शुक्रवार, 29 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-एक

पिरामिड की आड में..
सुबह छह बजे लगभग डॉ.वाकणकर की गरजती हुई आवाज़ सुनाई दी..”उठो रे सज्जनो..”रवीन्द्र सबसे पहले जागा और उसने हिला हिला कर हम लोगों को जगाया। हम लोग भुनभुनाते हुए अपनी अपनी रज़ाईयों से बाहर निकले ।टुथपेस्ट,ब्रश टॉवेल, अंडर्वीअर,बनियान प्रक्षालन के सारे ज़रूरी सामान लेकर हम लोग नदी की ओर चल पड़े .अशोक त्रिवेदी का मामला तो बगैर सिगरेट सुलगाये पिघलता नहीं था सो उसके पास यह अतिरिक्त वस्तु। रही बेड टी की बात ..उतने सभ्य हम लोग हुए नहीं थे।
चम्बल के पास किसी ज़माने का पथ्थरों का एक घाट जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद था। वही हम लोगों का स्नान-गृह बन गया। शौच के लिये हम लोगों ने चट्टानों के पीछे अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली ।ब्रश करते हुए झाग भरे मुँह से हम लोग नदी के महात्म्य पर चर्चा करते रहे कि बस्तियाँ नदी के पास ही सबसे पहले क्यों बसीं। इसका कारण यही है कि जल जीवन के लिये सर्वाधिक आवश्यक वस्तु है और अन्य सुविधायें उपलब्ध होने के बावज़ूद जल के स्त्रोत का निकट होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। कालांतर मे जब नदियों क प्रवाह दूर होता गया तो उसके अनुसार बस्तियाँ भी दूर होती गईं आज उत्खनन में कई ऐसे स्थान मिलते है जहाँ ज्ञात होता है कि पहले कभी यहाँ नदी थी। इसी सन्दर्भ में हम लोग सिन्धु घाटी से लेकर दज़ला फरात और नील नदी के कांठे में बसी सभ्यताओं पर विचार करते रहे।
बात चल ही रही थी कि राममिलन आता दिखाई दिया। “अरे तुम कहाँ चले गये थे भाई?” हम लोगों ने प्रश्न किया।“यहाँ हम लोग नहाने की तय्यारी में हैं और तुम्हारी लोटा परेड अभी तक चल रही है?” “भाईसाहब ,आप लोग तो बेशरम हो कहीं भी निपट लेते हो मुझे तो आड़ के लिये कोई पिरामिड चाहिये था” उसने कहा । हम लोग हंसने लगे “ तो अब पिरामिड का यह भी उपयोग होगा”। अजय ने पुछा” तो मिला कोई पिरामिड?” मैने हँसकर कहा” भाई सारे पिरामिड तो मिस्त्र में हैं।” अजय ने बात आगे बढाई” यह खुफू का पिरामिड कबका है?” मैने बताया..”लगभग छब्बीस सौ ईसा पूर्व का प्राचीन मिस्त्र में वहाँ के राजाओं फराओं द्वारा जीते जी अपनी कब्र का निर्माण किया जाता था। कहा जाता है कि ये शासक बहुत ही क्रूर होते थे । वे स्वयं को देवताओं के समकक्ष मानते थे।उन्होनें सभ्रांत लोगों को विभिन्न प्रदेशों का शासक नियुक्त किया था। ये लोग सम्पति छीनने व आम जनता को यंत्रणाएँ देने का कार्य किया करते थे तथा अपनी कठोरता व क्रूरता की डींगें हांका करते थे । उनके इस कार्य के बदले उन्हें जागीर व ज़मीनें मिला करती थीं। पिरामिडों के बाहर खडी नारसिन्ही मूर्तियाँ”स्फिंक्स” भी इन्ही फराओं की निरंकुश सत्ता का प्रतीक है।ठीक है इनकी भव्यता हमें^ आकर्षित करती है लेकिन इसके पीछे का सत्य हम कैसे नकार सकते हैं “ मुझे लगा बनियान पहने ठन्ड में ठिठुरते अपने मित्रों को इससे ज्यादा भाषण देना ठीक नहीं है।
आपका- शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. बातों ही बातों में काफी ज्ञान की बात बता जाते हैं. आभार.

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  2. लोटा परेड का किस्सा चौकस लगा। बाकी अभी और पढ़वायेंगे न आग!

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  3. अच्छा आलेख पर पढने में तकलीफ हो रही है.

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