपहर तक पचपन सेंटीमीटर तक पहुंच गये थे उसी की उपरी सतह मे पेग क्र.दो से पेग क्र. दो बी के बीच दो मीटर बाय दो मीटर के क्षेत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण ऑब्जेक्ट प्राप्त हुए थे जिसमे पैर घिसने का पत्थर, एक सुरमा लगाने की शलाका,मिट्टी का बनाया पकाया हुआ एक पात्र तथा बीड शामिल है । खैर इस बात को सिद्ध करने के लिये और पूरक सामग्री ढूँढने के लिये हम लोगों ने दोपहर भोजन के बाद दक्षिण की ओर 2x2 मीटर के हिस्से में खुदाई कर डाली । पर हाय री किस्मत उसमे कोई महत्वपूर्ण ऑब्जेक्ट नहीं मिला । राम मिलन हमारी मेहनत को अकारथ जाते देख प्रसन्न हो रहे थे और हँसकर कह रहे थे “ढूँढो ढूँढो ,अभी साबुन भी मिलेगा टुथपेस्ट और ब्रश भी मिलेगा और गाँव की गोरी के बालों को धोने वाला रीठा छाप शंपू भी मिलेगा ।“ किशोर मन ही मन गुस्सा हो रहा था ,धीरे से बोला “इस पंडित को मज़ा चखाना ही पड़ेगा । “ डॉ.आर्य ने हम लोगों को दिलासा देते हुए कहा “ कोई बात नहीं कुछ नहीं मिला तो । पुरातत्ववेत्ताओं के साथ अक्सर ऐसा होता है कि कई कई दिन मेहनत करने के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं लगता । यहीं उनके धैर्य की परीक्षा होती है । जो अधीर होते हैं वे आधी-अधूरी जानकारी के साथ गलत रिपोर्ट दे देते हैं और इस तरह गलत इतिहास रचने में अपना योगदान देते हैं । कई बार उन पर गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये भी दबाव डाला जाता है कई प्रकार के लोभ लालच भी दिये जाते हैं लेकिन जो सच्चे पुरातत्ववेत्ता होते हैं वे सच्चे देशभक्त की तरह होते हैं , वे किसी के भी आगे झुकते नहीं ।(चित्र गूगल से साभार )
सच्चे पुरातत्ववेत्ता सच्चे देशभक्त की तरह होते हैं- कैसा लगा आपको यह विचार ?-शरद कोकास

8 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चे पुरातत्ववेत्ता सच्चे देशभक्त की तरह होते हैं, सही कहा आपने .

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  2. सही विचार है। व्यक्ति को अपने प्रति और तथ्यों के प्रति सच्चा होना चाहिए तभी व सत्य तक पहुँच सकता है।

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  3. सत्य वचन महाराज!! अच्छा लगा पढ़ कर.

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  4. पुरातत्ववेत्ता देशों की सीमा में बंध कर काम नहीं करते। उनकी शोध-चेतना इस किस्म के विचारों से ऊपर होती है।

    देशभक्ति से ऊपर का जुनून है किसी भी किस्म की शोधवृत्ति। क्योंकि इससे समूचा मानव-समाज लाभान्वित होता है। जाति-देश से परे।

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  5. "गलत इतिहास रचने में अपना योगदान देते हैं । कई बार उन पर गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये भी दबाव डाला जाता है कई प्रकार के लोभ लालच भी दिये जाते हैं"

    सच कहा। हमारा लिखित इतिहास भी न जाने कितने समझौतों से भरा पड़ा है!

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  6. आपका ब्लाग निसंदेह बहुत ही अच्छा है जानकारी के साथ साथ रोचकता भी है। पहली बार पढा है मै इसकी फैन बन गयी हूं।.....

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