शनिवार, 30 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-दो


जय बाबा हेरोडोटस की
“चलो चलो जल्दी नहाओ नहीं तो हमारे फराओ नाराज़ हो जायेंगे।“रवीन्द्र ने फर्मान ज़ारी किया। “ठीक है” मैने कहा नहाने के बाद हम लोग नदी के आस-पास एक्स्प्लोर करेंगे ,क्या पता चीन की पीली नदी हुआंगहो के तट पर मिली कब्रों की तरह कोई प्राचीन कब्र मिल जाये।” “वहाँ किस पीरिअड की कब्रें मिली हैं? “ रवीन्द्र ने पूछा । “दूसरी शताब्दी ईसापूर्व की” मैने बताया और इनमें जोशव मिले हैं वे चटाईयों में लिपटे हैं,जिनके पास घडा,अन्य पात्र और खाने पीने की वस्तुएं रखी हैं।“
अशोक नदी के जल मे कमर तक पानी में खड़ा था, उसने इतिहासकारों के पुरखे हेरोडोटस का नाम लिया और पानी में डुबकी लगा दी । “जय बाबा हेरोडोटस की।” नहा धोकर अपने गीले वस्त्र और अन्य साजो-सामान उठाकर हम लोग शिविर की ओर निकल पड़े। भोजन स्थल और पाकशाला के निकट ही खड़े थे डॉ.सुरेन्द्र कुमार आर्य। हम लोगों के भीगे बदन भीगे केश देखकर उन्होनें टिप्पणी की “तुम लोगों को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे यूनानी सेना समुद्र से निकलकर ट्राय के युद्ध में शामिल होने आ रही है।“ “क्यों मज़ाक कर रहे हैं सर..” मैने कहा “ बिना हेलेन के कैसी सेना और कैसा युद्ध? “रवीन्द्र ने चुटकी लेते हुए कहा “अबे तुझे यहाँ जंगल में हेलेन कहाँ मिलने वाली है? चुपचाप वस्त्र धारण करो और अल्पाहार हेतु भाटीजी की पाकशाला में उपस्थित हो जाओ।”
“ठीक है जैसी पंचों की राय” कहकर हम लोग कपडे बदलने के लिये तम्बू मे घुस गये।
आज इतना ही- शरद कोकास

3 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक हैं आपकी डायरी के पन्ने.
    'एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन -तीन'में जो दूसरी तस्वीर है, 'स्टोन सर्कल' सी; वो चम्बल की ही है क्या!

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  2. बहुत ही मजेदार ढंग से आप लिख रहे हैं वरना इतना दिलचस्पी से पढ पाना संभव न होता। लोकप्रिय तरह से लिखे गए आलेख विषय को सहज ही बनाते है। आपको पढने से तो यह बात और भी पुख्ता हो रही है।

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  3. .चलो हम भी मजे ले रहे हैं

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