रविवार, 2 अगस्त 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पाँचवा दिन –दो


चिकन खाने से पहले बताना होगा मुर्गी पहले आई या अंडा
?






तम्बुओं मे लौटते हुए अन्धेरा घिर आया । मौम खुल गया था और ठंड अचानक बढ़ गई थी । हाथ मुँह धोकर आने के पश्चात किशोर की ओर से प्रस्ताव आया “ क्यों सिटी घूमने लें “ मैने कहा “नहीं यार आज वैसे ही बहुत थक गये हैं दिन भर काकरके और दिन भी डूब चुका है । कल जल्दी काम खत्म करके चलेंगे दंगवाड़ा ।“
वैसे भी आज किसी निखात पर स्वतंत्र रूप से काम करने का अनुभव हमें प्रफुल्लित किये हुए था । ज़मीन के भीतर तो हम मात्र 31 सेंटीमीटर ही गये थे लेकिन हमारी उमंगें आसमान में जाने कहाँ तक जा पहुंची थी । भोजन तक का वक़्त बिताने और भट्टी की आग तापने के उद्देश्य से हमने भाटी जी की भोजन शाला पर धावा बोल दिया औ लगे उनका दिमाग खाने । “ क्या भाटीजी ..” अशोक ने छेड़खानी शुरू की “ रोज़ रोज़ वही लौकी, बैंगन, गोभी ..कुचिकन विकन का इंतज़ाम नहीं है क्या ?..” श..श.” भाटी जी ने डाँट लगाई “पंडित वाकणकर जी ने सुन लिया तो तुम्हारा कीमा बना देंगे ।“ अशोक बेचारा मायूस हो गया । भाटीजी ने पुचकारते हुए कहा “ कोई बात नहीं तुम मेरे एक सवाल का जवाब दे दोगे तो मैं तुम्हे चिकन खिला दूंगा ।“ अशोक की आंखों में चमक आ गई । भाटी जी ने कहा “यह बतलाओ कि दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा ? “
अशोक बोला “बड़ा कठिन सवाल है भाई, हमारे डॉ.शरद कोकास ही इस पर रोशनी डाल सकते हैं ।“ मैने कहा “कोई कठिन सवाल नहीं है । विज्ञान इसका उत्तर ढूंढ चुका है । यदि आप यह जानते हैं कि हर सजीव का जन्म और विकास कैसे हुआ तो इसका उत्तर आसान है । भई सजीवों की उत्पत्ति से पूर्व रसायनों से लबाबब थी यह धरती । समुद्र के जल में मिश्रित रसायनों पर एक्स रेज़ ,बीटा रेज़ गामा रेज़ आदि के प्रभाव से समुद्र में उपस्थित शैल भित्तियों पर एक कोशीकीय अमीबा जैसे जीवों ने जन्म लिया , फिर धीरे धीरे अन्य बहु कोशिकीय जीव जन्म लेते गये और उनके आकार भी बदलते गये । आप क्या सोचते हैं .. यह मुर्गी जो हदेखते हैं क्या इसके पूर्वज भी ऐसे ही दो ‘ लेग पीस ‘ वाले रहे होंगे ? बिलकुल नहीं इससे पूर्व इससे मिलते जुलते जीवों ने जाने कितने रूप धारण किये होंगे तब यह मुर्गी सदृश्य जीव बना होगा ,फिर धीरे –धीरे इसकी प्रजनन क्षमता विकसित हुई होगी, फिर अंडा-वंडा बनना शुरू हुआ होगा इसकी भी लम्बी प्रक्रिया रही होगी ।“ “ वो तो सब ठीक है “ अजय ने मेरे भाषण से ऊबकर कहा “ लेकिन इसे खाना कब शुरू हुआ ?“ मैने कहा “ सॉरी यार, इस बारे मे फिलहाल मेरे पास कोई जानकारी नही है ।“
रवीन्द्र इतनी देर तक हम लोगों की बातें सुन रहा था । उससे रहा नहीं गया । उसने कहा” क्या तुम लोग भी खाने के समय गन्दी बातें कर रहे हो ।“ “अच्छा अच्छा चुप हो जाओ भाई, “ अशोक बोला “ पंडित भारद्वाज माँसाहार की बात से नाराज हो गये हैं ।“ भाटीजी हम लोगों की बातों का मज़ा लेते हुए अब तक अरहर की दाल में हींग ,ज़ीरे ,लहसुन व लालमिर्च का छौंक लगा चुके थे । पीले बल्ब की रोशनी में ऊपर उठता हुआ धुआँ किसी स्वप्नलोक में मायावी धुन्ध की तरह दिखाई दे रहा था । ठंडे वातावरण में गहन होती हुई छौंक की यह गन्ध हमारी भूख के चरमोत्कर्ष में हमारे तंत्रिका तंत्र को शून्य कर रही थी और हमे दुनिया के सबसे स्वादिष्ट भोजन अर्थात घर में माँ के हाथों बने खाने की याद आने लगी थी ।(चित्र गूगल से साभार)
आपका शरद कोकास

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