शनिवार, 15 अगस्त 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –दो

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –दो


हम लोग आज का कार्य समाप्त करने ही जा रहे थे कि डॉ.वाकणकर का आगमन हुआ । “कैसा लग रहा है दुष्टों?” उन्होने हमारे मुरझाये चेहरों की ओर देखकर पूछा । हमने उन्हे अपनी उपलब्धियों और असफलताओं से अवगत कराया । सर बोले “ तो क्या हुआ ? हम उपलब्धियों पर बात करते हैं । यह जो मिश्रित रूप में अवशेष यहाँ मिल रहे हैं इनसे यह तो तय होता है कि यहाँ मिश्रित संस्कृति रही होगी । हम लोग उनकी बात का आशय समझ चुके थे । मैने उनसे सवाल किया “ सर यह जो अवशेष हमें मिल रहे हैं आगे चलकर इनका क्या होगा ?” मैने अपनी समझ से ठीक सवाल पूछा था ।
वैसे सर पहले ही दिन इस सवाल का जवाब दे चुके थे , फिर भी उन्होने समझाया “ तुम लोग देखते ही होगे ,मैं सबसे पहले इन प्राप्त अवशेषों को अपने तम्बू में ले जाकर साफ करता हूँ । फिर यह किस स्थिति में ,किस लेयर में,कितनी गहराई में मिले,इनके साथ और कौन –कौन सी वस्तुएं मिलीं आदि जानकारी का टैग लगाकर इन्हे सावधानी पूर्वक सीलबन्द कर देता हूँ ।“ “ इतना तो हमें भी मालूम है सर ।,” रवीन्द्र ने कहा “ लेकिन इसके बाद क्या होता है ? सर ने बताया “ इसके बाद उत्खनन की रिपोर्ट लिखते समय इस सामग्री की ज़रूरत होती है । “ नही सर ” अजय कुछ कहने वाला था लेकिन उसकी बात काटकर मैने कहा “लेकिन सर इतनी सामग्री भर से क्या इस जगह का इतिहास लिखा जायेगा ?”
वैसे तो हम यह सब कोर्स में पढ चुके थे, लेकिन डॉ.वाकणकर जैसे विद्वान के मुँह से यह सब सुनना हमें अच्छा लग रहा था ।उनका ज्ञान अपार है और जहाँ वे विश्व इतिहास की पहेलियों के उत्तर सरलता पूर्वक दे देते हैं

वहीं जंगल में अगर आपकी साइकल पंक्चर हो जाये तो ट्यूब में बारीक धूल डालकर हवा भर देने से कैसे पंक्चर की दुकान तक साईकल चल सकती है ,जैसे फार्मूले भी उनके पास हैं । वे अच्छे चित्रकार भी हैं और नक्षत्र विज्ञान के अलावा जड़ी-बूटियों की भी जानकारी रखते हैं । सर भी हमारे सवालों का मज़ा ले रहे थे । यह साधारण सा सवाल सुनकर किंचित रोश के साथ बोले “ अरे पागलों ,दो साल से क्या पढ़ रहे हो ?इतिहास लिखने के लिये इसके सपोर्ट में और भी वस्तुएं चाहिये ,यहाँ प्रचलित साहित्य,लोक मान्यताएं,निकटस्थ स्थानों पर प्राप्त सामग्री,आसपास हुए उत्खननों की रिपोर्ट आदि. । सब मिलाकर इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता कई दिनो तक शोध करते हैं तब कहीं इतिहास तय होता है
“लेकिन सर जी ,ई सब इतिहास-फितिहास लिखा जाने के बाद ई सब कचरा का का करेंगे ,वापस गाड़ देंगे का? “राममिलन के इस मूर्खतापूर्ण सवाल पर सर ज़ोर से हँस पड़े । मज़ाक में बोले “ क्या करेंगे,इन पर सिन्दूर लगाकर
तुमरे यहाँ गंगा मैया में विसर्जित कर देंगे और क्या । “ सर की विनोद बुद्धि पर हम लोग भी हँस पड़े ।लेकिन किशोरवा कहाँ चुप रहने वाले थे । उन्हे तो छेड़ने का मौका चाहिये था ।बोले” अरे पंडत,ई सब तोहरे इलाहाबाद के मूजियम मे रख देंगे और तोहका म्यूजियम क्यूरेटर बना देंगे।
हम लोग हँस पड़े लेकिन राम मिलन नाराज़ हो गए “ किशोरवा तुम तो चुपई रहो ,हम तुमसे बात नाही कर रहे हम तो सर से पूछ रहे हैं । “ लेकिन सर तो इतनी देर में हम लोगों को हँसता छोड़ कैम्प की ओर रवाना हो चुके थे । हम समझ गये कि आज रात तक किशोर और राम मिलन में नोक-झोंक चलती रहेगी । (मथुरा म्यूज़ियम व अन्य चित्र गूगल से साभार )
हमारे देश में संग्रहालयों की बेहद कमी है। ज़मीन से निकलने के बाद यह वस्तुएं बेहद कीमती हो जाती हैं अत:एक प्रश्न इनकी सुरक्षा का भी है । आप सोच नहीं सकते कितनी बेशकीमती चीज़ें विदेशों में जा चुकी हैं । बाद में उन्हे नीलामी में भारी कीमत देकर खरीदने से ज़्यादा बेहतर यह नहीं है कि वर्तमान में उनकी सुरक्षा करना ? आप क्या सोचते हैं ?--आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. हम भी आप की ही तरह सोचते हैं। लेकिन उससे क्या होने वाला है?

    मुलाहजा फरमाएँ, अर्ज किया है:

    "जिन्दों की कोई कीमत नहीं यहाँ,
    आप तो कब्रों की बात करते हैं ।"

    वाह ! वाह!! सुभानअल्ला ।

    चर्चा जारी रखिए। हम भी आप ही से सीखें हैं कि कैसे ऐसी जगह "...जारी" लिखो कि पब्लिक ऐंठ कर रह जाय ।

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  2. बढियां चर्चा और अतीत उत्खनन

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  3. संग्रहालय तो और होने चाहिए। उन्हीं की बदौलत तो हम अपने पूर्वजों से मिलते हैं।

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