मंगलवार, 4 अगस्त 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पाँचवा दिन –तीन


और हम हिन्दू विधर्मियों की हत्याएँ करने लगे

खाना खाकर हम लोग बरगद के पेड़ों की बस्ती की ओर टहलने निकल गये । टीले पर तो आज पूरा दिन बीता था इसलिये उस ओर जाने का मन नही हुआ । बरगदों का घना साया और आसमान में बादलों के पीछे से झाँकती चान्द की शर्मीली रोशनी । शाल ओढ़े होने के बावज़ूद ठंडी हवाओं में बदन काँप रहाथा । वैसे भी भोजन के बाद काफी रुधिर पाचन तंत्र की ओर दौड़ जाता है इसलिये ठंड ज्यादा लगती है । वातावरण बड़ा रोमांटिक लग रहा था मेरे मुँह से मेरा प्रिय गीत फूट पड़ा.. तू कहाँ है बता इस नशीली रात में माने ना मेरा दिल दिवाना..। रवीन्द्र ने छेड़ दिया “ लगता है तुझे गाँव की वो मज़दूर लड़की भा गई है ।“ मैने रवीन्द्र की ओर घूरकर देखा तो वो बोला “ और क्या आज वो कितने प्यार से पूछ रही थी ..बाबूजी हाँटा खाओगे ?
मैने कहा “देख यार यह सब करने का यहाँ वक़्त नहीं है हाँटा –सांटा या गन्ना खाने के चक्कर में रहेंगे तो हाँटा की बजाय डॉ.वाकणकर का चाँटा मिलेगा और आर्क्यॉलॉजी के प्रेक्टिकल में फेल हो जायेंगे सो अलग ।“
“ठीक है भाई , “ रवीन्द्र ने कहा “थारी जैसी मर्ज़ी , लेकिन कुछ भी कहो यार छोरी है चकाचक ।“ मै कुछ कहता इससे पहले हमारी भाभी के भैया अजय ने हमारे रोमांटिक मूड पर पानी फेरते हुए सवाल दागा “ यार ये बताओ ,ये मालवी और ईरानी भाषा का क्या सम्बन्ध हो सकता है ? “ हमने चौंक कर उसकी ओर देखा , गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल इस वार्तालाप में कैक्टस सा यह सवाल कैसे आ गया । अजय ने स्पष्ट किया “ तुम कह रहे थे ना उस लड़की ने साँटा को मालवी में हाँटा कहा ,ईरानी भाषा में भी स को ह कहते हैं ।“ रवीन्द्र ने कहा “थारो प्रश्न म्हारी हमज में गियो यानी तेरा सवाल मेरी समझ मे गया

मैने कहा “ भाई मैं न तो मालवा का रहने वाला हूँ न ईरान का लेकिन इतना मुझे पता है कि हम हिन्दू हिन्दू कहकर जो अपने आप पर गर्व करते हैं यह हिन्दू शब्द पश्चिमोत्तर से आया है । वहाँ के लोग सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों को सिन्धू कहते थे और ज़ाहिर है स को ह कहने के कारण हम हिन्दू हो गये । “
“और फिर हम हिन्दू अपनी भाषा ,अपने धर्म अपने राष्ट्र पर गर्व करने लगे और विधर्मियों को अपने से नीचा बताकर उनकी हत्याएं करने लगे

“ अजय ने बात की कंटिन्यूटी ज़ारी रखी । “चुप “ मैने उसे डाँटा “ ज़्यादा बकबक मत कर वरना अभी डॉ. वाकणकर से हिन्दुत्व पर लेक्चर सुनने को मिल जायेगा ।“ “ नहीं नहीं सर ऐसे नहीं हैं “ रवीन्द्र ने तुरंत प्रतिवाद किया ।“ वैसे भी जो असली पुरातत्ववेत्ता होता है वह न हिन्दू होता है न मुसलमान ना सिख ना ईसाई .. वह सबसे पहले पुरातत्ववेत्ता होता है । सच के मार्ग पर चलने वाला । किसी भी धर्म के प्रति
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वह काम नहीं करता । जो धर्म विशेष का पक्ष लेता है और सत्य को छुपाता है उसे पुरातत्ववेत्ता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है ।“ “काहे भैया ..आज सोये –वोये के इच्छा नाही है का ? “ पंडित राम मिलन एक ही झटके में हमें यथार्थ के धरातल पर ले आये ।(छवि गूगल से साभार )
यह डायरी वास्तविक है ,मै इसे ज्ञानवर्धक के साथ साथ रोचक बनाने का प्रयास कर रहा हूँ .आपको मेरा यह प्रयास कैसा लग रहा है कृपया अपनी राय अवश्य दें- शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

  1. मालवी भाषा पढ़कर रस ले रहे हैं जारी रखें रोचक है साथ में डॉ. वाकणकर को भी जानना अच्छा लग रहा है।

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  2. मेरी समझ से हिन्दू और धर्म को यहाँ खींच कर लाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
    आप का ब्लॉग लेखन वैसे भी बहुत अच्छा है और मुझे अति प्रिय है। इसको इस तरह के 'श्रृंगार' की आवश्यकता नहीं है।

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  3. शरद जी आप का तो पूरा आर्किव फुरसत में पढ़ना पड़ेगा। पुरातत्वशास्त्र में रुचि नहीं है पर प्राचीन भारत के इतिहास और संस्कृति में भारी रुचि है। और उस के लिए इसे जानना जरूरी है। कभी लगता है कहाँ वकालत में फँस गए।
    रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

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