रविवार, 23 अगस्त 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –तीन





एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –तीन
तो मचिस कौन अगिया बेताल ले गया ?
आज शाम सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाना तय था । किशोर आज मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था । नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “ जानते हो पंडत , इस बरगद पर एक भूत रहता है । “ राममिलन ने गुस्से में कहा “ वो हमारे बजरंग बली सब भूतों की छुट्टी कर देते हैं । “ खैर , ऐसे ही हँसी मज़ाक करते हुए हम लोगों ने नाला पार किया और दंगवाड़ा गाँव पहुंचे । फिर उसी दुकान पर चाय पी और थोड़ी देर गाँव वालों के साथ गपशप करनेके बाद वापस लौटे । गाँव वालों पर हम लोगों ने ऐसा रोब जमाया जैसे हम उन्ही के बाप-दादों का
इतिहास लिखने वहाँ आये हों।
लौटते समय अन्धेरा हो चुका था और पिछले दिनो हुई वर्षा के कारण वे पत्थर भी दिखाए नहीं दे रहे थे जिन पर पाँव रखकर हम लोग नाला पार करते थे । आते समय गपशप के बीच ध्यान ही नहीं रहा कि उन पत्थरों को चिन्हित कर लें । राम मिलन गुस्से में थे और हम लोगों से अलग-थलग चल रहे थे । किशोर ने हम लोगों को धीरे से एक टीले की ओट में छुप जाने का इशारा किया । राममिलन ने कुछ पल हम लोगों की राह देखी और फिर नाला पार करने के लिये अकेले

ही आगे बढ़ गये । पत्थरों पर सम्भल कर पाँव रखते हुए जैसे ही वे बीच नाले तक पहुंचे किशोर तेज़ी से दबे पाँव आगे बढ़ा और धीरे से उन्हे धक्का दे दिया । राम मिलन धड़ाम से पानी में गिर पड़े और हाय-तौबा मचाने लगे “
अरे कौन है ससुरा हमका गिराय दिया ..।“ और वे जोरों से राम राम कहने लगे । किशोर ने कुछ कदम पीछे हटकर इस तरह अभिनय किया जैसे वे उनकी आवाज़ सुनकर दौड़े चले आये हों ।
“क्या हुआ पंडत कौनो भूत वूत धक्का दे दिया का ? “ भूत का नाम सुनते ही पंडित जी की घिग्गी बन्ध गई और वे जोर जोर से रटने लगे “ भूत पिसाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावै.. ।“ हम लोग जब तक पहुंचे तब तक वे उठकर खड़े हो चुके थे ।लेकिन फिर उन्हे ध्यान आया कि उनका एक जूता पानी के भीतर रेत –वेत में कहीं दब गया था । वे झुक कर पानी में हाथ डालकर अपना जूता तलाशने लगे । किशोर ने चिल्लाकर कहा “अरे अशोक जरा माचिस तो देना पंडत का जूता अन्धेरे में दिख नहीं रहा है ।“ अशोक ने दूर से हाथ बढ़ाकर कहा “ लो “ । कुछ सेकंड रुककर किशोर ने फिर कहा “

माचिस तो दे यार अशोक, अन्धेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है ।“ अशोक बोला “ अभी तो यार तुम्हारे हाथ में पकड़ाई है माचिस ..किसने हाथ बढ़ाया था ? “ किशोर सहित हम सब ने एक स्वर में कहा “ हमने तो हाथ नहीं बढ़ाया । “ “ तो फिर कौन अगिया बेताल ले गया ? “ किशोर बोला । अगिया बेताल का नाम सुनते ही राममिलन की तो हवा बन्द हो गई । गनीमत इस समय तक उनका जूता मिल गया था ।उन्होने दोनो जूते हाथ में लिये औरगीलेकपड़ों में , डर के मारे बगैर जूता पहने हनुमान चालीसा पढते हुए कैम्प की ओर बढ़ गये । हम लोग भी उनके साथ ही थे और बमुश्किल अपनी हँसी दबाते हुए उनका साथ दे रहे थे । हाँलाकि कैम्प तक पँहुचते हुए हँसी रोकना मुश्किल हो गया और पंडित जैसे ही तम्बू में घुसे हम लोग बाहर पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । यह हमने सोचा ही नहीं कि राममिलन हमारे हँसने से हमारी शरारत समझ गये होंगे ।
राम मिलन जी से क्षमा याचना सहित -शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार)

16 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक किस्‍सा
    भूत से डरना मना है
    महावीर का नाम इसीलिए बना है
    राममिलन के बहाने
    हंसीमिलन अच्‍छा लगा ये सम्‍मेलन।

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  2. बहुत मज़ा आता है पुरानी शरारतो को याद करो तो।

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  3. कमाल है...इतनी पुरातन मसखरियां भी याद हैं!!
    दिलचस्प वृत्तांत...

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  4. अगिया बैताल पर ठिठोली अच्छी नहीं होती। जिस दिन पाला पड़ेगा उस दिन समझेंगे !

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  5. रोचक और दिलचस्प किस्सा है.

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  6. जय हो भूत बाबा की, राममिलन जी को याद दिलाया. सचमुच रोचक डायरी के पन्‍ने हैं. आभार.

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  7. गिरिजेश जी

    पाला मतलब

    कड़ाके की ठंड

    या ठंड रखें

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  8. @अविनाश जी,
    हम किसी और 'पाला' की बात कर रहे हैं।
    :)

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  9. yah aapke tippni bakse me tippni kahe nhi paste ho rahi...majburi me romanagari me likhna pad raaha hai.

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  10. @गिरिजेश राव

    किसी और पाला यानी

    किसको पाल लिया

    भूत साहब को।

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  11. अविनाश जी राव साहब का पाला पड़ेगा से तात्पर्य है जब सामना होगा वैसे आपका पाला भी चल सकता है मतलब जब कड़ाके की ठंड पड़ेगी तब ही ना अगिया बेताल की ज़रूरत होगी हा हा हा ।

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  12. @ शरद कोकास
    @ गिरिजेश राव
    पाला तो सच का भी पड़ सकता है
    सामना की तरह
    तो जो आ रहा है सीरियल
    बदलकर रख दें उसका नाम
    सच का पाला
    जो पले पलाओं को
    अलग थलग कर रहा है
    अपनी सच की मशीन की
    करतूत से

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  13. रोचक घटना के लिये आभार्

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